मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

मीडिया

 लघुकथा 

from google

तब मैं काफ़ी छोटा रहा होऊंगा. मनोरंजन के साधनों में रेडियो प्रमुख था.

मैं रेडियो से आती तरह-तरह की आवाजें सुनकर हैरत में पड़ जाता और सोचता कि किसी दिन रेडियो को खोलकर देखूं, ज़रुर इसमें से छोटे-छोटे आदमी-औरतें निकलेंगे.

एक दिन किसी वजह से किसीने रेडियो खोला तो उसमें से एक छोटा-सा चूहा निकला और देखते-देखते कहीं ग़ायब हो गया.


-संजय ग्रोवर


बुधवार, 7 दिसंबर 2022

खेल

मेला मशहूर था.

कई दुकाने लगी होती थी. कुछ दुकानों पर प्लास्टिक के टुकड़ों से बना एक चौखटा जैसा बिकता था. ये टुकड़े चौखटे के भीतर ही सरकते थे. इन पर एक नक्शा सा बना होता था. दंकानदार उस बिगड़े हुए नक्शे को दिखाकर बताता था कि इन टुकड़ों को सरकाकर नक्शा वापस बिठाना है. नक्शा सही हो गया समझो आप जीत गए.

क्या उस समय भी कोई होता था जो समझता हो कि उसने नक्शा जोड़ लिया मतलब समाज को जोड़ लिया !

ताली बजानेवाले तब भी होते थे.

-संजय ग्रोवर






रविवार, 13 नवंबर 2022

लैट द होल वर्ल्ड नो अर्थात् दुनिया को पता तो चले !

व्यंग्य 



 


इस देश में योग्यता, प्रतिभा, वीरता और मौलिकता की ठीक से कद्र कभी भी नहीं हुई। ख़ामख्वाह सारी तवज्जो नेताओं को दे दी जाती है। हैरानी है कि भ्रष्टाचार के गुणगान के मामले में भी यही हो रहा है और कोई बोलनेवाला नहीं है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया जिसे शायद चौथा खंबा कहते हैं, वह भी सिर्फ़ नेताओं के भ्रष्टाचार की आरती उतारने में लगा है। यूं तो ठीक भी है, खंबा नाम कुछ सोचकर ही दिया गया होगा। सारी दुनिया इधर से उधर हो जाए, खंबा कहां अपनी जगह से हिलता है ! ज़्यादा हुआ तो टूटकर अपने ही पैरों में घुस जाता है। यह जानते हुए भी कि खंबे हिलने के लिए नहीं होते, हम उन्हें हिलाने में लगे रहते हैं। और इन दिनों तो पक्षपात की हद हो रही है। जनता के टेलेंट पर पर्दा डाला जा रहा है। मैं पूछता हूं कि क्या भ्रष्टाचार की सारी योग्यता 100-50 नेताओं तक जाकर ख़त्म हो गयी है ?


अरे, कभी हमारे बीच आओं, एक-एक घर को देखो आकर, एक-एक नागरिक से मिलो, असलियत देखो, दिखाओ! ख़ामख्वाह नेता को सिर पर चढ़ा रखा है। क्षोभ होता है। जनता के यहां चप्पे-चप्पे पर वीरता की निशानियां भरी पड़ीं हैं। मौलिकता ठाठें मार रही है। क्या किसी राणा प्रताप की इतनी हिम्मत थी कि नक्शा कुछ हो और घर कुछ और बना दे !? घास की रोटियां खाने से कहीं संस्कृतियां बनतीं हैं? और उन गांधी जी को देखो! चल दिए आज़ादी की लड़ाई लड़ने ! भाई साहब! नीचे से ऊपर तक पूरा नेटवर्क बिठाना पड़ता है माफ़िया का, एक-एक विभाग में सैटिंग रखनी पड़ती है, पड़ोसियों को डराना-धमकाना और ‘समझाना’ पड़ता है तब जाकर एक नाजायज़ टॉयलेट या छोटा-सा कमरा बन पाता है। मज़ाक समझ रक्खा है क्या !? पड़ोसी ढीठ हो, असामाजिक हो, अधार्मिक हो, पिटकर भी न मानता हो तो मुश्क़िल हो जाती है। रात-रात भर जागकर काम करना पड़ता है।  


अरे तुम आओ तो सही। मैं तो कहता हूं विदेशी पर्यटको को भी यहीं भेजो। कहां बेचारों को आगरा के ताजमहल और हैदराबाद के मीनारों पर भटका रहे हो? हमारी असली संस्कृति तो यहां घर-घर में बिखरी पड़ी है। ये बढ़ी हुई बालकनियां, ये छज्जे, ये गटर के ऊपर बनाए कमरे हमारी सांस्कृतिक धरोहर नहीं हैं तो क्या हैं ? ये जो अपने चरित्र के परमानेंट ठोस सबूत हमने अपने हाथों से बनाए हैं, इनका क्या कोई मतलब नहीं है? विदेशियों को ठीक से पता तो चले कि राष्ट्रवाद की, धार्मिकता की, सामाजिकता की, इंसानियत की हमारी असली अवधारणाएं आखि़र हैं क्या ? हमारा घर-घर, दुकान-दुकान टूरिस्ट प्लेस है। इनपर टिकट लगाकर कमाई भी हो सकती है। आधा पैसा सरकार ले आधा घरवालों को दिया जाए। वो इसलिए कि मैंने अकसर देखा है कि इन सजे-संवरे-पत्थरथुपे फ्लैटों में अकसर ग़रीब लोग रहते हैं। इन बेचारों की कभी पूर्ति नहीं होती। छज्जा निकल जाए तो इन्हें बालकनी चाहिए, बालकनी बन गयी तो इन्हें लगता है यार, यहां तो कमरा होना चाहिए था। कमरा हो जाए तो याद आता है कि शर्माजी ने तो अपने में 3 आगे और 2 पीछे बना रखे हैं, उनसे आयडिया लेकर आता हूं। कल बच्चे की शादी भी होनी है, जगह कम न हो जाए। बच्चे इनके हैं, भुगतेगा पड़ोसी। टूरिस्टों को दिखाना चाहिए कि देखो ऐसा होता है ज़िम्मेदार और सामाजिक आदमी। कुछ सीखो इन जगदगुरुओं से। ईडियटस्!


देखो इनका कॉन्फ़िडेंस लेवल! क्या बच्चा, क्या बूढ़ा, क्या डॉक्टर, क्या वक़ील, क्या स्त्री, क्या पुरुष ! एक से एक हैं। इन्हें कहीं बिठा दो, कहीं भेज दो, हर जगह भ्रष्टाचार करके दिखा देंगे। मंदिर में रखवा दो, दुकान पे बिठा दो, ऑफ़िस में लिटा दो, प्राइवेट सेक्टर में भेज दो, सरकारी में ऐडजस्ट करा दो....कहीं से भी बिना भ्रष्टाचार किए लौट आएं तो आप मेरा नाम बदलकर ईमानदार रख देना। लानत भेजना मुझ पर अगर पता चले कि कि कोई विदेश में जाकर अपनी ‘संस्कृति के चिन्ह’ छोडे़ बिना लौट आया। फ़िर क्यों मीडिया नेताओं की मेरिट को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है ? क्या उन्होंने मीडिया को कुछ डोनेशन वगैरह दे दिया है ? अरे हमें बताओ तो सही, हम और बढ़िया इंतज़ाम करके देंगे। टीवी पर दिखने के लिए हम मुंह पोतकर उछलने को भी तैयार रहते हैं तो फिर क्यों हमारी योग्यता को दबाया जा रहा है ?


मुझे लगता है कि सरकार और मीडिया इस मामले में कुछ नहीं करनेवाले। क्या सरकार को इस बात का अंदाज़ा नहीं कि पड़ोसी के मीटर में तार डालना और हर बार इस तरह मीटर बदल-बदलकर डालना कि पड़ोसी को सिर्फ़ इतना ही लगे कि ‘हां, यार कभी-कभी आ जाते हैं सौ-दो सौ रु. ज़्यादा, कोई बत्ती जलती छूट गयी होगी किसी दिन’ कुछ कम बड़ा हुनर है !?


मीडिया अगर साथ दे तो बहुत कुछ हो सकता है। रियल रिएलिटी शो बनाए जा सकते हैं जैसे-‘भ्रष्टाचार का आंचल’, बेईमानी की छांव में’, ‘ईमानदारी का नरक’, ‘खा-पी टीवी पर पहलीबार: असली जनता का असली भ्रष्टाचार’, ‘असली भ्रष्टाचारी कौन ?’, इनमें टीमें बनायी जा सकती हैं। टीमों को काम दिए जा सकते हैं कि जो सबसे पहले नाजायज़ कमरा बना कर दिखाएगा, विजेता होगा। डांसिंग-फ्लोरस् बनाकर उनके नाम रखे जा सकते हैं-'क़ानून की छाती',' इंसानियत का मलबा' आदि। सरप्राइज़ तत्व डाले जा सकते हैं जैसे कि ईमानदार या मजबूर पड़ोसी बेईमान कमरा निर्माताओं को ख़ुद आमंत्रित कर रहा है कि आईए सर, हे वीर पुरुष, हे महासामाजिक प्राणी, हे धर्म-धुरंधर, आओ, पचास-पचास के गुट बनाकर मुझे पीटो। मैं आपसे पिटकर पवित्र होना चाहता हूं। आप नहीं आएंगे तो मैं आपको निमंत्रण-पत्र भेजकर बुलाऊंगा। आखिर देश की असली सभ्यता-संस्कृति-परंपरा को टूटने से बचाने का सवाल है। देखो, कितने विदेशी दर्शक तुम्हारी योग्यता, वीरता और प्रतिभा का प्रदर्शन देखने दूर-दूर से आए हैं। देखने लायक दृश्य होगा कि ‘क़ानून की छाती’ पर चढ़कर पचास-पचास लोग एक आदमी को पीट रहे हैं, ‘इंसानियत के मलबे’ पर अपने-अपने षड्यंत्रों के साथ नाच रहे हैं। ‘सलाम ज़िंदगी’, ‘हलो ज़िंदगी’, ‘जीना इसीका नाम है’ जैसे कार्यक्रमों से प्रेरणा लेकर कुछ और दृश्य जोड़े जा सकते हैं। जैसे पीछे परदे पर पीटनेवाले जन-भ्रष्टाचारियों के संबंधियों-दोस्तों के साक्षात्कार चल रहे हों। लीजिए, एक बहिन कह रही है,‘भैया तो शुरु से ही बड़े स्मार्ट थे। बिना टिकट ही गाड़ी में भी घूम आते थे और फ़िल्म भी देख आते थे। और बचे पैसों के समोसे लाकर आधे मुझे खिला देते थे। हमारा नेचर बिलकुल एक जैसा है, इसलिए शुरु से ही बहुत पटती थी।’ और यह सुनकर इकले को पीटते-पीटते भैया की आंखें भर आतीं हैं। पीटना रोककर वह इकले की कमीज़ फ़ाड़ते हैं और अपने आंसू पोंछने लगते हैं। उधर परदे पर अंग्रेजी में सबटायटल्स भी चल रहे हैं ताकि विदेशी दर्शक हमारी सभ्यता-संस्कृति को क़रीब से अर्थात् ज़मीनी यानि ग्रासरुट लेवल पर समझ सकें और भ्रष्टाचार के संदर्भ में भारतीय राजनेताओं से उनका मोहभंग हो सके।  बड़े भ्रष्टाचारी बने फ़िरते हैं ससुरे। क्या औक़ात है इनकी भारत की जनता के सामने !?


 


अव्वल तो कोई पूछता नहीं मगर यह रिएलिटी शो है इसलिए एक आदमी आ गया है पूछने, ‘भाई साहब, आप सब इस आदमी को क्यों पीट रहे हैं !?


‘बड़ा ऐंटी-सोशल आदमी है जी, किसीसे मिल-जुलके नहीं चलता।’


‘अच्छा जी ! हुआ क्या ?’


एक छोटी-सी दुकान बना रहा हूं ज़रा-सी ज़मीन ऐनक्रोच करके, साला बनाने नहीं दे रहा, कहता है मेरे घर का रास्ता बंद होता है! हम कह रहे हैं तू भी बनाले कुछ, हम सहयोग कर देंगे पर मानता नहीं, साले ने अपने अलग ही क़ानून बना रक्खे हैं !’


‘बड़ा ग़लत आदमी है ! जरा मैं भी हाथ फरैरे कल्लूं।’


पीछे गाना बज रहा है,‘सारे बजाज और सारे दलाल, चाहते हैं अच्छा लुकपाल, जिन्नलुकपाल, जिन्नलुकपाल, चहिए हमको जिन्नलुकपाल....’


ठीक भी है, कम-अज़-कम जिन्न का ‘लुक’ तो ऐसा होना ही चाहिए जिसे ‘पाला’ जा सके!


और भारत में कैसी हैरत ! जो लोग अपने बीच क़ानून का पालन करनेवालों को बर्दाश्त नहीं कर सकते, उन्हें नेताओं के खि़लाफ़ एक कड़ा क़ानून चाहिए। 


 (जारी)


--संजय ग्रोवर


13-11-2011

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022

फ़ॉलोअर












लघुकथा

फ़ॉलोअर




गली सुनसान थी और सड़क उदास.

मेरा ध्यान कैसे न जाता कि वह आदमी लगातार मेरा पीछा कर रहा था. इंटरनेट के प्रचलन के बाद जो भाषा प्रयोग की जाने लगी है उसमें कहूं तो वह मुझे ‘फॉलो’ कर रहा था.

मैं जानबूझकर उस गली में मुड़ गया जिसमें मुझे नहीं जाना था. पीछे मुड़कर देखा, वह वहां भी आ रहा था.

आखिर चाहता क्या होगा ! मुझपर ऐसा है क्या जो इसके काम आएगा !

कैसे पता करुं ? मैं एक जगह रुका और टांग खुजाने लगा. वह भी रुक गया और टांग खुजाने लगा.

‘अजीब आदमी है!’

कहीं मैं ख़्वामख्वाह शक तो नहीं कर रहा! कुछ और पता लगाना चाहिए.

एक दुकान दिखी. मैंने एक लस्सी ले ली. उसने भी लस्सी ले ली.

मैंने दुकानदार से पूछा-‘भैया, थोड़ा ज़हर है!’

वह हंसने लगा. ज़ाहिर था कि ज़हर उसपर कैसे होता.

मैं भी बस यूंही झुंझला गया था. देखना चाहता था कि यह किस हद तक फ़ॉलो करता है!

गली तक! घर तक! ज़िंदगी-भर!

यह ख़्याल ही मुझमें सिहरन पैदा कर रहा था कि इसने अगर ज़िंदगी-भर मुझे फ़ॉलो किया तो मैं जियूंगा कैसे. इसको तो लगता है किसी वजह से या बिना वजह ही फ़ॉलो करने की आदत है मगर मेरी प्राइवेसी का क्या होगा!

यह खिड़की में आंख दिए रहेगा तो मैं नहाऊंगा कैसे, कपड़े कैसे बदलूंगा्! यह भी वहीं नहाने लगा तो! कहीं कपड़े भी मेरे मांगने लगा तो! कलको मुझे सब कुछ इसीके अनुसार करना पड़ेगा कि ‘भाई साहब! आपकी इजाज़त हो तो मैं नहा लूं वैसे मेरा तो टाइम हो गया!’ ‘भाईसाहब! मैं फ़लां विचार व्यक्त करुंगा तो आप कम तो नहीं हो जाओगे ?’  

इसकी तो पता नहीं पर मेरी ज़िंदगी क़ैद से भी बदतर हो जाएगी.

परेशान हूं कि पीछा कैसे छुड़ाऊं?



-संजय ग्रोवर 

 




बुधवार, 22 दिसंबर 2021

सुनते हैं कान होते हैं सुनने के वास्ते










ग़ज़ल

मज़दूर अपनी जान पे है खेल रहा तो!
धर्मात्मा भी ज्ञान अपना पेल रहा तो!

ज़ेवर के लिए ही जिन्होंने ज़िंदगी दे दी
ज़ेवर ही उनकी नाक में नकेल रहा तो!

कहने को अपनी ज़िंदगी आज़ाद रही है
जीवन रिवाज़ो-रस्म की इक जेल रहा तो!

बादाम मां ने, बाप ने भिगवा के रखे हैं
लौण्डा जो ठण्ड में है दण्ड पेल रहा तो!

सुनते हैं कान होते हैं सुनने के वास्ते,
दूजों को सुनना उनके लिए खेल रहा तो!

इस बार इनको देखा था अब उनको लाओगे?
पर इनकी-उनकी सांठ-गांठ, मेल रहा तो!

-संजय ग्रोवर


सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

देते हैं नज़राना बड़ा

 ग़ज़ल


तू यही था तब ही तुझको छोड़कर आना पड़ा
गो शहर की शान में गाते हैं सब गाना बड़ा

लड़कियों को ख़ुदसे कमतर मानते हैं सबके सब
इसलिए ही उनके संग देते हैं नज़राना बड़ा

शर्म था वो शहर मैंने उसको थूका बार-बार
दाग़ था वो दौर मुझको बारहा जाना पड़ा

खो गया जो खो गया उसका तो कुछ शिकवा नहीं
है बहुत अफ़सोस उसपे मुझको जो पाना पड़ा

मैं चला था देखकर आए-गए लोगों की चाल
पर जहां अंजाम देखा लौटकर आना पड़ा


-संजय ग्रोवर
05-10-2020


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

गाकर भीड़ लगा सकते हो ?









क्या तुम अच्छा गा सकते हो ?
गाकर भीड़ लगा सकते हो ?

भीड़ को सम्मोहित करके तुम

क्या नारा लगवा सकते हो ?

भीड़ तालियां भीड़ ही थप्पड़-

ख़ुदको यह समझा सकते हो ?

अब तक जो होता आया है

क्या फिर से करवा सकते हो ?

तुमसे क्या अब बात छुपाना- 

क्या तुम घर पर आ सकते हो ?

अपने दिल की बात बताकर

मेरे दिल तक आ सकते हो ?

क्या बोला, मैं नया-नया हूं

ठीक है फिर तुम जा सकते हो

-संजय ग्रोवर
14-02-2020

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

नहीं दिखाएंगे बनाम हम देखेंगे




ऐसे मौक़े पर किसी एक पक्ष के बारे में रचना लिख दो, अकसर मशहूर हो जाती है।
किसीने लिख दिया कि हम पेपर नहीं दिखाएंगे।
बिलकुल ठीक है, नागरिकता वगैरह के पेपर की मांग से ग़रीबों और दूसरे कई लोगों को बहुत मुश्क़िल होगी। वैसे भी, क्या गारंटी है जो यहां का निकलेगा वो अच्छा भी निकलेगा! 
क्या अभी तक आपने नहीं देखा कि यहां लोग क्या बोलते हैं और क्या निकलते हैं ?
पेपर नहीं दिखाएंगे। बिलकुल ठीक है।
मेरे ग्रुप में किसी ने यह कविता लगा दी, अच्छी लगी। इसलिए कि भाषा बहुत आसान है। सब समझ में आता है।
हम पेपर नहीं दिखाएंगे।
लेकिन देखोगे तो सही! कि देखोगे भी नहीं?
क़ागज़ देखने के मामले में, लगता है भारत के लोग, लगता है, अभी पुराने ज़माने में ही रह रहे हैं।
बहुत-से लोग कहते हैं कि हम ईबुक नहीं लेंगे, हमें तो क़ागज़ की क़िताब ही चाहिए। 
उनको सजाया जा सकता है। फिर लेखक चाहे फ़ोटो-कॉपी मशीन जैसा क्यों न हो, लोग पीछे सजी नुमाइश से प्रभावित होते हैं।
उनमें से ख़ुशबू आती है (हो सकता है कोई परफ्यूम वगैरह लगा रहता हो)।
और उनको रखने को कई अलमारियां और रैक वगैैरह चाहिए।
और बड़ी बात, उनको तकिये के नीचे दबाया जा सकता है। भारत में ‘तकिया-तले’ साहित्य का महत्व कौन नहीं जानता। यहां तो अभी तक संस्कृति भी वही चलाए रखना चाहते हैं कई लोग।
बाद में उन्हीं में से बदबू भी आती है।
क्योंकि उन्हीं में कीड़ा लग सकता है।
उनकी रद्दी बेची जा सकती है, ईबुक का क्या बेचोगे?
हांलाकि विचार उसमें बिलकुल वही होते हैं जो ईबुक में होते हैं।
पर इसको समझने के लिए भी तो कुछ विचार चाहिएं।
फिर भारत में इतनी स्वतंत्रता आ गई तो ‘भारतीय’ टाइप के विद्वानों और प्रकाशकों का क्या होगा ?
और कौन-से क़ागज़ नहीं देखोगे ?
क्या इंटरव्यू के समय भी क़ागज़ नहीं देखोगे-दिखाओगे?
क्या फ़िल्म देखने जाओगे तो भी क़ागज़ नहीं दिखाओगे?
क्या गाड़ी का लाइसेंस भी नहीं दिखाओगे ?
चूंकि मैं भारत का चरित्र कई साल से देख रहा हूं इसलिए थोड़ा शक़ होता है।
क्या पेपर मतलब एग्ज़ाम भी नहीं दोगे?
क्या असंवैधानिक अमीर कमरों के क़ागज़ भी नहीं दिखाओगे?
ऐसा मत करना। बड़ी अव्यवस्था फैल जाएगी।
फैली ही हुई है।
इधर एक ऐतिहासिक कविता हुई-कि ‘हम नहीं दिखाएंगे’।
उधर एक ऐतिहासिक नज़्म हो चुकी-‘हम देखेंगे’।
‘हम नहीं दिखाएंगे’
‘हम देखेंगे’
‘हम नहीं दिखाएंगे’
‘हम देखेंगे’
ऐसे भी गाओ, एक इतिहास और बनेगा।

-संजय ग्रोवर




बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

महापुरुषों के दिवस

वे जो स्कूल-कॉलेज में पढ़ाते भी हैं और स्टेशनरी भी चुराते हैं, जो बाढ़ और अकाल के नाम पर दफ़्तर में आई राशि ख़ुद खा जाते हैं, जो टैक्स नहीं देते, जो भरपूर ब्लैक-मनी होते हुए भी घर में हवा-पानी के लिए छोड़ी गई जगह में कमरे बना लेते हैं फिर शहर को कंक्रीट का जंगल भी बताकर कविताएं लिखते हैं, जो जंतर-मंतर और रामलीला ग्राउंड में आंदोलन करते हैं पर भ्रष्टाचार का मतलब तक नहीं समझते, जो पुरस्कार लेने के लिए बड़े-बड़े आदमियों की संस्तुतियां कराते हैं पर इमेज एक बेचारे आदमी की बनाए रखते हैं, जो जितने ज़्यादा और जितनी जल्दी छोटे काम करते हैं उतनी जल्दी बड़े आदमी बन जाते हैं, जो चोरी-छुपे यौन-संबंध बनाते हैं और साथ में बेबाक़ होने का श्रेय भी ले लेते हैं, जो दहेज जैसी बुराईओं को दहेजवाली शादियों में जाकर हटाना चाहते हैं, जो ख़ूब अच्छा लिखते और भाषण देते हैं पर उस लिखे या भाष्य के उनके जीवन में कोई चिन्ह तक दिखाई नहीं देते, जो पड़ोसी या टीचर का लिखा भाषण 115वीं बार पढ़ते हैं, जो लोगों को बिना मांगे भी रिश्वत ऑफ़र करते हैं, जो नंगे आदमी के दिवस पर सूट पहनते हैं, शराब न पीनेवाले का दिवस भरपूर शराब पीकर मनाते हैं, जो अहिंसावादी का दिवस लठैतों से लैस होकर मनाते हैं, फ़िल्में न देखनेवाले को फ़िल्म देखकर श्रद्धांजलि देते हैं, अनशन करनेवाले को भरपेट खाकर फिर उसका दिवस मनाकर डकार जाते हैं ....... 

आज का दिन उन्हीं के लिए है। वे सुबह से रात देर तक भाषण देंगे, महापुरुषों की कहानियां सुनाएंगे, बच्चों को लड्डू बांटेगे और फिर पिकनिक मनाने चले जाएंगे।


और बाक़ी सारे दिन तो हैं ही उन्हीं के।


मैं तो मरने से पहले ही मर जाऊं अगर ऐसे लोग मेरा कुछ मनाएं।


भाषण ख़त्म हुआ। अब जाकर ऐश करो जैसे हर साल करते हो।


-संजय ग्रोवर



मंगलवार, 21 मई 2019

‘कोई ट्रॉल करो न प्लीज़’

व्यंग्य



क्या आपने ट्रॉल को देखा है ?
तो उनके बारे में सुना तो होगा !
सुना है आजकल काफी मशहूर हो चले हैं।
कई सेलेब्रिटीं कहती रहतीं हैं-‘क्या बताऊं यार, मेरे पीछें तो आजकल ट्रॉल पड़े हैं:(
कहने का मन होता है-‘फिर तो काफ़ी मशहूर हों आप!’
ट्रॉल बदतमीज़ी करते होंगे पर कई साल से मुल्क़ में जो वातावरण बना है, ट्रॉल्स ही कई लोगों को हीरो/शहीद भी बनाते हैं।
कभी-कभी ट्रॉल्स के नाम भी दिलचस्प होते हैं, जैसे-‘आई लव यू’, ‘रोटी-रोज़ी’, ‘एक्स-वाई-ज़ेड’........

एक मित्र ने दिखाया, ‘देखो आजकल कितने लोग मुझे ट्रॉल कर रहे हैं...........’
दूसरा मित्र ट्रॉल्स के नाम देखकर सोच में पड़ गया, बोला-‘सच बतईयो, कहीं नाम बदल-बदलकर तू ख़ुद ही ख़ुदको  ट्रॉल तो नहीं कर लेता......’
बताइए कितना गड़बडझाला मचा दिया है इंटरनेट की दुनिया में ट्रॉल्स ने।

लेकिन कइयों का कैरियर भी तो यहीं से चमकता है।
मेरे कहने का यह मतलब नहीं कि हर मशहूर आदमी की मशहूरी में ट्रॉल्स का योगदान होता है। पर कइयों के में होता भी होगा। तिकड़मबाज़ी से हम परहेज़ भी कहां करते हैं।

मैं कल्पना करता हूं कि आप गाड़ी में जा रहें हैं। अगले ही स्टेशन पर ट्रॉल करवाने का शौक़ीन एक जत्था, कोट-पैंट-टाई पहने, गाड़ी में घुस आता है,  ट्रॉल के कुछ शौक़ीन खिड़कियों पर खड़े हैं।
‘ए भाई साहब, ए बहिनजी, ए मैडम, थोड़ा ट्रॉल करो न बाबा, टी आर पी का सवाल है.....’
‘आजकल चैनल बहुत हो गए, भैया, काम करनेवाले भी बहुत हो गए, अपने हिस्से में ज़्यादा ट्रॉल नहीं आता, मुन्नी, मैं क्या करुं ?’
‘यह बच्चा किसका है?’ खिड़की में से आवाज़ आती है, वहां भी ट्रॉल करवाने के इच्छुक खड़े हैं, उन्हीं में से एक कह रहा है-‘बच्चे से थोड़ा सुस्सू ही करा दो न आंटी, हम अपने हिसाब से पेश कर देंगे कि देखो बच्चे भी किस तरह से ट्रॉल करते हैं, कितना सताते हैं अत्याचारी....’
‘लेकिन आपका सूट तो बिलकुल नया है,-आप कहते हैं,--‘इसपे सुस्सू कैसे करा दें.......’
‘अरे बस, करा दो आंटी, नया सूट सिलवाया ही इसीलिए है।’

आजकल कई संस्थायें फ़ॉलोअर्स बेचती हैं, क्या पता ट्रॉल्स भी बिकते हों ! सोचिए, आप आटा मल रहें हैं या पकौड़े तल रहे हैं कि कॉलबैल बजती है! आप जैसे-तैसे दरवाज़ा खोलते हैं कि एक व्यक्ति कहता है-‘भाई साहब ट्रॉल्स ले लो, सस्ते लगा दूंगा। बिलकुल सच्चे ट्रॉलों जैसे ट्रॉल करते हैं।’
‘काम ही सस्ता करते हैं, सस्ते तो बिकेंगे ही’-आप सोचते हैं।

मंगल बाज़ार लगा है, रात के ग्यारह-बारह बजे हैं। ट्रॉल्स् पड़े-खड़े सड़ रहे हैं। ठेलीवाला कहता है-‘रात का बखत है, एक किलो ले लो, जितने बचे हैं सब डाल दूंगा।’

कोई दोस्त आपसे मिलता है। उसके साथ एक और व्यक्ति है जिसका परिचय वह यह कहकर आपसे कराता है-‘इनसे मिलिए, हमारे पुराने मित्र हैं, क्या ज़बरदस्त ट्रॉल करते हैं, कई लोगों का कैरियर बनाया है इन्होंने।’

एक पुरानी परिचित महिला कहती है-‘मेरे बेटे की जॉब लग गई। आजकल एक विशेष पद का सृजन किया गया है-‘ट्रॉल’, बड़े-बड़ों को ट्रॉल करेगा मेरा बेटा। छोटों को ट्रॉल करके बड़ा बनाएगा।’

एक दिन आएगा जब लोग अपने बच्चों का नाम भी ऐसा ही रखेंगे-‘ये मेरी लड़की ट्रॉली, और ये मेरी बुआ का लड़का ट्रालू। कित्ते प्यारे लगते हैं न!’

एक भिखारी किसीसे कहता है-‘अरे भीख नहीं देते तो थोड़ा ट्रॉल ही कर दो !’
‘हट बे! हमारे पास फ़ालतू टाइम नहीं कि मुफ्त में लोगों को ट्रॉल करतें फिरें’-जवाब मिलता है। पता चलता है कि भिखारी से कम तो ये भी नहीं है।

ट्रॉल के शौक़ीन लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है। कोई उन्हें ट्रॉल नहीं करता] इस नाराज़गी में उन्हानें लोगों को ट्रॉल करना शुरु कर दिया है।

-संजय ग्रोवर
21-05-2019

रविवार, 14 अप्रैल 2019

कहो भीड़ बन जाऊं क्या

ग़ज़ल

मैं भी प्यार ‘जताऊं’ क्या
झूठों में मिल जाऊं क्या

15-03-2019

जिस दिन कोई नहीं होता
उस दिन घर पर आऊं क्या

जीवन बड़ा कठिन है रे

फिर जीकर दिखलाऊं क्या

इकला हूं मैं बचपन से 

कहो भीड़ बन जाऊं क्या

जब खाता तब खाता हूं

तुमको कुछ मंगवाऊं क्या

जो-जो मैंने काम किए

तुमको भी दिखलाऊं क्या

यूंही जलती रहती है

बत्ती सुनो बुझाऊं क्या

मैं दुनिया से नहीं मिला

तो मैं जां से जाऊं क्या

कभी-कभी डर लगता है

सुनो अभी मर जाऊं क्या
14-04-2019
       -संजय ग्रोवर 



शुक्रवार, 15 मार्च 2019

मैं पशोपेश में रहा

ग़ज़ल


मैं अपने देश में रहा
मैं पशोपेश में रहा

सदा तक़लीफ़ में रहा
ज़रा आवेश में रहा

वही होगा मेरा रक़ीब
जो कई वेश में रहा

मैं क्यों ईमानदार हूं
बहुत वो तैश में रहा

न मैं अमीर में रहा
न ही दरवेश में रहा



-संजय ग्रोवर
15-03-2019


बुधवार, 13 मार्च 2019

संवाद का स्तर और उसे करनेवालों की नीयत (decency in dialogue and fraudulence of behaviour)

जब पढ़ते थे तो तरह-तरह के लोगों को पढ़ते थे। साहित्य अच्छा तो लगता ही था मगर यह दिखाना भी अच्छा लगता था कि ‘देखो, हम दूसरों से अलग हैं, हम वह साहित्य भी पढ़ते हैं जो हर किसी की समझ में नहीं आता।’ अब सोचते हैं कि हमारी भी समझ में कितना आता था! गुलशन नंदा, रानू, कर्नल रंजीत के उपन्यास ले चुकने के बाद जब हम अदला-बदली करनेवालों से पूछते कि ‘कुछ साहित्यिक नहीं है क्या तुम्हारे पास’ तो वे कहते ‘हां है न, शिवानी है, चतुरसेन है, दत्त भारती है.........’

दत्त भारती कुछ समझ में आते थे, उन्हें काफ़ी पढ़ा। उस वक़्त आत्मविश्वास कम था, दबाव में आकर चतुरसेन और शिवानी को पढ़ने के लिए ख़ुदपर काफ़ी अत्याचार किया। पता नहीं इन लोगों ने कहानी लिखने के कौन-से कोर्स कर रखे थे, हमने कहानी पढ़ने का कोई कोर्स किया नहीं था, शायद इसीलिए इनसे कोई तालमेल बैठ न पाया। शिवानीजी के साहित्य को याद करने बैठें तो तीन-चार ही शब्द बार-बार याद आते हैं-गौरवर्ण, उन्नत और ललाट। आज सोचते हैं कि अगर आज भी हम दिल्ली के किसी मज़दूर या रिक्शावाले के सामने  ये चार शब्द बोल दें तो वह घबरा जाएगा कि ‘भाईसाहब, पहले ही परेशान हैं, आप अंग्रेज़ी बोलकर और क्यों डरा रहे हो.......’

शिवानीजी की एकाध कहानी धुंधली-सी याद आती है कि किस तरह अच्छी-अच्छी बातें करनेवाले और बढ़िया नशा मिला खाना खिलाने वाले लोग आखि़र में दूसरों को ठगकर ग़ायब हो जाते हैं। भारी-भरकम हिंदी में लिखी गई इस तरह की हल्की-फ़ुल्की कहानियां आज बेहतर ढंग से समझ में आती है। आज अपने अनुभवों से और टीवी देख-देखकर हम यह अच्छी तरह जान चुके हैं कि अच्छी-अच्छी बातों का नशा पिलाकर लोगों को ठगने का काम कौन लोग करते रहे हैं। ऐसे लोगों को ग़ायब भी नहीं होना पड़ता। बल्कि समाज में सबसे ज़्यादा स्थापित वही लोग दिखाई पड़ते हैं। ठगी उनका परमानेंट जॉब है जिसका परमानंद वे ले रहे है।

बाद में सुना कि शिवानीजी के बच्चे वग़ैरह भी कहानियां वग़ैरह लिखने लगे थे। इसमें कुछ बुराई भी नहीं। स्टार-पुत्र अभिषक बच्चन, ऋतिक रोशन, शाहिद कपूर इत्यादि भी काफ़ी समय से फ़िल्म-इंडस्ट्री में जमे ही हुए हैं। छोटे-मोटे कोर्स हर कहीं उपलब्ध हैं।

इस सबके बाद सोचते हैं कि कितना अच्छा हुआ कि हम पर तथाकथित महान लोगों की परछाईयां नहीं पड़ी वरना हम भी इंसानियत, ईमानदारी और इस देश   का श्राद्ध करके कई बार खा गए होते, 
बिना कोई कोर्स किए ही.

-संजय ग्रोवर

(4 अप्रैल 2015 को फ़ेसबुक पर)

बुधवार, 9 जनवरी 2019

अलग तरह की अहिंसा

व्यंग्य


भक्त बताते हैं कि गांधीजी धर्मनिरपेक्ष आदमी थे। आपको मालूम ही है आजकल भक्तों से तो भक्त भी पंगा नहीं लेते। लेकिन इससे एक बात पता लगती है कि धर्मनिरपेक्ष लोगों के भी भक्त होते हैं।

मैंने सुना है कि ख़ुद गांधीजी भी राम के भक्त थे। हालांकि गांधीजी अहिंसक थे और राम तीर लिए घूमते थे और उन्होंनें काफ़ी लोगों को युद्ध में मारा भी था। गांधीजी गीता भी पढ़ते थे जिसमें बताया जाता है कि काफ़ी मारकाट हो रखी थी। आज होते तो शायद वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यास भी पढ़ते, शायद सुरेंद्रमोहन पाठक की विमल सीरीज़ का बखिया-कांड उनको काफ़ी मुआफ़िक आता।

अगर कोई बच्चा ग़लती से भी पूछ ले कि भई गांधीजी की इस टाइप की आदतों का उनकी अहिंसा के साथ क्या रिश्ता था तो इस देश के ऐतिहासिक बुद्धिजीवी एक अद्भुत तथ्य का वर्णन करते हैं-

’गांधीजी के राम वो राम नहीं थे, उनके राम अलग थे!!
उनके राम अलग थे ? कैसे ?
बड़ी चमत्कारी बातें हैं, हर किसीको कैसे समझ में आ सकतीं हैं ?
कभी टीवी पर एक सॉस का विज्ञापन आता था, सॉस वही थी जैसे सॉस होती है-लाल रंग की, बोतल भी वही थी, स्वाद भी वही था, लेकिन विज्ञापन में सॉस को चाटने के बाद एक अभिनेता कहता था-‘इट्ज़् डिफ़रेंट’। 
इससे पता लगता है कि किस चीज़ का विज्ञापन किस वक़्त में कैसे करना है, इसका भी काफ़ी फ़र्क़ पड़ता है।

नाथूराम भी तो अलग तरह के राम हैं।

गांधीजी के राम अलग थे तो उनका नाम भी अलग हो सकता था। या फिर हो सकता कि राम को चमत्कारी शक्ति से पता चला हो कि मेरे भक्तों में एक गांधीजी भी होंगे, कुछ काम उनके हिसाब से भी कर चलो जो उनके अलावा बस उनके भक्तों की ही समझ में आ सकें, बाक़ी किसीके पल्ले ही न पड़ें। बड़े भक्तों को एक बार समझ में आ गया तो वो छोटे-मोटे भक्तों को तो किसी भी तरह समझा लेंगे।

गांधीजी के अलग राम से मुझे ‘गोलमाल’ के अमोल पालेकर याद आ जाते हैं जिन्हें किसी मजबूरी में एक ही वक़्त में, एक ही ज़िंदगी में, एक ही दफ़्तर में, एक ही घर में दो-दो रोल करने पड़ रहे थे।

मैं कल्पना करता हूं कि मेरा लेख ऐसे ही किसी अहिंसाप्रेमी ने पढ़ लिया है, कहता है कि ‘चल बदतमीज़, कैसे लेख लिखता है, हम तेरी बिजली काट देंगे, टीवी कनेक्शन उड़ा देंगे, फ़ोन का प्लान बदल देंगे’......मैं कहता हूं कि मैं तो हमेशा से ऐसी ही परिस्थितियों में रहता आया हूं’.....। वो मेरे कान पर दो थप्पड़ जड़ देता है। मैं कहता हूं कि ‘भाई साहब, आपके ऊपर तो अहिंसक का बैनर लगा है’!

वो कहता है-‘यह अलग तरह की अहिंसा है’।

दूसरी कल्पना में एक आदमी मंदिरवादी से पूछता है, ‘भैया, मंदिर तो कहते हैं शांति के लिए होते हैं, तुम इनके लिए लड़ते क्यों हो ?’ आप समझ ही गए होंगे वो क्या जवाब देता है-

‘यह अलग तरह की शांति है’।

जहां तक मुझे पता है राम के काम तो वही थे तीर मारना, युद्ध करना, स्त्रियों के नाक-कानों के कटपीस बनाना, ताड़का-वध, सीता की अग्नि-परीक्षा, आज्ञाकारिता के नाम पर पिता के अन्याय बर्दाश्त करना...। राम एक ग़ुस्सैल और स्त्रीविरोधी व्यक्ति लगते हैं। सही जगह पर अन्याय का विरोध नहीं कर पाए, शायद इसीकी क़ीमत रावण को चुकानी पड़ी। लेकिन एक मामले में राम ने धर्मनिरपेक्षों वाला ही काम किया, सूपर्णखा की नाक छोटे भाई लक्षमण से कटवा दी। अपनी इमेज साफ़ की साफ़ रही आई और लक्षमण की इमेज तो लगता है शुरु से ही कुछ आरएसएस टाइप की चली आ रही थी। इस देश के अटल नायक इसके समानांतर कार्य बाद में भी, लगता है, करते/कराते आए होंगे।

गांधीजी को तो मैंने नहीं देखा पर टीवी पर उनके कुछ भक्तों को ज़़रुर देखा। इनमें एक थे अन्ना हज़ारे जिन्होंने तथाकथित रुप से एक ज़़बरदस्त आंदोलन, भ्रष्टाचार के विरुद्ध छेड़ दिया। आईए, अन्ना हज़ारे की मार्फ़त अहिंसा को समझने की कोशिश करें-

अन्ना हज़ारे-मैं इस देश से भ्रष्टाचार मिटाके रहूंगा। सरकार यहां पर आकर हमसे बातचीत करे।
वरना क्या होगा अन्नाजी ?
मैं अनशन पर हूं, जब तक सरकार मांगे नहीं मानती, अनशन जारी रहेगा।
अनशन जारी रहेगा तो क्या होगा अन्नाजी ?
ज़ाहिर है कि आदमी ज़्यादा दिन भूखा-प्यासा रहेगा तो एक-न-एक दिन उसका देहांत हो जाएगा।
फिर क्या हासिल होगा ?
फिर मरनेवाले के समर्थक, भीड़ में बदल जाएंगे, आग लगाएंगे, दंगे करेंगे, लब्बो-लुआब यह कि भयानक हिंसा कर देंगें।

तो यह है अहिंसा ! इसकी परिणति हिंसा में होगी जिसके अंजाम से पहले ही डराया जा रहा है।
यानि होगी तो हिंसा ही पर भूमिका अहिंसा की बांधी जाएगी।
अपने हाथ से, अपने नाम से नहीं करेंगे तो दूसरे से करवा देंगे।
हमारी इमेज साफ़-सुथरी रहेगी, कोई और बदनाम हो जाएगा। 

इस आंदोलन को आज़ादी का दूसरा आंदोलन कहा गया। मेरी जान-पहचान की एक महिला ने बाद में मुझे बताया कि वह भी इस आंदोलन में थी। मैंने दो-चार तर्कपूर्ण मज़ाक़ अन्ना और आंदोलन के बारे में किए तो वह घबरा गई, बोली-‘अन्ना क्या मेरा चाचा लगता है कि मुझसे हिसाब मांग रहे हो ?’

देश के तमाम चैनल हमारी आंखों के सामने झूठा वर्तमान लिख रहे थे और हम सब पढ़े-लिखे जागरुक लोग देख रहे थे। 

इन्हीं में से कई लोग इतिहास लिखते हैं।

इस आंदोलन की वजह से कई लोगों को आज़ादी के पहले आंदोलन पर भी शक़ होने लगेगा।

फिर आठवें-नौंवे दिन अन्नाजी गुड़गांव के सबसे महंगे बताए जानेवाले अस्पताल में दाखि़ल हो गये (अन्ना के अलावा इस अस्पताल की अच्छी-ख़ासी पब्लिसिटी सारे घुन्ना चैनलोें ने की, अपवाद नाम के लिए भी नहीं है)। चार्ज केजरीवाल ने संभाल लिया।

एक पतला-सा लड़का जो बैंड के पीछे-से लोगों को तालियां बजाने का इशारा करता था, आजकल टीवी पर कई तरह के शो संभाले बैठा है।

अहिंसा कितना कुछ देती है। हालांकि कोई बड़ा अनशन कभी अपने मुकाम या देहांत तक नहीं पहुंचा मगर तथाकथित अहिंसा ने किसीको ग्लैमर दिया, किसीको पॉपुलैरिटी दी, किसीको ऐक्सपोज़र दिया, शो दिलाए, कैरियर दिया, किसीको...... 

दिलचस्प है कि रावण के खि़लाफ़ राम को अनशन का आयडिया क्यों नहीं आया !?
तिसपर और मज़े की बात है कि गांधीजी की आर एस एस से क्या लड़ाई थी ?
वे गीता पढ़ते थे, शराब नहीं पीते थे, ब्रहमचर्य पर भी ज़ोर देते रहे, फ़िल्में नहीं देखते थे, स्वराज और स्वदेशी को पसंद करते थे (क्या आपने कभी ग़ौर किया कि ठीक यही सारी चीज़ें आर एस एस की भी पसंद रहीं हैं), उनका पसंदीदा भजन था-

रघुपति राघव राजा राम
पतित पावन सीता राम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम
सबको सन्मति दे भगवान

ध्यान से पढ़ें-पूरे भजन में रघुपति, राघव, राजा, राम, सीता, राम, ईश्वर, भगवान ही बार-बार आते हैं, धर्मनिरपेक्षता तो नाममात्र के लिए भी मुश्क़िल से आई लगती है। धर्मनिरपेक्षता की इतनी जगह तो कट्टरपंथियों के यहां भी रहती ही है।

वैसे श्री केजरीवाल जी भी पहले आरक्षणविरोधी अंादोलनों के लिए जाने जाते थे, उन्हें भी धर्मनिरपेक्ष बैकडेट में बनाया गया था।
बहरहाल, अंग्रेज़ चले गए, श्री नेहरु भारत के प्रधानमंत्री बने, श्री जिन्ना पाक़िस्तान के सदर बने, गांधीजी कुछ नहीं बने।
उन्हें गोली लग गई।

कहते हैं कि गोली गौडसे नाम के आदमी ने मारी थी। कहते हैं कि गौडसे आर एस एस नाम की संस्था का आदमी था। और आर एस एस एस नामक संस्था किन लोगों ने बनाई थी ? कौन हैं जो ख़ुदको गौड(जै)से समझते हैं ! कौन हैं जो समझते हैं कि सबको सज़ा और मज़ा दिलाने का अधिकार बस हमीं को है।

जिस किसीने भी लिखी थी, गांधीजी की भूमिका शायद ऐसी और इतने तक ही लिखी थी।

हे राम!

-संजय ग्रोवर

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

‘मां की ममता’ बनाम ‘मुन्नी डिग पयी’

मैं तब के वक़्त को याद करना चाहता हूं जब मेरी मां के मैं और मेरी छोटी बहन बस दो ही बच्चे थे। छोटी बहिन
आठ या नौ महीने की और मैं शायद साढ़े तीन या चार साल का था। एक दोपहरबाद मेरी मां रसोई में बैठी जूठे बर्तनों का ढेरा मांज रही थी, मैं उसके पीछे कमरें में बैठा याद नहीं क्या कर रहा था कि पलंग पर पड़ी मेरी दुधमुंही बहन ने करवट बदली और धड़ाम पलंग से नीचे जाकर गिरी।
वो पलंग ऐसा था कि उसके पायों के नीचे दो दो ईंटों की सपोर्ट थी ताकि पलंग फर्श से कदरन ऊंचा हो जाए और नीचे की जगह को स्टोरेज के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
यानी बहन न सिर्फ़ गिरी, कदरन ज्यादा ऊंचाई से गिरी।
‘‘चाई!’’-मैंने शोर मचाया-‘‘मुन्नी डिग पयी ! मुन्नी डिग पयी !’’
‘चाई ने क्या किया?
बर्तन मांजने बंद कर दिए? हाहाकार करती मुन्नी को उठाने दौड़ी?
नहीं।
उसने मुड़कर भी न देखा, वो निर्विकार, बदस्तूर बर्तन मांजती रही और जब तक न उठी जब तक कि उसका वो काम ख़त्म न हो गया।
मुन्नी की बद्क़िस्मती देखिए कि वो जहां गिरी, वहां उसकी कांच की दूध की बोतल पड़ी थी, उसका सिर बोतल से टकराया, बोतल फूट गयी और कांच उसके सर में धंस गया।
मुन्नी बोतल पर गिरी थी, शीशा उसके सर में धंस गया था, जख्म से खून बह रहा था, ये बातें नीमअंधेरे में फौरन मेरी तवज्जो में नहीं आयी थीं वर्ना मैं उस बाबत भी कोई होहल्ला मचाता तो मां शायद उतनी निर्विकार, निर्लिप्त न रह पाती।
आखिर जब मैं मुन्नी के करीब गया तो वो बात उजागर हुई।
मुन्नी के सिर से खून बह रहा था, मैं कभी उसको कभी मां की पीठ को देख रहा था, मां अपना काम कर रही थी जो सबसे ज़रुरी था, जो बीच में नहीं छोड़ा जा सकता था।
आखिर उसका काम खत्म हुआ तो उसने उठकर जमीन पर पड़ी रोते रोते ही सो गयी मुन्नी की सुध ली। सुध क्या ली, फर्श से उठाया, सिर का खून पोंछा और वापिस पलंग पर लिटा दिया, अलबत्ता इस बार ये एहतियात बरती कि पहलू के साथ एक तकिये की रोक लगा दी ताकि दोबारा न गिर जाए।

-सुरेंद्र मोहन पाठक
(अपनी आत्मकथा ‘न बैरी न कोई बेगाना’ में)   


सोमवार, 29 अक्टूबर 2018

बात यूं है कि बात कुछ भी नहीं

गज़ल

हाथ आई हयात कुछ भी नहीं
बात यूं है कि बात कुछ भी नहीं
                                                        11-01-2013
यू तो मेरी औक़ात कुछ भी नहीं
काट लूं दिन तो रात कुछ भी नहीं
                                                        29-10-2018
मुझको, सच में, बयान कर न सके
वो तेरे इल्ज़ामात कुछ भी नहीं
                                                       12-09-2018
मुझसे दिनवाले लुटेरों ने कहा
अपने आगे बारात कुछ भी नहीं

झूठ बोलूंगा, ख़ुदसे हारुंगा
सच कहूंगा तो मात कुछ भी नहीं
                                                                  12-09-2018


-संजय ग्रोवर
29-10-2018

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

बैन करेगा क्या / ख़ुद क़िताब हो लें

Photo By Sanjay Grover
ग़ज़ल

आओ सच बोलें
दुनिया को खोलें

झूठा हंसने से
बेहतर है रो लें

पांच बरस ये, वो
इक जैसा बोलें

अपना ही चेहरा
क्यों ना ख़ुद धो लें

राजा की तारीफ़
जो पन्ना खोलें !

क्या कबीर मंटो-
किस मुह से बोलें !

सबको उठना है-
सब राजा हो लें ?

वे जो थे वो थे
हम तो हम हो लें

बैन करेगा क्या
ख़ुद क़िताब हो लें

-संजय ग्रोवर
01-10-2018

रविवार, 26 अगस्त 2018

सच बोलना है मुश्क़िल, लेकिन है गाना आसां

ग़ज़ल

जब खुल गई पहेली, तो है समझना आसां
सच बोलना है मुश्क़िल, लेकिन है गाना आसां 

पहले तो झूठ बोलो, ख़ुद रास्ता बनाओ

फिर दूसरों को सच का रस्ता बताना आसां

वैसे तो बेईमानी .. में हम हैं पूरे डूबे

माइक हो गर मुख़ातिब, बातें बनाना आसां

हालांकि यूं ही अकड़े, आखिर तो गए पकड़े

मौसेरा भाई पकड़े, है पकड़े जाना आसां

जो तुम तलक है पहुंचा, उन तक भी पहुंच जाए

तुम बन गए अगर तो, उनको बनाना आसां

मैं हर समय हूं जागा, है तब ही मैंने देखा

है जागने की कहकर, सबको सुलाना आसां

-संजय ग्रोवर
26-08-2018


बुधवार, 8 अगस्त 2018

जाने कैसा ख़ालीपन है ख़ानदानों में

ग़ज़ल

भागते फिरते हैं वो सुंदर मकानों में
ठग कहीं टिकते नहीं अपने बयानों में

शादियों में नोंचते हैं फूल अलबत्ता
प्यार की भी कुछ तड़प होगी सयानों में

नम्र लहज़ों के लिफ़ाफ़ों में जदीदे-मुल्क़
पकड़े जाते हैं हमेशा कन्यादानों में

भीड़ में इनका गुज़र है, भीड़ में आनंद
जाने कैसा ख़ालीपन है ख़ानदानों में

जाने क्या सिखलाया ख़ुदने व्याख्यानों में
आजकल डरते हैं ख़ुदके संस्थानों में

हमको भी सच्चा कहो, हमको भी ईमांदार
यह हवस देखी गई है बेईमानों में

मैं किसीको हुक्म देता हूं, न लेता हूं
इसलिए पाया न जाता हुक्मरानों में



-संजय ग्रोवर
08-08-2018

अलबत्ता = इसके बावजूद, हालांकि, फिर भी,  however, nevertheless, । जदीदे-मुल्क़ = देश का (तथाकथित) प्रगतिशील, (so-called) progressive people of nation । कन्यादान = एक शर्मनाक़ रस्म जिसमें कन्या को वस्तु की तरह दान किया जाता है,  an embarrassing ceremony/ritual in which the girl is donated like an object । हुक्मरान = शासक, तानाशाह, rulers, dictators

बुधवार, 27 जून 2018

एक मुर्दा कहीं से ले आओ

photo by Sanjay Grover
ग़ज़ल


भीड़, तन्हा को जब डराती है
मेरी तो हंसी छूट जाती है

सब ग़लत हैं तो हम सही क्यों हों

भीड़ को ऐसी अदा भाती है

दिन में इस फ़िक़्र में हूं जागा हुआ

रात में नींद नहीं आती है

भीड़, तन्हा से करती है नफ़रत
और हक़ प्यार पे जताती है

एक मुर्दा कहीं से ले आओ

भीड़ तो पीछे-पीछे आती है

पूरी औरत को करके अंगड़ाई

शायरी कैसा सितम ढाती है

आज इक और बात कह डाली

देखिए किसको समझ आती है

-संजय ग्रोवर
27-06-2018


देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

#girls #rape #poetry #poem #verse # लड़कियां # बलात्कार # कविता # कविता #शायरी (1) अंतर्द्वंद (1) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अकेला (3) अनुसरण (2) अन्याय (1) अफ़वाह (1) अफवाहें (1) अर्थ (1) असमंजस (2) असलियत (1) अस्पताल (1) अहिंसा (3) आंदोलन (4) आकाश (1) आज़ाद (1) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (2) आत्मकथा (1) आत्मविश्वास (2) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आभास (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (4) इतिहास (2) इमेज (1) ईक़िताब (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (2) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उर्दू (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचा (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (2) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? 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