रविवार, 14 अप्रैल 2019

कहो भीड़ बन जाऊं क्या

ग़ज़ल

मैं भी प्यार ‘जताऊं’ क्या
झूठों में मिल जाऊं क्या

15-03-2019

जिस दिन कोई नहीं होता
उस दिन घर पर आऊं क्या

जीवन बड़ा कठिन है रे

फिर जीकर दिखलाऊं क्या

इकला हूं मैं बचपन से 

कहो भीड़ बन जाऊं क्या

जब खाता तब खाता हूं

तुमको कुछ मंगवाऊं क्या

जो-जो मैंने काम किए

तुमको भी दिखलाऊं क्या

यूंही जलती रहती है

बत्ती सुनो बुझाऊं क्या

मैं दुनिया से नहीं मिला

तो मैं जां से जाऊं क्या

कभी-कभी डर लगता है

सुनो अभी मर जाऊं क्या
14-04-2019
       -संजय ग्रोवर 



2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-04-2019) को "तुरुप का पत्ता" (चर्चा अंक-3307) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-04-2019) को "तुरुप का पत्ता" (चर्चा अंक-3307) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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