ग़ज़ल
उनकी ख़ूबी मुझे जब ख़राबी लगी
उनको मेरी भी हालत शराबी लगी
उम्र-भर उनके ताले यूं उलझे रहे
वक़्त पड़ने पे बस मेरी चाबी लगी
उनके हालात जो भी थे, अच्छे न थे
उनकी हर बात मुझको क़िताबी लगी
उनके पोस्टर पे गांधीजी चस्पां थे पर
उनके गुंडों की नीयत नवाबी लगी
मिलना-जुलना मुझे उनका अच्छा लगा
भ्रष्ट थे सबके सब, ये ख़राबी लगी
-संजय ग्रोवर
गज़ल
सुबह देर तक सोने का
आज का दिन था रोने का
09-05-2017
मिला वक़्त जब सोने का
वक़्त था सुबह होने का
माफ़िया चाहे जो कर ले
माफ़िया-सा नहीं होने का
ज़िंदा रहूं दिखाने को
यह नहीं मुझसे होने का
यही तो मेरा हासिल हैं
दाग़ नहीं मैं धोने का
11-01-2018
सभी तमाशे में शामिल
इनसे क्या है होने का
09-05-2017
-संजय ग्रोवर
12-01-2018
देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....