बुधवार, 7 जनवरी 2009

औरत: दैहिक स्वतंत्रता और सामाजिक उपयोगिता के सवाल

मित्रों,ब्लाग का नाम संवादघर रखते समय मन में यही विचार था कि विभिन्न मुद्वों पर घरेलू माहौल में एक सार्थक संवाद चलाया जाए जिसमें बिना किसी भेदभाव के हर कोई हिस्सेदारी कर सके। कई संवेदनशील विषयों में से एक नारी-मुक्ति भी था जिसपर बात करते हुए मैं, एक समय में, जिहादी अंदाज़ में भावुक हो जाया करता था। कुछ लेख अमर उजाला में व कुछ कविताएं यत्र-तत्र छपीं भी थीं। ब्लाग बनाने के बाद तांका-झांकी और ढूंढा-ढांढी के तहत ‘‘चोखेर बाली’’ पर जा पहुँचा। किसी विषय पर बहस छिड़ी हुई थी। मैं भी घुस पड़ा और बहस में शामिल हो गया। पुराने दिन याद आ गए। बता दूं कि ‘‘चोखेर बाली’’ नामक ब्लाॅग की माॅडरेटर सुजाता हैं और बहुत ही कुशलता पूर्वक वे नारी-विमर्श से संबंधित मुद्वे उठाकर बहस का संचालन करती हैं। ‘‘बहस-स्थल’’ पर ही मैंने उनके सम्मुख प्रस्ताव रखाः-
सुजाता जी,नए साल में औरतों के मसअलों से जुड़ा एक स्तम्भ शुरु कर रहा हूँ ‘‘दुनिया बसाऊँगी तेरे घर के सामने।’’ चाहता हूँ कि इंस स्तम्भ का ‘‘उदघाटन’’ आप करें। यानि कि पहली टिप्पणी आप करें। क्या आप मेरा आमंत्रण स्वीकार करती हैं। मैं खुदको गौरवान्वित महसूस करुंगा।31।12।2008







कुछ प्रतीक्षा के बाद सुजाताजी का जवाब भी उभरा:-
संजय जी,
मुझे आमंत्रण देने के लिए धन्यवाद । ज़रूर टिप्पणी करूंगी ।
स्तम्भ के नाम को लेकर मन मे ज़रा संशय है। आप उस पर पुनर्विचार कर सकें तो बेहतर। इस शीर्षक में 'तेरे' कौन है यदि यह पुरुष के लिए है तो दिक्कत यह है कि स्त्री अपना संसार बसाती है तो उसका सन्दर्भ हमेशा पुरुष ही क्यों होगा । साथ ही यह एक प्रतिस्पर्द्धा की भावना भी दर्शाती है. 'तेरे घर के सामने' आमने.सामने वाली बात आ जाती है। दर असल स्त्री जो पाना चाहती है वह पुरुष की होड़ करने का अर्थ लगाकर कभी सही समझ नही जा सकता ऐसा मुझे प्रतीत होता है। इन कारणों पर गौर कर सकें तो बहुत अच्छा होगा।31.12.2008
तब मैंने उन्हें बताया:-
सुजाताजी,,मैं कोई बहानेबाज़ी नहीं करुंगा। ‘तेरे’ से मतलब पुरुष से ही है। मैं आपकी बात से सहमत भी हूँ। फ़िर भी मेरे मन में जो बात थी वो तो कह ही दंू। निहितार्थ यह भी था कि तुमने सिर्फ अपने तक सीमित रहकर घर बसाया है जो कि पितृसत्ता या पुरुष-सत्ता का प्रतीक है। मै एक खुली हुई दुनिया बसा दूंगी जहाँ सब बराबर होंगे। दूसरे, मेरे मन में अपने स्तम्भों के शीर्षकों को ब्लाॅग (संवादघर) के नाम से जोडे़ रखने का लालच भी था (मसलन व्यंग्य-कक्ष)। साथ ही मैंने उसके लिए एक लोगो (प्रतीक-चिन्ह/चित्र...वैसे मुझे यद नहीं आ रहा इसके लिए सही शब्द क्या होता है।) भी बना डाला है। पहले मैंने स्तम्भ के लिए ‘‘सीढ़ियों पर’’ और ’’हटी है चिलमन, खुला है आंगन’’ जैसे नाम भी सोचे थे। बहरहाल, फिलहाल अगर आप अन्यथा न लें तो, इसी शीर्षक से शुरु कर सकते हैं, बाद में आपकी सहमति से शीर्षक बदल लेंगे। इस पूरे प्रकरण में फायदे की बात यह है कि शुरुआत आपकी शीर्षक पर की गयी इसी टिप्पणी से की जा सकती है। बाद की आपकी टिप्पणी ‘‘समापन-उदघाटन’’ होगा। (वैसे क्या ऐसी बहसों का कभी समापन हो सकता है जो अभी ठीक से शुरु भी नहीं हुई!)तो क्या आप सहमत हैं ?
आमंत्रण स्वीकार करने के लिए धन्यवाद।31.12.2008
शुरुआत उस लेख से कर रहा हूँ जो अमर उजाला, रुपायन में 1996 में छपा था। इन 12-13 सालों में दुनिया कितनी बदली ? पुरुष की मानसिकता में कितना बदलाव आया और ख़ुद स्त्री की में कितना ? आया कि नहीं आया ? हम आगे गए या पीछे ? बता दंू कि मधु सप्रे और मिंलिंद सोमन तब के प्रसिद्ध माॅडल थे और दोनों साथ-साथ, एक विज्ञापन में लगभग वस्त्रहीन दृश्य देने की वजह से चर्चा में आ गए थे। लेकिन लगभग सभी संचार माध्यम हाथ धोकर सिर्फ मघु सप्रे के पीछे पड़ गये थे। यही मुद्दा मैंने इस लेख में उठाया था। अंजलि कपूर जो कि एक वकील थीं, भी ऐसे ही एक विज्ञापन की वजह से मुश्किल में पड़ गयीं थीं। सुजाताजी की टिप्पणी इन सवालों को शायद कुछ हल्का-गहरा करे या शायद कुछ नए सवाल उठाए। ख़ुद मैं वैचारिक रुप से तब कहाँ था और अब कहाँ हूँ, यह जानने में आपकी टिप्पणियों से भी मदद मिलेगी।
लेख
दैहिक स्वतंत्रता और सामाजिक उपयोगिता के सवाल
इस समय नारी देह के अनावरण और शोषण को लेकर चर्चा गर्म है । शायद पुरुष जानता है कि दैहिक पवित्रता, मर्यादा, यौनशुचिता के गीत गाकर ही अभी और कुछ दिन तक नारी का शोषण किया जा सकता है ।
प्रगतिशील महिलाएं तक इस शाब्दिक झांसे में फंसकर खुद को देह में कैद कर लेती है । सालो-साल पुराना लोगों का मानसिक अनुकूलन यथास्थितिवादी-सामंतवादी सोच के लोगों के पक्ष में चला जाता है ।
हालांकि जिन कारणों से नारी देह अनावृत होती है, लगभग उन्हीं कारणों से पुरुष देह भी अनावृत होती रही है, मगर आदत में आ जाने के कारण लोगों का ध्यान उस पर इस तरह से नहीं जाता । मजे की बात है कि कोई ममता कुलकर्णी या पूजा बेदी हमेशा अकेली वस्त्रहीन नहीं होती या चुंबन दृश्य नहीं देती । कोई-न-कोई संजय दत्त, सुनील शेट्टी या सनी देओल भी इनके साथ होते हैं । मगर हमारा ऐतराज अक्सर ममता या पूजा पर ही होता है ।
हमारे संस्कारित-अनुकूलित दिल-दिमाग में क्यों यह ख्याल तक नहीं आता कि स्त्री मन को उत्तेजना व सुख देने के लिए मर्दानी देह को भी वैसे ही बेचा जाता है । अगर नहीं तो राहुल राय, कुमार गौरव या दिलीप कुमार की तुलना में धर्मेद्र, जैकी श्राफ या मिथुन को ही क्यों ज्यादा नंगाया जाता है । विभिन्न व्यवसायों से जुडे़ बहुत से पुरुष भी मॉडलिंग करते हुए कपडे़ उतारते होंगे, मगर हम सिर्फ वकील अंजलि कपूर को फाड़ कर खा जाने पर आमादा हैं । कपडे़ मिलिंद सोमन ने भी उतारे थे, पर हमने सारी बहादुरी मधु सप्रे पर हमला करने में ही खर्च कर दी । दरअसल ये सभी घटनाएं साफ-साफ बताती हैं कि हम स्त्री को एक संपूर्ण इंसान के रूप में नहीं देख पा रहे हैं ।
तिस पर और मज़ा यह कि हमारे कथित धार्मिक-आध्यात्मिक सुसंस्कृतजन कहते आए हैं कि हमारे यहां देह से ज्यादा महत्व आत्मा (?) को दिया जाता है । जबकि स्त्री (व पुरूष) को सारी सजाएं देह की देहरी लांघने पर ही दी जाती हैं । मन के तहखाने में कोई स्त्री या पुरूष किसी पराए के साथ या हजार साथी बदलकर रहें, कथित धर्म को कुछ लेना-देना नहीं, मगर बात जैसे ही देह तक आई तो स्पर्श भी दंडनीय है । इससे ज्यादा देह को महत्व देना और क्या होगा ? सारे नीतिगत मानदंड ही देह के आचरण पर टिके हैं ।
स्त्री को अपनी कई समस्याओं से जूझने-निपटने के लिए देह से मुक्त तो अब होना ही होगा और इसके लिए उसकी अनावृत देह को भी पुरूष अनावृत देह की तरह सामान्य जन की आदत में आ जाने वाली अनुत्तेजक अवस्था के स्तर पर पहुंचाना होगा । यह जरूर है कि कौन स्त्री कैसे रहना चाहती है, इसके फैसले उसके अपने होने चाहिएं। मानसिक-शारीरिक रूप से नाबालिग लड़कियों की बात छोड़ दें तो ममता कुलकर्णी या अंजलि कपूर के जीवन को तय करने वाला मैं या कोई और क्यों हो ? मानसिक बालिगपन कैसे तय हो, यह अलग से एक विचारणीय मुद्दा है ।
जहां तक पुरूष केंन्द्रित व्यवस्था का सवाल है, पुरूष कैसे प्रभु बना-इस पर बहुत कहा-सुना गया। मगर अब वह शायद इसलिए भी प्रभु है कि हमारे सामाजिक ढांचे में माता-पिता के बहुत सारे स्वार्थ जैसे वंश चलाना, कमाकर खिलाना, माँ-बाप का नाम रोशन करना, बुढापे का सहारा बनना आदि पुत्र से ही पूरे होते हैं । यह पुत्र की अस्मिता से प्रेम नहीं, बल्कि उसकी तात्कालिक/दीर्घकालिक उपयोगिता का लालच है, जो हमारे स्वार्थपरक सामाजिक,व्यक्तिगत संबंधों की कलई भी खोलता है । बदलते परिवेश में ज्यों-ज्यों स्त्रियां इस दृष्ठि से उपयोगी होती जाएंगी, मां-बाप का ‘प्यार’ स्वतः ही उन पर भी उमड़ने लगेगा । अब भी कई घरों में देखने को मिलता है कि ‘अव्यावहारिक’ व ‘नाकारा’ पुत्र उपेक्षित व अपमानित होते रहते हैं व ‘प्रैक्टीकल’ व ‘सोशल’ लड़कियों के गीत गाए जाते हैं ।
हां, उन विद्वानों-आलोचकों से बहस करना अभी भी बहुत मुश्किल है, जो विचार को बकरा मानकर कसाई की तरह एक ही ‘झटके’ में तय कर देते हैं कि कौन-सी मानसिकता विकृत है और कौन-सी ‘सुकृत’।
और यह रही ‘चोखेर बाली’ की माडरेटर, हमारी विशेष सम्मानित अतिथि सुजाता जी की उदघाटक टिप्पणी:-
संजय जी,
आपका सवाल बहुत जायज़ है लगभग वैसा ही जो गालियों पर लिखी गयी चोखेर बाली की पोस्ट्स मे था। स्त्री शरीर के डीसेक्शुअलाइज़ेशन के बारे मे एक पोस्ट राजकिशोर जी की भी पढियेगा । जैसा कि आपने लिखा भी है कि लेख 12-13 साल पुराना है, वह झलक मिलती है । अगर हम ग्लैमर की दुनिया की बात करें तो इस तरह की बातें अब गम्भीर तूफान नही उठाती, समाज मे भी एक अलहदा वर्ग है जहाँ ये बातें मायने नही रखती । स्क्रीन पर बहुत कुछ है जो कि अब हैरानी की बात नही है ।
लेकिन सोचने की बात है कि देह मुक्ति का मतलब स्त्री के लिए क्या है ? आपने लिखा:-
यह जरूर है कि कौन स्त्री कैसे रहना चाहती है , इसके फैसले उसके अपने होने चाहिएं.. सही बात है, लेकिन अभी सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह फैसला लेते हुए कोई स्त्री अपने समाज, संस्कृति, परम्परा, परिवेश, ट्रेनिंग वगैरह से बिलकुल निरपेक्ष होती है ?
उसके अपने फैसले जैसी टर्म दर असल धोखा है क्योंकि बहुत से कारक आपके निर्णयों को प्रभावित कर रहे होते हैं । यह स्थिति पुरुष के साथ, किसी भी समाजिक प्राणी के साथ है, दिक्कत यह है कि स्त्री के साथ बहुत गम्भीर और योजनाबद्ध तरीके से है।
हमारी बेटी क्या चाहती है इसे प्रभावित करने मे हमारी और बाहर की दुनिया की बहुत बड़ी भूमिका है । शिक्षा , औपचरिक व अनौपचारिक, की अहम भूमिका है।
जिस तरह हम जेन्डरिंग की प्रक्रिया मे बदलाव नही लायेंगे तब तक स्त्री को भी यह भ्रम रहेगा कि उसकी "मुिक्त" के मायने ममता कुलकर्नी या मल्लिका शेरावत हो जाने के रास्ते से हासिल होंगे । वह यह कैसे जान पाएगी कि वह कहाँ कहाँ सिर्फ मोहरा बन रही है और मान रही है कि वह मुक्त हो रही है। आपके लेख से भी यह भ्रम पैदा हो रहा है कि मधु सप्रे हो जाना मुक्त हो जाना है।
देह-मुक्ति क्या है स्त्री के लिए, यह एक बड़ा सवाल है । आशा है आपके इस कॉलम के माध्यम से हम सभी स्त्री मुक्ति के अन्य पहलू से परिचित हो सकेंगे ।
शुभकामनाएँ !
हाँ, आपके लेख मे और उससे पूर्व मेरी टिप्पणी मे कुछ फ़ॉंट की गलतियाँ दिखाई दे रही हैं, शायद आपके यहाँ ऐसा न दिख रहा हो।
सुजाता
मित्रों, अब आपकी बारी है(इसी दौरान मैं भी अपनी बात रखूंगा) :-

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

ए नए साल बता

ai naye Saal Bataa, Tujh Mein Naya-Pan Kya Hai
Har Taraf Khalq Ne Kyun Shoor Macha Rakha Hai

Roshni Dinn Ki Wohi, Taroo Bhari Raat Wohi
Aaj Hum Ko Nazar Aati Hai Har Baat Wohi

Aasmaan Badla Hai Afsoos, Na Badli Hai Zamein
Ek Hindsey Ka Badalna Koi Jiddat Tou Nahien

Agley Barsoun Ki Tarha Houn Ge Qareeney Tere
Kisey Maloom Nahien Barah Maheeney Tere

January, Faburary Aur March Mein ParDey Sardi
Aur April, May, June Mein Ho Gi Garmi

Tera Mann Dahar Mein Kuch Khoye Ga Kuch Paye Ga
Apni Maiyaad Bassar Kar Kay Chalaa Jaaye Ga

Tu Naya Hai Tou Dikha Subha Nayi, Shaam Nayi
Warna Inn Aankhoun Ney Dekhey Hein Naye Saal Kayi

Be-Sabbab Daytey Hein Kyun Loog Mubaaraqbaadein
Ghaliban Bhool Gaye Waqt Ki KarDwi Yaadein

Teri Aamad Se Ghatti Ummar, Jahaan Mein Sab Ki
Faiz Ney Likhi Hai Yeh Nazam Niraaley Dhabb Ki

Poet: Faiz Ahmed Faiz-------------------------------------------------------------------------

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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