गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

गज़ल जो अब तक छपी नहीं/पढ़ो कहीं तो पढ़ो यहीं...........


कल जब सुनील भाई ने कहा कि टापिक बदलो और अनुराग भाई ने कहा हमें आपके स्वास्थ्य की चिंता होने लगी है। तो मुझे भी लगा कि माहौल बदला जाए। आज एक नयी और अप्रकाशित गज़ल पोस्ट कर रहा हूं:-

ग़ज़ल

उसको मैं अच्छा लगता था
मैं इसमें क्या कर सकता था

एक ग़ज़ब की सिफ़त थी मुझमें
रोते-रोते हंस सकता था

नज़र थी उसपे जिसके लिए मैं
फ़कत गली का इक लड़का था

जाने क्यूं सब दाँव पे रक्खा
चाहता तो मैं बच सकता था

मेरा ख़ुदको सच्चा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था

मैं सब खुलकर कह देता था
कोई भी मुझ पर हंस सकता था

मेरा उसको अच्छा कहना
उसे बुरा भी लग सकता था


बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
किसी भी हद तक गिर सकता था

ख़ानदान और वंश के झगड़े !
मै तो केवल हंस सकता था

-संजय ग्रोवर

16 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
    किसी भी हद तक गिर सकता था

    वाह संजय जी वाह....बहुत खूब कहा है आपने...बधाई...

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  2. "बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
    किसी भी हद तक गिर सकता था"

    ये पंक्तियाँ काफी अच्छी लगी ...

    संजय भाई , आपकी ग़ज़लों में गज़ब की धार है .....हर शेर उम्दा और वजनदार...बधाईयाँ !

    उत्तर देंहटाएं
  3. संजय ग्रोवर जैसा शायर
    ऐसी बातें कह सकता था

    उत्तर देंहटाएं
  4. Ye kya kah diya zalim....
    Bhatnaagar ji aapne to maar hi daala...
    Neeraj Goswami ji aur Raveendra Prabhat ji ne wahi sher pasand kiya jo khud mujhe behad pasand hai. Bahut-Bahut Shukriya.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
    किसी भी हद तक गिर सकता था

    बेहद खुबसूरत रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  6. जाने क्यूं सब दाँव पे रक्खा
    चाहता तो मैं बच सकता था

    बहुत अच्छे दोस्त ....

    उत्तर देंहटाएं
  7. उसको मैं अच्छा लगता था
    मैं इसमें क्या कर सकता था
    sundar--sundar

    उत्तर देंहटाएं
  8. जाने क्यूं सब दाँव पे रक्खा
    चाहता तो मैं बच सकता था

    umda sher!
    bahut achchee gazal likhi hai!

    उत्तर देंहटाएं
  9. Waah Waah Grover ji tusi vi....?
    Chlo bhot bhot vdaiyan....!!

    उसको मैं अच्छा लगता था
    मैं इसमें क्या कर सकता था

    Usko tu accha lagta tha
    ek umda sa she'r kah sakta tha....??

    उत्तर देंहटाएं
  10. oji harkiratji, gall saaf nai hoyi. Ai tusii vadhaayi ditti e ke mazaak marya e. Vaise maiN annu shaabaashi samajh ke aapni peeth thapthapaa litti e.

    उत्तर देंहटाएं
  11. उसको मैं अच्छा लगता था
    मैं इसमें क्या कर सकता था
    एक ग़ज़ब की सिफ़त थी मुझमें
    रोते-रोते हंस सकता था

    grover sahab mujhe aapki gazal ka yah sher bahut achha laga. vaise to puri gazal hi bahtareen hai

    उत्तर देंहटाएं
  12. बेहद ऊँचा उड़ा वो क्यूंकि
    किसी भी हद तक गिर सकता था
    वाह संजय जी आनन्द आ गया बधायी....

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

पुराने पोस्ट पढने के लिए इस पोस्ट के नीचे दाएं ‘पुराने पोस्ट’ पर क्लिक करें-

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अनुसरण (1) अफवाहें (1) असमंजस (2) अस्पताल (1) अहिंसा (2) आंदोलन (4) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (3) आत्मविश्वास (2) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (1) इतिहास (1) इमेज (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (1) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचाई (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (1) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (3) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कम्युनिज़्म (1) कविता (57) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (3) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) खीज (1) खेल (1) गज़ल (4) ग़जल (1) ग़ज़ल (26) गाना (2) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (2) ग़ुलामी (1) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (3) चलती-फिरती लाशें (1) चालू (1) चिंतन (1) चिंता (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) जागरण (1) जाति (1) जातिवाद (2) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) टॉफ़ी (1) डर (3) डायरी (3) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज़ (10) तन्हाई (1) तर्क (2) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (2) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दयनीय (1) दर्शक (1) दलित (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (1) देह और नैतिकता (6) दोबारा (1) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (3) दोहरे मानदण्ड (14) दोहा (1) दोहे (1) धर्म (1) धर्मग्रंथ (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धारणा (1) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़्म (4) नज़्मनुमा (1) नज़्मनुमां (1) नफरत की राजनीति (1) नया (2) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (1) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (2) निष्पक्षता (1) पक्ष (1) परंपरा (3) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (7) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुरस्कार (2) पैंतरेबाज़ी (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फ़क्कड़ी (1) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बजरंगी (1) बड़ा (1) बदमाशी (1) बदलाव (4) बहस (15) बहुरुपिए (1) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (1) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (1) भगवान (2) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भीड़ (1) भ्रष्टाचार (7) मंज़िल (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (6) मर्दानगी (1) महात्मा गांधी (3) महानता (1) मां (1) माता (1) मानवता (1) मान्यता (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (2) मौक़ापरस्ती (1) मौलिकता (1) युवा (1) योग्यता (1) रंगबदलू (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रहस्य (2) राज़ (1) राजनीति (4) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रिश्ता और राजनीति (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) रोज़गार (1) लघु कथा (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (7) लघुव्यंग्य (2) लालच (1) लोग क्या कहेंगे (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (80) व्यंग्य कथा (1) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) शब्द और शोषण (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (45) शायरी ग़ज़ल (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संदिग्ध (1) संस्मरण (3) सकारात्मकता (1) सच (1) सड़क (1) सपना (1) सफ़र (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (39) सर्वे (1) सवाल (3) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साभार (3) साहित्य (1) साहित्य की दुर्दशा (5) साहित्य में आतंकवाद (17) स्त्री-विमर्श के आस-पास (19) स्लट वॉक (1) हमारे डॉक्टर (1) हल (1) हास्य (2) हास्यास्पद (1) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (1) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) animal (1) atheism (1) audience (1) awards (1) Blackmail (1) chameleon (1) character (1) communism (1) cow (1) cricket (1) cunning (1) devotee (1) dishonest (1) Doha (1) dreams (1) employment (1) experiment (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless god (1) friends (1) funny (1) funny relationship (1) ghazal (12) god (1) gods of atheists (1) greatness (1) hindi literature (3) Hindi Satire (8) history (1) humanity (1) Humour (3) hypocrisy (3) hypocritical (2) innovation (1) IPL (1) life (1) literature (1) logic (1) Loneliness (1) lyrics (3) mob (1) movements (1) music (2) name (1) one-way relationships (1) opportunist (1) opportunistic (1) oppressed (1) paper (1) parrots (1) pathetic (1) pawns (1) plagiarism (1) poem (1) poetry (19) pressure (1) prestige (1) puppets (1) radicalism (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) royalty (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (1) satire (22) secret (1) senseless (1) short story (4) slavery (1) song (2) sponsored (1) spoon (1) stature (1) The father (1) The gurus of world (1) tradition (1) trash (1) travel (1) ultra-calculative (1) values (1) verse (3) vicious (1) woman (1) world cup (1)

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....