रविवार, 15 फ़रवरी 2009

ये ‘‘डीसैक्सुअलाइजेशन’’ क्या बला है ?


सुशांत जी, आपने पेड़ो के नीचे खड़े, दीवार पर चढ़े, खेत में खड़े, कई बार तो आधी रात के वक्त चैराहे पर खड़े ‘‘मर्दों’’ को पेशाब करते देखा है ? आपको क्या लगता है ये सब ‘‘डीसैक्सुअलाइज़’’ हो गए हैं ? आपने आदिवासियों को देखा है ? उनकी स्त्रियों की वेश-भूषा देखी है ? क्या वे दिन-रात यौन-क्रिया करते हैं और इसलिए ‘‘डीसैक्सुअलाइज़्ड’’ हैं ? मुझे याद आता है 20-30 साल पुराना माहौल जब कोई स्त्री किसी महफिल में स्लीवलैस पहनकर आ जाती थी तो पूरे वक्त न तो वो खुद सहज रह पाती थीं न पूरी महफिल। पूरे वक्त स्त्री बांहो को तरह-तरह से ढंकने की कोशिश करती रहती तो मर्द नज़रें चुराते। शोहदे घूर-घूर कर देखते। यानि सहज-सामान्य कोई न रह पाता। क्या आज भी ऐसा ही है ? यह बदलाव क्या ‘‘डीसैक्सुअलाइज़ेशन’’ की वजह से आया है !? टीवी के रिएलिटी शोज़ में मध्यवर्गीय घरों की लड़कियां आज उन्मुक्त वेश-भूषा में सहज भाव से विचरती हैं। उनके साथ उनके माँ-बाप-भाई-बहिन भी होते हैं और वे भी उतने ही सहज होते हैं। क्या वे सब दिन-रात सैक्स कर-करके ‘‘डीसैक्सुअलाइज़’’ हो गए हैं इसलिए इतने सहज-सामान्य हो गए हैं ?
इसके अलावा भी अपने कुछ पुराने लेखों के टुकड़े यहाँ पेश करना चाहूंगा जिससे मुझे अपनी बात कहने में आसानी हो जाएगी और व्यर्थ के दोहराव और वक्तखर्ची से भी बच जाऊंगा:-
अश्लीलता को लेकर एक और मजेदार तथ्य यह है कि बढ़ते-बदलते समय के साथ-साथ इसको नापने-देखने के मापदंड भी बदलते जाते हैं। 1970 में जो फिल्म या दृश्य हमें अजीब लगते थे, अब नहीं लगते। आज बाबी पर उतना विवाद नहीं हो सकता, जितना ‘चोली के पीछे’ पर होता है। आज साइकिल, स्कूटर, कार चलाती लड़कियां उतनी अजीब नहीं लगतीं, जितनी पांच-दस साल पहले लगती थीं। मिनी स्कर्ट के आ जाने के बाद साधारण स्कर्ट पर एतराज कम हो जाते हैं। मध्यवर्गीय घरों में नौकरीशुदा स्त्रियों को लेकर तनाव व झगडे़ जितना पहले दिखते थे, उतना अब नहीं दिखते।
(6 दिसम्बर 1996 को अमरउजाला, रुपायन में प्रकाशित)
अब आप मेरे आलेख के उस अंश को दोबारा-तिबारा पढ़ लें जिसमें से न जाने कौन-सा गुणा-भाग करके ‘‘डीसैक्सुअलाइज़ेशन’’ शब्द निचोड़ लिया गया है:-
‘‘स़्त्री को अपनी कई समस्याओं से जूझने-निपटने के लिए देह से मुक्त तो अब होना ही होगा और इसके लिए उसकी अनावृत देह को भी पुरूष अनावृत देह की तरह सामान्य जन की आदत में आ जाने वाली अनुत्तेजक अवस्था के स्तर पर पहुंचाना होगा ।‘‘
अगर अभी भी आपको समझ में नहीं आता तो मुझे कुछ बातें दोहरानी तो पड़ेंगी ही। वैसे भी अगर हम अतार्किक बातों को हज़ार-हज़ार साल दोहरा सकते हैं तो तार्किक को भी दो-चार बार दोहरा लेंगे तो ऐसी कौन सी आफत आ जाएगी ? पहले वे बातें मैंने टिप्पणी में कही थीं, अब संशोधन के साथ मुख्य पोस्ट में लगा रहा हूँ। मैं हर मसले पर चर्चा करुंगा। थोड़ा धीरज तो रखें। मगर आपको तो जय-पराजय के नतीजे की जल्दी मची है।
और आप मुद्वों से हटकर न जाने कौन-कौन से राग अलाप रहे हैं ? कि मैं अपने-आपसे नाराज़ हूँ। कि मुझे प्रशंसा सुनने की आदत नहीं है ! क्या आपको लगता है कि इन सब बातों का इंस बहस से कोई मतलब है ?
बाते अभी बहुत सी बाकी हैं ।
(जारी)

-संजय ग्रोवर

7 टिप्‍पणियां:

  1. अजी फिक्र मत करिए. धीरे-धीरे पूरी दुनिया डीसेक्सुअलाइज़ेशन की ओर ही बढ रही है.

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  2. अच्छा लिखा...
    अब किसी फ़िल्म में चुम्बन द्रश्य आने पर परिवार नजरें नही चुराता... बदलाव आना लाजमी है...

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  3. बदलाव की हवा तो आनी ही है-बस, सामन्जस्य बनाने की आवश्यक्ता है. अच्छा चिन्तन.

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  4. ऐसा ही होता आया है और आगे भी यही होगा, पहले किसी फ़िल्म में किस का सीन नहीं होता था अब तो यह फ़ैशन है...

    ---
    गुलाबी कोंपलें

    उत्तर देंहटाएं
  5. Sir, maine bhi yahi kaha hai apne post mein sabke liye, agar aap dhyan se padhen to.

    http://rewa.wordpress.com/2009/02/15/padhe-likhe-ko-farsi-kya/

    मेरी समझ से मुद्दा ये है कि समाज में कुछ ग़लत हो रहा है, और उसमें कैसे बदलाव लाना है इस पर कोई बात नही हो रही. क्या एक ग़लत कदम को रोकने के लिए फिर दूसरे ग़लत कदम का उठाया जाना ही समस्या का समाधान है? जिन्हें इस बात का आभास है कि वो समाज़ को एक नयी सकारात्मक दिशा दे सकते हैं, अगर वे समस्या के समाधान पर पहल कर सकते हैं तो मैं उनके विचारों को आमंत्रित करती हूँ!

    sir, Aapne mujhse chokher bali per kuch pucha hai, main aapke kinhi bhi baaton ka reply apne blog per karungi. Aap yahan amantrit hein.

    shukriya.

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  6. Rewaji, agar maine galat samjha hai to maiN maafi chaahta huN.
    AuroN ki to pataa nahiN par maine Blog isiliye banaya ki mujhe lagta tha ki mere paas kuchh vichaar haiN aur maiN unheN dusroN se bantuN.
    क्या एक ग़लत कदम को रोकने के लिए फिर दूसरे ग़लत कदम का उठाया जाना ही समस्या का समाधान है?
    ek to mujhe lagta hai ki galat aur sahi ki apni-apni paribhashayeN haiN. Dusre Kuchh logoN ne atyaachar ki aisi ati kar di hai ki pidit paksh ke dheeraj, santulan, vivek aur samajh ko samhale rakhna mushkil ho gaya hai. Ispar vistaar se baat honi chaahiye.
    Main dusroN ke blogs par jakar baraabar comments deta huN. Aur dusroN ki baat Quabil-e-ziqr lagti hai to apne Blog par mukh-post meN use jagah deta huN. To aapke blog par kyoN nahiN aaunga bhala !?
    IshtDev ji, Sandeep ji, Udan Tashtari ji,Vinay ji ko naitik samarthan ke liye shukriya dena chahuNga.

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  7. seems its a part of some earlier debate either at samvadghar or somewhere else, kindly inform. Brief but very well put and rational.
    Rgds.

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कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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