गुरुवार, 6 अगस्त 2009

व्यंग्य-कक्ष में *****अगर तुम न होते*****

व्यंग्य का शौक उन्हें बचपन से था। हर आदमी को अपना कार्य क्षेत्र व प्रतिबद्धताएं तय करनी पड़ती हैं। जब वे तीन वर्ष के थे तभी उन्होंने निश्चय कर लिया था कि लोग अगर मानसिक विकृतियों व सामाजिक विद्रूपताओं पर व्यंग्य लिखते हैं तो मैं लोगों की शारीरिक बीमारियों, क्षेत्रीय बोलियों व मानसिक परेशानियों पर लिखूंगा। कुछ लेखक इनका प्रतीकात्मक इस्तेमाल करते हैं तो मैं वो भी नहीं करूंगा। मैं सीधे-सीधे इन्हीं पर लिखूंगा। सो पहले दिन से ही आप एक हाथ में कापी-कलम-दवात और दूसरे में इंच-टेप थर्मामीटर व स्टेथस्कोप लेकर घूमते थे। सौन्दर्य प्रतियोेगिताओं के निर्णायकों की तरह आपने भी आदमी की एक आदर्श नाप बना ली थी। कोई अगर कम ज्यादा होता तो आप तुरन्त उस पर व्यंग्य लिख देते थे। अगर ऋषि अष्टावक्र आपके समय में हुए होते तो सात-आठ सौ व्यंग्य तो आपने उन्हीं पर लिख डाले होते। कुब्जा और मंथरा के शरीरों पर आपने एक भी व्यंग्य क्यों नही लिखा, शोध का विषय है।

छुटपन से ही आप बुरी तरह सृजनात्मक थे। बच्चों की पत्रिकाओं में आपने छियालीस व्यंग्य एक ऐसे पड़ोसी पर लिखे जो हकलाता था। तिरेपन व्यंग्य आपने उस महिला पर लिखे जो न को ल कहती थी। तीन सौ व्यंग्य अकेले आपने उस आदमी पर लिखे जिसका पेट मोटा था। ढाई सौ व्यंग्य आपने पतले आदमी पर और सवा दो सौ व्यंग्य गंजों पर लिखे। हांलांकि उक्त शारीरिक क्षेत्रों में से कईयों में आपका भी अच्छा-खासा दखल था। मगर उक्त सामाजिक प्रतिबद्धताओं की वजह से आप इतना व्यस्त रहते थे कि अपने लिए आपको समय ही नहीं मिलता था। एक बार आपके शहर में एक विकलांग बच्चा पैदा हो गया। तब कुछ लेखकों ने चिकित्सा-तंत्र पर लेख लिखे। कईयों ने प्रशासन के ढीलेपन पर व्यंग्य लिखे। कुछ ने बच्चे के माँ-बाप को लापरवाही बरतने का दोषी ठहराया। कई पत्रिकाओं ने इस बीमारी पर लेख छापे। मगर आपकी तो बात ही कुछ औैैर! आपने उस बच्चे पर और उसके विकल अंगों पर व्यंग्य लिखे। आपकी मौलिक सोच के अनुसार कसूर न प्रशासनिक अक्षमता का था, न चिकित्सा तंत्र का, न माँ-बाप का। खुद बच्चा इस सबके लिए दोषी था, क्यों कि जन्मजात विकलांग था। इस तरह बाल-पत्रिकाओं की मार्फत बच्चों में अच्छे संस्कार डालते-डालते कब आप बड़े हो गए, न तो आपको पता चला न ही दूसरों को।


बड़े हुए तो स्वाभाविक था कि लोगों से आपके विचार टकराने लगें। एक बार तो आपको कुछ लेखकों के विचार इतने बुरे लगे कि आपने फौरन सम्बद्ध शहरों में मौजूद अपनी ‘अमूत्र्त- साहित्यिक-गुप्तचर-संस्था’ के एजेण्टों से उन लेखकों के शरीरों और बीमारियों के ‘डिटेल्स‘ मंगाए। तब आपने तिहत्तर व्यंग्य उनके शरीरों पर और पिच्यासी उनकी बीमारियों पर लिखे। हरियाणवी बोली पर एक सौ सैंतीस और बिहारी बोली पर दो सौ एक व्यंग्य आपने इसलिए लिखे कि इन प्रदेशों में रहने वाले कुछ लेखकों व राजनेताओं से आपके ‘वैचारिक मतभेद‘ थे। इसी क्रम में छप्पन व्यंग्य आपने एक मुख्यमंत्री की नाक पर और चैवालीस एक प्रधानमंत्री के बालों पर लिखे। एक पड़ोसी के चश्मे पर आप अभी तैंतीस व्यंग्य ही लिख पाए थे कि उसने चश्मा लगाना छोड़ दिया। आपके दिल को ठेस पहुंँची। तब आपने उसकी आँखों पर बाईस व्यंग्य लिख डाले और डिप्रेशन से बाहर आ गए। अण्डा होती जा रही आपकी सृजनात्मकता फिर से चूज़े देने लगी। इसी सृजनात्मकता को निचोड़ कर आपने तकरीबन डेढ़ हज़ार व्यंग्य लोगों के नामों को बिगाड़ते हुए लिखे और लगभग पौने दोे हजार व्यंग्य पत्नी की कथित मूर्खताओं पर लिखे।


आपके दोस्ती के सर्किल में ज्यादातर लोग प्रतिभावान थे। और अलग-अलग ढंग से अपनी मेधा का इस्तेमाल करते थे। उदाहरणार्थ आपके एक मनोचिकित्सक मित्र तनाव के क्षणों में ओझा से झाड़-फूंक करवाते थे। ‘अंध-विश्वास हटाओ‘ समिति में मौजूद आपके कई मित्रों ने शताब्दी की सर्वाधिक ऐतिहासिक चमत्कारिक घटना के तहत गणेश जी को कई लीटर दूध पिलाया था। ‘दहेज उन्मूलन संस्था‘ के आपके कुछ मित्र किसी भी आपात-स्थिति के लिए हर वक्त किरोसिन तेल के पीपों से लैस रहते थेे। आपके एक राष्ट्र-प्रेमी मित्र दंगों को देश-भक्ति का पर्याय मानते थे। आपके एक कामकाजी मित्र नाइन-टू-फाइव अपने दतर में टांगे मेज पर और धड़ कुर्सी पर फैला कर पड़े रहते थे। महीने के महीने दस हजार तनख्वाह के और बीस हजार ऊपर के ले आते और मेहनती होने का खिताब पा जाते थे। एक अन्य मित्र जो अमीरों से बहुंत नफरत करते थे, सिर्फ उन्हीं माफियाओं से संबंध रखते थे जो ग़रीब से अमीर बने होते थे। दिन में उनके प्रेम के पट्टे में बंधे सामाजिक असमानताओं पर नज़र रखते और नाइट-शिट में पट्टा खुला कर अन्य कलात्मक धंधों पर निकल जाया करते थे। आपके एक मानवतावादी मित्र जो मनुष्य की भलाई के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे, रात को जिस बदनाम चिंतन को कांट-छांट कर अपना बना लेते थे, दिन में उसे दुत्कार कर दूर भगा देते थे। मानव जाति के हित में जब मन आए व्यक्तिवादी बन जाना और जब इच्छा हो सामाजिक हो जाना उनकी मीठी सी मजबूरी थी। सभ्यता-संस्कृति के कट्टर संरक्षक आपके एक मित्र जो सामने हर स्त्री को माँ-बहन-बेटी-देवी जपते थे, पीछे उनका ज़िक्र एक आँख दबा कर कादर खानीय मुद्रा में द्विअर्थी संवादों के ज़रिए किया करते थे।


सामाजिक कार्य आपको बचपन से ही माफिक आते थे। आपको बड़ा अरमान था कि आप कुछ विधवाओं को पालें। ‘विधवा-पालन‘ का शौक आपको जुनून की इस हद तक था कि आप दूसरी सामाजिक समस्याओं को ठीक से समझ तक नहीं पाते थे। मगर आपकी बदक़िस्मती कि कई सालों तक कोई स्त्री विधवा न हुंई। कई सालों के लम्बे इंतजार के बाद एक बार जब आप कश्मीर में थे, आपको सूचना मिली कि कन्याकुमारी में एक स्त्री विधवा हो गयी है। आपकी खुशी का ठिकाना न रहा। किसी ने ठीक ही कहा है कि धैर्य का फल मीठा होता है। आप पूरे इन्तजाम के साथ वहाँ गए और उस विधवा को साथ ले आए। हालांकि उसने पचासियों बार कहा कि उसे मदद की कोई ज़रूरत नहीं है।, वह पढ़ी-लिखी है, हर तरह से सक्षम है, आप से ज्यादा कमा सकती है, आपसे बेहतर ढंग से परिवार को पाल सकती है। मगर आप नहीं माने। इतने सालों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद अच्छा काम करने का जो इकलौता मौका हाथ लगा था, आपसे छोड़ते न बना।


इन्हीं सब महानताओं की वजह से आप बचपन से ही मेरे प्रेरणा-स्रोत रहे। मुझे इस बात का सख्त अफसोस है कि आपका यह ‘एकलव्य-शिष्य‘ आपकी तरह लायक नहीं बन पाया। बड़ी इच्छा थी कि आपसे मिलकर अपने शरीर में कमियां निकलवाऊं और बीमारियां गिनवाऊं। (मगर इस कशमकश में भी हूँ कि आपसे अंगूठा कटवाऊं या आपको अंगूठा दिखाऊं!?!?)

काश! आप जीवित होते!


पुनश्चः- आपकी विनम्रता ऐसी कि आप हरिशंकर परसाईं, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, रवीन्द्र नाथ त्यागी आदि को अपने समकक्ष मानते थे। अगर नहीं भी मानते तो कोई क्या कर लेता!?


-संजय ग्रोवर

(जून 2000 में ‘समकालीन सेतु‘ में प्रकाशित)

4 टिप्‍पणियां:

  1. अरे यार इतने सारे व्यंग्य लिखने में तो कोई भी टैं बोल जाएगा ...


    आपके नायक के व्यंग्यों का तो पता नहीं लेकिन आपने बढिया व्यंग्य लिखा है

    उत्तर देंहटाएं
  2. यही थे क्या जो कहते थे "परसाई जी जोशी जी त्यागी जी चले गये मेरी भी तबियत आजकल ठीक नही रहती "

    उत्तर देंहटाएं
  3. "हांलांकि उक्त शारीरिक क्षेत्रों में से कईयों में आपका भी अच्छा-खासा दखल था।"

    खूब धोया आपने | किसी की प्राकृतिक विकृतियों, असमर्थताओं पर व्यंग लिखना मैं लेखक की मानसिक विकृति मानता हूँ |
    नख शिख या नख-शिख उपकरणों पर व्यंग मारना मानसिक खोखलेपन की वजह से हो सकता है | इसे भोंडा हास्य कह सकते हैं, व्यंग नहीं | दूसरे की हंसी उडाना और व्यंग लेखन में बहुत फर्क है | ऐसा स्कूली बच्चे भी कर सकते हैं |

    व्यंग लिखना तलवार की धार पर चलने से भी कठिन है |
    आपके इस लेख से यह भी ध्वनित होता है कि यह भी देखा जाता है कि व्यंगकार उन्ही लोगों के खेमें में तो नहीं है, जिन पर वह व्यंग कर रहा है |

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

पुराने पोस्ट पढने के लिए इस पोस्ट के नीचे दाएं ‘पुराने पोस्ट’ पर क्लिक करें-

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

अंदाज़ (1) अंधविश्वास (1) अनुसरण (1) अफवाहें (1) अलग (1) असमंजस (2) अस्पताल (1) अहिंसा (2) आंदोलन (4) आकाश (1) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (3) आत्मविश्वास (1) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इतिहास (1) इमेज (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (1) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचा (1) ऊंचाई (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (2) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कमज़ोर (1) कम्युनिज़्म (1) कविता (43) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (2) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) खेल (1) गज़ल (4) ग़जल (1) ग़ज़ल (25) गाना (2) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (2) ग़ुलामी (1) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (3) चलती-फिरती लाशें (1) चालू (1) चिंतन (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) जागरण (1) जाति (1) जातिवाद (1) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) टॉफ़ी (1) डर (3) डायरी (3) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज़ (10) तन्हाई (1) तर्क (1) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (2) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दर्शक (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (1) देह और नैतिकता (6) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (2) दोहरे मानदण्ड (13) दोहा (1) दोहे (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़्म (3) नज़्मनुमा (1) नज़्मनुमां (1) नफरत की राजनीति (1) नया (3) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (2) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (3) निष्पक्षता (1) पक्ष (1) परंपरा (3) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (7) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुरस्कार (2) पैंतरेबाज़ी (1) प्रकाशक (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बजरंगी (1) बड़ा (2) बदमाशी (1) बदलाव (4) बहस (14) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (1) बेईमानी (1) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (1) भगवान (2) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भीड़ (1) भ्रष्टाचार (7) मंज़िल (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (6) महात्मा गांधी (3) महानता (1) मातम (1) माता (1) मानवता (1) मीडिया का माफ़िया (1) मुसीबत (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (1) मौक़ापरस्ती (1) युवा (1) योग्यता (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रहस्य (2) राज़ (1) राजनीति (3) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) रोज़गार (1) लघु कथा (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (7) लघुव्यंग्य (2) लालच (1) लेखक (1) लोग क्या कहेंगे (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (75) व्यंग्य कथा (1) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (41) शायरी ग़ज़ल (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संदिग्ध (1) संपादक (1) संस्मरण (3) सकारात्मकता (1) सच (1) सड़क (1) सपना (1) सफ़र (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (35) सर्वे (1) सवाल (3) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साभार (3) साहित्य (1) साहित्य की दुर्दशा (4) साहित्य में आतंकवाद (14) सोच (1) स्त्री-विमर्श के आस-पास (17) स्लट वॉक (1) हमारे डॉक्टर (1) हल (1) हास्य (2) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (1) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) animal (1) atheism (1) audience (1) author (1) awards (1) big (1) Blackmail (1) character (1) communism (1) conflict (1) cow (1) cricket (1) cunning (1) devotee (1) different (1) dishonest (1) dishonesty (1) Doha (1) dreams (1) Editor (1) employment (1) experiment (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless (1) formless god (1) friends (1) funny relationship (1) ghazal (13) god (1) gods of atheists (1) greatness (1) highh (1) hindi literature (3) Hindi Satire (8) history (1) humanity (1) Humour (3) hypocrisy (3) hypocritical (2) in the name of freedom of expression (1) innovation (1) IPL (1) life (1) literature (1) logic (1) Loneliness (1) lyrics (3) mob (1) movements (1) music (2) name (2) new (1) one-way relationships (1) opportunistic (1) paper (1) parrots (1) pawns (1) plagiarism (1) poem (1) poetry (17) pressure (1) prestige (1) publisher (1) puppets (1) radicalism (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) royalty (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (1) satire (22) secret (1) senseless (1) short story (4) sky (1) slavery (1) song (2) sponsored (1) spoon (1) stature (1) style (1) The father (1) The gurus of world (1) thinking (1) tradition (1) trash (1) travel (1) ultra-calculative (1) values (1) verse (3) vicious (1) weak (1) weeds (1) world cup (1)

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....