Saturday, March 28, 2009

अगूंठा कटवा दिया, चश्मों ने फतवा दिया

ग़ज़ल



राहगीरों को तुम्हारे रास्तों ने क्या दिया/
मंज़िलों को और गहरी गर्त में पहुंचा दिया//
***********************************
जिन मचानों पर सुरक्षित था अंधेरों का वजूद/
उन मचानों को ही तुमने मंज़िलें ठहरा दिया//
*************************************
एक झूठे सच की खातिर कितने सच झुठला दिए/
आपकी दानाईयों ने मेरा दिल दहला दिया//
*************************************
नन्हीं आशाओं के अंकुर धूप में कुम्हला गए/
रोशनी ने सूरजों को जाने क्या समझा दिया//
**************************************
डर है वो उठने से पहले उंगली भी ना मांग ले/
दक्षिणा में जिसने अगूंठा मेरा कटवा दिया//
***************************************
जब किसी ने ज़िन्दगी को देखा नंगी आंख से/
बस तभी चश्मों ने उसको कुछ न कुछ फतवा दिया//
**********************************************


-संजय ग्रोवर




(18 दिसंबर, 1994 को दैनिक जागरण में प्रकाशित)

18 टिप्पणियाँ:

डॉ .अनुराग said...

जब किसी ने ज़िन्दगी को देखा नंगी आंख से
बस तभी चश्मों ने उसको कुछ न कुछ फतवा दिया

ये शेर पसंद आया ...



फॉण्ट कम करो इससे पढने में सुविधा रहेगी

रंजना said...

भावपूर्ण सुन्दर ग़ज़ल ....प्रस्तुति हेतु आभार...

दर्पण साह 'दर्शन' said...

Wah...
Wah...

उठने से पहले उंगली भी ना मांग ले/
दक्षिणा में जिसने अगूंठा मेरा कटवा दिया//

दर्पण साह 'दर्शन' said...

jahan pe asar hona chaihiye tha wahi ja ke hua...

जब किसी ने ज़िन्दगी को देखा नंगी आंख से/
बस तभी चश्मों ने उसको कुछ न कुछ फतवा दिया//


Danik Jagran ki tarah mere dil main bhi prakashit ho gayi ye ghazal...

Science Bloggers Association said...

बहुत ही प्‍यारे शेर कहे हैं आपने, पर रंग रोगन थोडा कम होता, तो गजल का ज्‍यादा मजा आता।

-----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

sanjaygrover said...

इस रंग-रोगन के पीछे डा. अनुराग के कमेंट का हाथ है तसलीम जी। सुधारने के चक्कर में सब बिगड़ गया। ‘‘दर्द बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की...........’’

Dr.Bhawna said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

Anonymous said...

http://mukti-kamna.blogspot.com

Vidhu said...

राहगीरों को तुम्हारे रास्तों ने क्या दिया/मंज़िलों को और गहरी गर्त में पहुंचा दिया....बहुत दिनों बाद साफ और सच अर्थ परक रचना पढने को मिली ...धन्यवाद

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

जब किसी ने ज़िन्दगी को देखा नंगी आंख से
बस तभी चश्मों ने उसको कुछ न कुछ फतवा दिया..

बहुत अच्छा लिखा है आपने ..

RC said...

एक झूठे सच की खातिर कितने सच झुठला दिए/
***********************************
नन्हीं आशाओं के अंकुर धूप में कुम्हला गए/
रोशनी ने सूरजों को जाने क्या समझा दिया//
***********************************
Nice !!

Harkirat Haqeer said...

मैं उधर देखती रही हरी कीर्तन करने क्यों नहीं आये इधर देखा तो आप सम्वाद घर सजाये बैठे हो वल्लाह क्या गज़ब ढाया है इस बार....

नन्हीं आशाओं के अंकुर धूप में कुम्हला गए/
रोशनी ने सूरजों को जाने क्या समझा दिया....

ਬੱਲੇ-ਬੱਲੇ....!!

जब किसी ने ज़िन्दगी को देखा नंगी आंख से/
बस तभी चश्मों ने उसको कुछ न कुछ फतवा दिया

ਅਛਾ.....?? ਅੱਜ ਪ੍ਤਾ ਲੱਗਾ ਤੁਸੀਂ ਚਸਮਾ ਕਿਓਂ ਪਾ ਕੇ ਰਖਦੇ ਹੋ.....!!

sanjaygrover said...

bhot bhot shukriya ji twada. jaldi hi aawange harikirtan ji de dere te pravachan karan. A viche viche gurmukhi kyon waad ditti e. mere layeN te kala akkhar bhains de barabar haiga

sanjaygrover said...

नई वेबपत्रिका
www.deshkaal.com
पर पढ़ें संजय ग्रोवर का व्यंग्य
लिंक है:-
http://www.deshkaal.com/Details.aspx?nid=34200924557951
या फिर संजय ग्रोवर या संवादघर को कापी करके गूगल सर्च में पेस्ट करके खोजिए और जानिए सब कुछ।

Dr. Tripat said...

जब किसी ने ज़िन्दगी को देखा नंगी आंख से
बस तभी चश्मों ने उसको कुछ न कुछ फतवा दिया...

kya baat hia..bahut khoob...badhai ho aapko...

RC said...

Thanks for joining my blog. My new blog's link is
http://parastish.blogspot.com/

God bless
RC

संदीप शर्मा said...

एक झूठे सच की खातिर कितने सच झुठला दिए
आपकी दानाईयों ने मेरा दिल दहला दिया...

bahut khoob...

प्रदीप कांत said...

डर है वो उठने से पहले उंगली भी ना मांग ले/
दक्षिणा में जिसने अगूंठा मेरा कटवा दिया//

-आजकल के गुरू हैं, जो माँग लें वो कम.

Post a Comment

कहिए जो भी कहना है:-