
कई बार लगता है कि मैं मूर्ख हूं। फिर लगता है कि मैं कैसे मूर्ख हो सकता हूूं। क्या मैं इतना मूर्ख हूं कि यह भी न समझ सकूं कि मैं मूर्ख हूं या नहीं? अगर मैं मूर्ख हूं तो दूसरे मुझे विद्वान क्यों समझते हैं? क्या दूसरे मूर्ख हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि वे मुझे मूर्ख समझ कर ही विद्वान कहते हांे। क्या वे सभी विद्वानों को मूर्ख समझते है? क्या सभी विद्वान मूर्ख होते हैं? क्या मूर्ख लोग ही आगे चल कर विद्वान बन जाते हैं? मैं कितना मूर्ख हूं कि खुद को विद्वान कह रहा हूूं।
अगर मैं मूर्ख न होता तो क्या होता? क्या तब भी मैं लेखक होता? क्या सिर्फ लेखक होना ही मूर्ख होने के लिए काफी है? या फिर इसके लिए स्वतंत्र लेखक होना भी जरूरी है।
एक मित्र अर्से बाद मिले। पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो आजकल? ‘‘मैंने कहा, ‘‘लिखता हूं।‘‘ वे तड़ से भांप गए। बोले, ‘‘लिखते तो हो, पर कर क्या रहे हो?‘‘ मैं भी समझ गया कि वे क्या समझ रहे हैं।
‘‘कहीं-कहीं से पैसे भी आते हैं।‘‘ मैंने बताया। ‘‘चलो ठीक है’’, उन्होंने ढांढस बंधाया। फिर बोले, ‘‘कोई काम भी करो साथ में। लिखना-शिखना ठीक है शौक-मौज के लिए पर एक उम्र तक ही अच्छा लगता है। अब तुम छोटे थोड़े ही हो। समझ रहे हो न।‘‘
‘‘कहीं-कहीं से पैसे भी आते हैं।‘‘ मैंने बताया। ‘‘चलो ठीक है’’, उन्होंने ढांढस बंधाया। फिर बोले, ‘‘कोई काम भी करो साथ में। लिखना-शिखना ठीक है शौक-मौज के लिए पर एक उम्र तक ही अच्छा लगता है। अब तुम छोटे थोड़े ही हो। समझ रहे हो न।‘‘
‘‘समझ रहा हूं। ‘‘मैंने मूर्खतापूर्ण ढंग से सिर हिलाया। तब कहीं जाकर उनकी संतुष्टि हुई। मगर बात फिर भी वहीं की वहीं रही। वे मुझे मूर्ख सिद्ध करके चले गए। और उनके जाने के बाद मेरे दिल में यह ख्याल और पक्का हो गया कि, ‘‘ये लोग साहित्य-वाहित्य क्या जानें, मूर्ख कहीं के।‘‘
मूर्ख की अक्लमंदी देखिए कि अक्लमंद की हंसी उड़ाने में पल-भर नहीं लगाता। जबकि अक्लमंद इतना मूर्ख होता है कि मूर्ख की हंसी उड़ाने से पहले भी सौ बार सोचता है।
आइए, अब जरा टोन बदलें।
मूर्खता सर्वोपरि है। सर्वत्र विद्यमान है। कहा भी गया है (नहीं कहा गया तो अब कहा जाएगा) कि ‘जहां न पहुंचे सूरज, वहां पहुंच जाए मूरख।‘ कहते हैं कि अधिकांश कुंवारी लड़कियां एक धनवान मगर मूर्ख पति की कामना करती है। सभी लड़के (या पुरूष) पहले से ही माने होते हैं कि स्त्रियां तो होती ही मूर्ख हैं। राजनीतिज्ञ इस विचार के साथ पले-बढ़े होते है कि अधिकांश जनता मूर्ख है। जो इसे और ज्यादा मूर्ख बना सकता है वही सफल हो सकता है। मगर जनता इतनी भी मूर्ख नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि शरीफ और बुद्धिमान लोग कभी भी राजनीति में आने जैसी मूर्खतापूर्ण हरकत नहीं करते।
रचना लौट आने पर लेखक समझता है कि सम्पादक मूर्ख है जो इस कालजयी रचना का महत्व नहीं समझ पाया। उधर सम्पादक सोचता है कि ये लेखक इतने मूर्ख क्यों होते हैं कि अपनी हर मूर्खता को अखबार में छपने भेज देते हैं। मगर इसके बावजूद भी लेख तो छपते ही हैं। बड़े लेखक भी पैदा होते ही हैं। क्या पता कल को किसी सम्पादक और मेरी मूर्खताएं मिल कर कोई ऐसा मूर्खतापूर्ण चमत्कार कर दें कि मैं बड़ा लेखक बन जाऊं।
चलिए, उसी टोन में लौटें।
क्या लिखना एक मूर्खतापूर्ण हरकत है? क्या लिखने से कुछ होता है? हो सकेगा? समाज, व्यवस्था वगैरह सुधरेंगे? कभी सुधरे हैं? क्या पाठक मूर्ख हैं जो लेखक की बातों में आ जाएंगे! पाठक से मेरा मतलब है आप यानी जो इस लेख को पढ़ रहे हैं। क्या आपको मेरी बात बुरी लगी। यदि हां तो कृपया मुझे मूर्ख समझ कर माफ कर दें। मैंने तो आपको पहले ही माफ कर दिया है। हिसाब बराबर।
और अंत में एक प्रार्थना जो इसी विशेष अवसर के लिए खुद चचा ग़ालिब मुझे लिखकर दे गए थे:-
बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ,कुछ न समझे खुदा करें कोई।
बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ,कुछ न समझे खुदा करें कोई।
-संजय ग्रोवर
(‘पंजाब केसरी’ में प्रकाशित)
और अब इंतज़ार करें ’संवादघर’ के धमाकेदार ‘‘होली विशेषांक’’ का
चचा गालिब जबरदस्त लिख गये आपके लिए... :)
जवाब देंहटाएंहोली की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.
तश्तरी में गुझिया रखकर उड़ते हुए आ जाईए ना।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर ... होली की ढेरो शुभकामनाएं।
जवाब देंहटाएंAAPKO BHI SANGITAJI.
जवाब देंहटाएंअच्छा लगा, बहुत आनन्द आया। ऐसा ही कुछ लिखते रहा करिये, मूड फ्रेश हो जाता है।
जवाब देंहटाएंShukriya Sushantji, Mujhe aapse aisi hi vinamrta aur khulepan ki ummid thi.
जवाब देंहटाएंवाह क्या उम्दा लिखा है
जवाब देंहटाएंपढ़ कर नशा हो गया
होली के अवसर पर आपको ढेर सारी शुब्कामनाए