सोमवार, 9 मार्च 2009

एक मूर्खतापूर्ण लेख


कई बार लगता है कि मैं मूर्ख हूं। फिर लगता है कि मैं कैसे मूर्ख हो सकता हूूं। क्या मैं इतना मूर्ख हूं कि यह भी न समझ सकूं कि मैं मूर्ख हूं या नहीं? अगर मैं मूर्ख हूं तो दूसरे मुझे विद्वान क्यों समझते हैं? क्या दूसरे मूर्ख हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि वे मुझे मूर्ख समझ कर ही विद्वान कहते हांे। क्या वे सभी विद्वानों को मूर्ख समझते है? क्या सभी विद्वान मूर्ख होते हैं? क्या मूर्ख लोग ही आगे चल कर विद्वान बन जाते हैं? मैं कितना मूर्ख हूं कि खुद को विद्वान कह रहा हूूं।

अगर मैं मूर्ख न होता तो क्या होता? क्या तब भी मैं लेखक होता? क्या सिर्फ लेखक होना ही मूर्ख होने के लिए काफी है? या फिर इसके लिए स्वतंत्र लेखक होना भी जरूरी है।

एक मित्र अर्से बाद मिले। पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो आजकल? ‘‘मैंने कहा, ‘‘लिखता हूं।‘‘ वे तड़ से भांप गए। बोले, ‘‘लिखते तो हो, पर कर क्या रहे हो?‘‘ मैं भी समझ गया कि वे क्या समझ रहे हैं।
‘‘कहीं-कहीं से पैसे भी आते हैं।‘‘ मैंने बताया। ‘‘चलो ठीक है’’, उन्होंने ढांढस बंधाया। फिर बोले, ‘‘कोई काम भी करो साथ में। लिखना-शिखना ठीक है शौक-मौज के लिए पर एक उम्र तक ही अच्छा लगता है। अब तुम छोटे थोड़े ही हो। समझ रहे हो न।‘‘

‘‘समझ रहा हूं। ‘‘मैंने मूर्खतापूर्ण ढंग से सिर हिलाया। तब कहीं जाकर उनकी संतुष्टि हुई। मगर बात फिर भी वहीं की वहीं रही। वे मुझे मूर्ख सिद्ध करके चले गए। और उनके जाने के बाद मेरे दिल में यह ख्याल और पक्का हो गया कि, ‘‘ये लोग साहित्य-वाहित्य क्या जानें, मूर्ख कहीं के।‘‘

मूर्ख की अक्लमंदी देखिए कि अक्लमंद की हंसी उड़ाने में पल-भर नहीं लगाता। जबकि अक्लमंद इतना मूर्ख होता है कि मूर्ख की हंसी उड़ाने से पहले भी सौ बार सोचता है।

आइए, अब जरा टोन बदलें।

मूर्खता सर्वोपरि है। सर्वत्र विद्यमान है। कहा भी गया है (नहीं कहा गया तो अब कहा जाएगा) कि ‘जहां न पहुंचे सूरज, वहां पहुंच जाए मूरख।‘ कहते हैं कि अधिकांश कुंवारी लड़कियां एक धनवान मगर मूर्ख पति की कामना करती है। सभी लड़के (या पुरूष) पहले से ही माने होते हैं कि स्त्रियां तो होती ही मूर्ख हैं। राजनीतिज्ञ इस विचार के साथ पले-बढ़े होते है कि अधिकांश जनता मूर्ख है। जो इसे और ज्यादा मूर्ख बना सकता है वही सफल हो सकता है। मगर जनता इतनी भी मूर्ख नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि शरीफ और बुद्धिमान लोग कभी भी राजनीति में आने जैसी मूर्खतापूर्ण हरकत नहीं करते।

रचना लौट आने पर लेखक समझता है कि सम्पादक मूर्ख है जो इस कालजयी रचना का महत्व नहीं समझ पाया। उधर सम्पादक सोचता है कि ये लेखक इतने मूर्ख क्यों होते हैं कि अपनी हर मूर्खता को अखबार में छपने भेज देते हैं। मगर इसके बावजूद भी लेख तो छपते ही हैं। बड़े लेखक भी पैदा होते ही हैं। क्या पता कल को किसी सम्पादक और मेरी मूर्खताएं मिल कर कोई ऐसा मूर्खतापूर्ण चमत्कार कर दें कि मैं बड़ा लेखक बन जाऊं।

चलिए, उसी टोन में लौटें।

क्या लिखना एक मूर्खतापूर्ण हरकत है? क्या लिखने से कुछ होता है? हो सकेगा? समाज, व्यवस्था वगैरह सुधरेंगे? कभी सुधरे हैं? क्या पाठक मूर्ख हैं जो लेखक की बातों में आ जाएंगे! पाठक से मेरा मतलब है आप यानी जो इस लेख को पढ़ रहे हैं। क्या आपको मेरी बात बुरी लगी। यदि हां तो कृपया मुझे मूर्ख समझ कर माफ कर दें। मैंने तो आपको पहले ही माफ कर दिया है। हिसाब बराबर।

और अंत में एक प्रार्थना जो इसी विशेष अवसर के लिए खुद चचा ग़ालिब मुझे लिखकर दे गए थे:-
बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ,कुछ न समझे खुदा करें कोई।

-संजय ग्रोवर

(‘पंजाब केसरी’ में प्रकाशित)

और अब इंतज़ार करें ’संवादघर’ के धमाकेदार ‘‘होली विशेषांक’’ का

7 टिप्‍पणियां:

  1. चचा गालिब जबरदस्त लिख गये आपके लिए... :)


    होली की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

    उत्तर देंहटाएं
  2. तश्तरी में गुझिया रखकर उड़ते हुए आ जाईए ना।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर ... होली की ढेरो शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अच्छा लगा, बहुत आनन्द आया। ऐसा ही कुछ लिखते रहा करिये, मूड फ्रेश हो जाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. Shukriya Sushantji, Mujhe aapse aisi hi vinamrta aur khulepan ki ummid thi.

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह क्या उम्दा लिखा है
    पढ़ कर नशा हो गया
    होली के अवसर पर आपको ढेर सारी शुब्कामनाए

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

पुराने पोस्ट पढने के लिए इस पोस्ट के नीचे दाएं ‘पुराने पोस्ट’ पर क्लिक करें-

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अनुसरण (1) अफवाहें (1) असमंजस (2) अस्पताल (1) अहिंसा (2) आंदोलन (4) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (3) आत्मविश्वास (2) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (1) इतिहास (1) इमेज (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (1) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचाई (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (1) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (3) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कम्युनिज़्म (1) कविता (57) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (3) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) खीज (1) खेल (1) गज़ल (4) ग़जल (1) ग़ज़ल (26) गाना (2) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (2) ग़ुलामी (1) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (3) चलती-फिरती लाशें (1) चालू (1) चिंतन (1) चिंता (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) जागरण (1) जाति (1) जातिवाद (2) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) टॉफ़ी (1) डर (3) डायरी (3) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज़ (10) तन्हाई (1) तर्क (2) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (2) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दयनीय (1) दर्शक (1) दलित (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (1) देह और नैतिकता (6) दोबारा (1) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (3) दोहरे मानदण्ड (14) दोहा (1) दोहे (1) धर्म (1) धर्मग्रंथ (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धारणा (1) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़्म (4) नज़्मनुमा (1) नज़्मनुमां (1) नफरत की राजनीति (1) नया (2) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (1) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (2) निष्पक्षता (1) पक्ष (1) परंपरा (3) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (7) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुरस्कार (2) पैंतरेबाज़ी (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फ़क्कड़ी (1) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बजरंगी (1) बड़ा (1) बदमाशी (1) बदलाव (4) बहस (15) बहुरुपिए (1) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (1) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (1) भगवान (2) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भीड़ (1) भ्रष्टाचार (7) मंज़िल (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (6) मर्दानगी (1) महात्मा गांधी (3) महानता (1) मां (1) माता (1) मानवता (1) मान्यता (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (2) मौक़ापरस्ती (1) मौलिकता (1) युवा (1) योग्यता (1) रंगबदलू (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रहस्य (2) राज़ (1) राजनीति (4) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रिश्ता और राजनीति (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) रोज़गार (1) लघु कथा (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (7) लघुव्यंग्य (2) लालच (1) लोग क्या कहेंगे (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (80) व्यंग्य कथा (1) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) शब्द और शोषण (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (45) शायरी ग़ज़ल (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संदिग्ध (1) संस्मरण (3) सकारात्मकता (1) सच (1) सड़क (1) सपना (1) सफ़र (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (39) सर्वे (1) सवाल (3) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साभार (3) साहित्य (1) साहित्य की दुर्दशा (5) साहित्य में आतंकवाद (17) स्त्री-विमर्श के आस-पास (19) स्लट वॉक (1) हमारे डॉक्टर (1) हल (1) हास्य (2) हास्यास्पद (1) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (1) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) animal (1) atheism (1) audience (1) awards (1) Blackmail (1) chameleon (1) character (1) communism (1) cow (1) cricket (1) cunning (1) devotee (1) dishonest (1) Doha (1) dreams (1) employment (1) experiment (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless god (1) friends (1) funny (1) funny relationship (1) ghazal (12) god (1) gods of atheists (1) greatness (1) hindi literature (3) Hindi Satire (8) history (1) humanity (1) Humour (3) hypocrisy (3) hypocritical (2) innovation (1) IPL (1) life (1) literature (1) logic (1) Loneliness (1) lyrics (3) mob (1) movements (1) music (2) name (1) one-way relationships (1) opportunist (1) opportunistic (1) oppressed (1) paper (1) parrots (1) pathetic (1) pawns (1) plagiarism (1) poem (1) poetry (19) pressure (1) prestige (1) puppets (1) radicalism (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) royalty (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (1) satire (22) secret (1) senseless (1) short story (4) slavery (1) song (2) sponsored (1) spoon (1) stature (1) The father (1) The gurus of world (1) tradition (1) trash (1) travel (1) ultra-calculative (1) values (1) verse (3) vicious (1) woman (1) world cup (1)

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....