बुधवार, 7 जनवरी 2009

औरत: दैहिक स्वतंत्रता और सामाजिक उपयोगिता के सवाल

मित्रों,ब्लाग का नाम संवादघर रखते समय मन में यही विचार था कि विभिन्न मुद्वों पर घरेलू माहौल में एक सार्थक संवाद चलाया जाए जिसमें बिना किसी भेदभाव के हर कोई हिस्सेदारी कर सके। कई संवेदनशील विषयों में से एक नारी-मुक्ति भी था जिसपर बात करते हुए मैं, एक समय में, जिहादी अंदाज़ में भावुक हो जाया करता था। कुछ लेख अमर उजाला में व कुछ कविताएं यत्र-तत्र छपीं भी थीं। ब्लाग बनाने के बाद तांका-झांकी और ढूंढा-ढांढी के तहत ‘‘चोखेर बाली’’ पर जा पहुँचा। किसी विषय पर बहस छिड़ी हुई थी। मैं भी घुस पड़ा और बहस में शामिल हो गया। पुराने दिन याद आ गए। बता दूं कि ‘‘चोखेर बाली’’ नामक ब्लाॅग की माॅडरेटर सुजाता हैं और बहुत ही कुशलता पूर्वक वे नारी-विमर्श से संबंधित मुद्वे उठाकर बहस का संचालन करती हैं। ‘‘बहस-स्थल’’ पर ही मैंने उनके सम्मुख प्रस्ताव रखाः-
सुजाता जी,नए साल में औरतों के मसअलों से जुड़ा एक स्तम्भ शुरु कर रहा हूँ ‘‘दुनिया बसाऊँगी तेरे घर के सामने।’’ चाहता हूँ कि इंस स्तम्भ का ‘‘उदघाटन’’ आप करें। यानि कि पहली टिप्पणी आप करें। क्या आप मेरा आमंत्रण स्वीकार करती हैं। मैं खुदको गौरवान्वित महसूस करुंगा।31।12।2008







कुछ प्रतीक्षा के बाद सुजाताजी का जवाब भी उभरा:-
संजय जी,
मुझे आमंत्रण देने के लिए धन्यवाद । ज़रूर टिप्पणी करूंगी ।
स्तम्भ के नाम को लेकर मन मे ज़रा संशय है। आप उस पर पुनर्विचार कर सकें तो बेहतर। इस शीर्षक में 'तेरे' कौन है यदि यह पुरुष के लिए है तो दिक्कत यह है कि स्त्री अपना संसार बसाती है तो उसका सन्दर्भ हमेशा पुरुष ही क्यों होगा । साथ ही यह एक प्रतिस्पर्द्धा की भावना भी दर्शाती है. 'तेरे घर के सामने' आमने.सामने वाली बात आ जाती है। दर असल स्त्री जो पाना चाहती है वह पुरुष की होड़ करने का अर्थ लगाकर कभी सही समझ नही जा सकता ऐसा मुझे प्रतीत होता है। इन कारणों पर गौर कर सकें तो बहुत अच्छा होगा।31.12.2008
तब मैंने उन्हें बताया:-
सुजाताजी,,मैं कोई बहानेबाज़ी नहीं करुंगा। ‘तेरे’ से मतलब पुरुष से ही है। मैं आपकी बात से सहमत भी हूँ। फ़िर भी मेरे मन में जो बात थी वो तो कह ही दंू। निहितार्थ यह भी था कि तुमने सिर्फ अपने तक सीमित रहकर घर बसाया है जो कि पितृसत्ता या पुरुष-सत्ता का प्रतीक है। मै एक खुली हुई दुनिया बसा दूंगी जहाँ सब बराबर होंगे। दूसरे, मेरे मन में अपने स्तम्भों के शीर्षकों को ब्लाॅग (संवादघर) के नाम से जोडे़ रखने का लालच भी था (मसलन व्यंग्य-कक्ष)। साथ ही मैंने उसके लिए एक लोगो (प्रतीक-चिन्ह/चित्र...वैसे मुझे यद नहीं आ रहा इसके लिए सही शब्द क्या होता है।) भी बना डाला है। पहले मैंने स्तम्भ के लिए ‘‘सीढ़ियों पर’’ और ’’हटी है चिलमन, खुला है आंगन’’ जैसे नाम भी सोचे थे। बहरहाल, फिलहाल अगर आप अन्यथा न लें तो, इसी शीर्षक से शुरु कर सकते हैं, बाद में आपकी सहमति से शीर्षक बदल लेंगे। इस पूरे प्रकरण में फायदे की बात यह है कि शुरुआत आपकी शीर्षक पर की गयी इसी टिप्पणी से की जा सकती है। बाद की आपकी टिप्पणी ‘‘समापन-उदघाटन’’ होगा। (वैसे क्या ऐसी बहसों का कभी समापन हो सकता है जो अभी ठीक से शुरु भी नहीं हुई!)तो क्या आप सहमत हैं ?
आमंत्रण स्वीकार करने के लिए धन्यवाद।31.12.2008
शुरुआत उस लेख से कर रहा हूँ जो अमर उजाला, रुपायन में 1996 में छपा था। इन 12-13 सालों में दुनिया कितनी बदली ? पुरुष की मानसिकता में कितना बदलाव आया और ख़ुद स्त्री की में कितना ? आया कि नहीं आया ? हम आगे गए या पीछे ? बता दंू कि मधु सप्रे और मिंलिंद सोमन तब के प्रसिद्ध माॅडल थे और दोनों साथ-साथ, एक विज्ञापन में लगभग वस्त्रहीन दृश्य देने की वजह से चर्चा में आ गए थे। लेकिन लगभग सभी संचार माध्यम हाथ धोकर सिर्फ मघु सप्रे के पीछे पड़ गये थे। यही मुद्दा मैंने इस लेख में उठाया था। अंजलि कपूर जो कि एक वकील थीं, भी ऐसे ही एक विज्ञापन की वजह से मुश्किल में पड़ गयीं थीं। सुजाताजी की टिप्पणी इन सवालों को शायद कुछ हल्का-गहरा करे या शायद कुछ नए सवाल उठाए। ख़ुद मैं वैचारिक रुप से तब कहाँ था और अब कहाँ हूँ, यह जानने में आपकी टिप्पणियों से भी मदद मिलेगी।
लेख
दैहिक स्वतंत्रता और सामाजिक उपयोगिता के सवाल
इस समय नारी देह के अनावरण और शोषण को लेकर चर्चा गर्म है । शायद पुरुष जानता है कि दैहिक पवित्रता, मर्यादा, यौनशुचिता के गीत गाकर ही अभी और कुछ दिन तक नारी का शोषण किया जा सकता है ।
प्रगतिशील महिलाएं तक इस शाब्दिक झांसे में फंसकर खुद को देह में कैद कर लेती है । सालो-साल पुराना लोगों का मानसिक अनुकूलन यथास्थितिवादी-सामंतवादी सोच के लोगों के पक्ष में चला जाता है ।
हालांकि जिन कारणों से नारी देह अनावृत होती है, लगभग उन्हीं कारणों से पुरुष देह भी अनावृत होती रही है, मगर आदत में आ जाने के कारण लोगों का ध्यान उस पर इस तरह से नहीं जाता । मजे की बात है कि कोई ममता कुलकर्णी या पूजा बेदी हमेशा अकेली वस्त्रहीन नहीं होती या चुंबन दृश्य नहीं देती । कोई-न-कोई संजय दत्त, सुनील शेट्टी या सनी देओल भी इनके साथ होते हैं । मगर हमारा ऐतराज अक्सर ममता या पूजा पर ही होता है ।
हमारे संस्कारित-अनुकूलित दिल-दिमाग में क्यों यह ख्याल तक नहीं आता कि स्त्री मन को उत्तेजना व सुख देने के लिए मर्दानी देह को भी वैसे ही बेचा जाता है । अगर नहीं तो राहुल राय, कुमार गौरव या दिलीप कुमार की तुलना में धर्मेद्र, जैकी श्राफ या मिथुन को ही क्यों ज्यादा नंगाया जाता है । विभिन्न व्यवसायों से जुडे़ बहुत से पुरुष भी मॉडलिंग करते हुए कपडे़ उतारते होंगे, मगर हम सिर्फ वकील अंजलि कपूर को फाड़ कर खा जाने पर आमादा हैं । कपडे़ मिलिंद सोमन ने भी उतारे थे, पर हमने सारी बहादुरी मधु सप्रे पर हमला करने में ही खर्च कर दी । दरअसल ये सभी घटनाएं साफ-साफ बताती हैं कि हम स्त्री को एक संपूर्ण इंसान के रूप में नहीं देख पा रहे हैं ।
तिस पर और मज़ा यह कि हमारे कथित धार्मिक-आध्यात्मिक सुसंस्कृतजन कहते आए हैं कि हमारे यहां देह से ज्यादा महत्व आत्मा (?) को दिया जाता है । जबकि स्त्री (व पुरूष) को सारी सजाएं देह की देहरी लांघने पर ही दी जाती हैं । मन के तहखाने में कोई स्त्री या पुरूष किसी पराए के साथ या हजार साथी बदलकर रहें, कथित धर्म को कुछ लेना-देना नहीं, मगर बात जैसे ही देह तक आई तो स्पर्श भी दंडनीय है । इससे ज्यादा देह को महत्व देना और क्या होगा ? सारे नीतिगत मानदंड ही देह के आचरण पर टिके हैं ।
स्त्री को अपनी कई समस्याओं से जूझने-निपटने के लिए देह से मुक्त तो अब होना ही होगा और इसके लिए उसकी अनावृत देह को भी पुरूष अनावृत देह की तरह सामान्य जन की आदत में आ जाने वाली अनुत्तेजक अवस्था के स्तर पर पहुंचाना होगा । यह जरूर है कि कौन स्त्री कैसे रहना चाहती है, इसके फैसले उसके अपने होने चाहिएं। मानसिक-शारीरिक रूप से नाबालिग लड़कियों की बात छोड़ दें तो ममता कुलकर्णी या अंजलि कपूर के जीवन को तय करने वाला मैं या कोई और क्यों हो ? मानसिक बालिगपन कैसे तय हो, यह अलग से एक विचारणीय मुद्दा है ।
जहां तक पुरूष केंन्द्रित व्यवस्था का सवाल है, पुरूष कैसे प्रभु बना-इस पर बहुत कहा-सुना गया। मगर अब वह शायद इसलिए भी प्रभु है कि हमारे सामाजिक ढांचे में माता-पिता के बहुत सारे स्वार्थ जैसे वंश चलाना, कमाकर खिलाना, माँ-बाप का नाम रोशन करना, बुढापे का सहारा बनना आदि पुत्र से ही पूरे होते हैं । यह पुत्र की अस्मिता से प्रेम नहीं, बल्कि उसकी तात्कालिक/दीर्घकालिक उपयोगिता का लालच है, जो हमारे स्वार्थपरक सामाजिक,व्यक्तिगत संबंधों की कलई भी खोलता है । बदलते परिवेश में ज्यों-ज्यों स्त्रियां इस दृष्ठि से उपयोगी होती जाएंगी, मां-बाप का ‘प्यार’ स्वतः ही उन पर भी उमड़ने लगेगा । अब भी कई घरों में देखने को मिलता है कि ‘अव्यावहारिक’ व ‘नाकारा’ पुत्र उपेक्षित व अपमानित होते रहते हैं व ‘प्रैक्टीकल’ व ‘सोशल’ लड़कियों के गीत गाए जाते हैं ।
हां, उन विद्वानों-आलोचकों से बहस करना अभी भी बहुत मुश्किल है, जो विचार को बकरा मानकर कसाई की तरह एक ही ‘झटके’ में तय कर देते हैं कि कौन-सी मानसिकता विकृत है और कौन-सी ‘सुकृत’।
और यह रही ‘चोखेर बाली’ की माडरेटर, हमारी विशेष सम्मानित अतिथि सुजाता जी की उदघाटक टिप्पणी:-
संजय जी,
आपका सवाल बहुत जायज़ है लगभग वैसा ही जो गालियों पर लिखी गयी चोखेर बाली की पोस्ट्स मे था। स्त्री शरीर के डीसेक्शुअलाइज़ेशन के बारे मे एक पोस्ट राजकिशोर जी की भी पढियेगा । जैसा कि आपने लिखा भी है कि लेख 12-13 साल पुराना है, वह झलक मिलती है । अगर हम ग्लैमर की दुनिया की बात करें तो इस तरह की बातें अब गम्भीर तूफान नही उठाती, समाज मे भी एक अलहदा वर्ग है जहाँ ये बातें मायने नही रखती । स्क्रीन पर बहुत कुछ है जो कि अब हैरानी की बात नही है ।
लेकिन सोचने की बात है कि देह मुक्ति का मतलब स्त्री के लिए क्या है ? आपने लिखा:-
यह जरूर है कि कौन स्त्री कैसे रहना चाहती है , इसके फैसले उसके अपने होने चाहिएं.. सही बात है, लेकिन अभी सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह फैसला लेते हुए कोई स्त्री अपने समाज, संस्कृति, परम्परा, परिवेश, ट्रेनिंग वगैरह से बिलकुल निरपेक्ष होती है ?
उसके अपने फैसले जैसी टर्म दर असल धोखा है क्योंकि बहुत से कारक आपके निर्णयों को प्रभावित कर रहे होते हैं । यह स्थिति पुरुष के साथ, किसी भी समाजिक प्राणी के साथ है, दिक्कत यह है कि स्त्री के साथ बहुत गम्भीर और योजनाबद्ध तरीके से है।
हमारी बेटी क्या चाहती है इसे प्रभावित करने मे हमारी और बाहर की दुनिया की बहुत बड़ी भूमिका है । शिक्षा , औपचरिक व अनौपचारिक, की अहम भूमिका है।
जिस तरह हम जेन्डरिंग की प्रक्रिया मे बदलाव नही लायेंगे तब तक स्त्री को भी यह भ्रम रहेगा कि उसकी "मुिक्त" के मायने ममता कुलकर्नी या मल्लिका शेरावत हो जाने के रास्ते से हासिल होंगे । वह यह कैसे जान पाएगी कि वह कहाँ कहाँ सिर्फ मोहरा बन रही है और मान रही है कि वह मुक्त हो रही है। आपके लेख से भी यह भ्रम पैदा हो रहा है कि मधु सप्रे हो जाना मुक्त हो जाना है।
देह-मुक्ति क्या है स्त्री के लिए, यह एक बड़ा सवाल है । आशा है आपके इस कॉलम के माध्यम से हम सभी स्त्री मुक्ति के अन्य पहलू से परिचित हो सकेंगे ।
शुभकामनाएँ !
हाँ, आपके लेख मे और उससे पूर्व मेरी टिप्पणी मे कुछ फ़ॉंट की गलतियाँ दिखाई दे रही हैं, शायद आपके यहाँ ऐसा न दिख रहा हो।
सुजाता
मित्रों, अब आपकी बारी है(इसी दौरान मैं भी अपनी बात रखूंगा) :-

11 टिप्‍पणियां:

  1. सम्वादघर शुरू करने की बधाई| १९९६ का ये लेख अगर आप आज लिखते तो कैसा होता? जानने की उत्सुकता है|

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  2. मैं दृढता पूर्वक मानता हूं कि 1996 से 2008 के बीच कहीं कुछ नहीं बदला है. बदलना चाहिये था. पर ऐसा क्यों नहीं हुआ, अब भी बडा सवाल है. आगे भी रहेगा यदि यही लेख 2020 में आप छापें तो.

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  3. देखा जाए आसां भी है....और मुश्किल भी........इस बाबत कुछ भी कहना........आसां इसलिए कि यह तो स्वयम में हमें बेबाक रूप से प्रकृति प्रदत्त है.....और मुश्किल इसलिए कि हम मानव नाम की जाती ने झूठ मुठ ही प्रसंग को अनावश्यक रूप से जटिल बना दिया है..........अच्छा है.......इसी तरह के इशुओं से आदमी जिंदगी बिता जाता है.........हा..हा..हा..हा..!!अगली बार आऊंगा तो विस्तार में जाऊँगा.....रोचक ढंग से......और ज्ञानवर्धक भी.......बस आप मेरे ब्लॉग पर फोल्लोवेर बन जाएँ तो आप तक मैन इक क्लिक में ही पहुँच जाऊं.....!!

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  4. सुजाता जी, आज से कोई 8-9 साल पहले एक मनोचिकित्सक का साक्षात्कार लिया था। एक प्रश्न यह भी पूछा था कि बलात्कृत स्त्री को बलात्कार के बाद की मानसिक स्थिति से छुटकारा दिलाने के लिए क्या करना चाहिए ? आशा के विपरीत उन मनोचिकित्सक ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण जवाब बल्कि समाधान सुझाया था। कहा कि हमें यानि समाज को और उस स्त्री को भी बलात्कार को एक दुर्घटना की तरह लेना चाहिए। जिस तरह बीच रास्ते एक ट्रक या एक जानवर अचानक हम पर हमला कर देता है जिसका न तो हमें पहले से पता होता है, न हमारी ऐसी कोई नीयत होती है न इसमें हमारा कोई दोष होता है ठीक उसी तरह बलात्कार की घटना है।
    कहना मैं यह चाहता हूँ कि देह मुक्ति के कई आयामों में से एक आयाम यह भी है। जिस तरह स्त्री मुक्ति के कई आयामों में से एक देह-मुक्ति है। आप ही सोचिए, हर सामाजिक व्यवहार, आवागमन के तहत जो चीज़ स्त्री को बार-बार हीनता-बोध, अपराध-बोध, लज्जा-बोध/बोझ कराती है वो क्या है ? क्या देह से अलग इसका कोई उत्तर हो सकता है ! इंस हीनता, अपराध, शर्म आदि बोधों से जुड़े कारणों जैसे सामाजिक मान्यताएं, मर्यादाएं, स्त्री व पुरुष के लिए तयशुदा वस्त्र-भूषाएं व इन सब से जुड़ी समाज की मानसिकता को हम समझ सकें तो देह-मुक्ति के व्यापक अर्थ शायद हमें समझ आने लगेंगंे। मसलन देह से मुक्त स्त्री ही अदालत में खुलकर बता पाएगी कि बलात्कार के दौरान उसके साथ क्या-क्या किया गया। तलाक के मामले में ऐसी स्त्री ही खुलकर बता पाएगी कि किस तरह उसके साथ अप्राकृतिक कर्म किए गए। या कि किस तरह उसका पति स्वस्थ-साहचर्य में सक्षम था या नहीं। देहमुक्त स्त्री ही समझ और समझा पाएगी कि जानलेवा गर्मी के आलम में अगर मर्द-महाराज की तरह स्त्री भी कमीज़ उतारकर दो घड़ी सुस्ता लेगी तो आसमान नहीं फट पड़ेगा। कई बार तो इन्हीं ‘मर्यादाओं’ के चलते एक पुरुष द्वारा
    स्त्री मरीज़ की या स्त्री द्वारा पुरुष रोगी की देख-भाल करना ही असम्भव हो जाता है।
    कोई स्त्री या हमारी बेटी अपने फैसले लेते समय अपने समाज, संस्कृति, परम्परा, परिवेश, ट्रेनिंग वगैरह से निरपेक्ष कैसे रह सकती है!? क्या बेटे या पुरुष रह पाते हैं !? सभी को तो भीड़ के पीछे चलना, समाज से डरना सिखाया गया है।
    फ़र्क बस यही है कि मर्द को जो मर्दानगी (?) के संस्कार दिए गए हैं वह उनके अनुसार चलता है और औरत को जो स्त्रीत्व के संस्कार दिए गए हैं वह उनपर चलती रहती है। इंस तरह तो सभी मोहरे ही नज़र आते हैं। जो आदमी दंगों के दौरान बलात्कार करता है क्या वह किसी का मोहरा नहीं होता ! और वह दूसरी स्त्री जो कि सिर्फ इसलिए इस बलात्कार पर खुश होती कि वह अन्य धर्म की है, क्या वह मोहरा नहीं है ! आखिर मल्लिका की उन्मुक्तता ही हमें मोहरा होना क्यूं लगती है !? शबाना, स्मिता, मीता या कोंकणा भी तो ऐसे दृश्य देती आयी है ! सिम्मी गरेवाल ने तो तीसियों साल पहले ‘‘सिद्धार्थ’’ में नग्न दृश्य दिया था। वजह शायद यह है कि मल्लिका वह पहली अभिनेत्री है जिसने अपने पक्ष में खुलकर तर्क देने शुरु कर दिए। एक पत्रकार ने जब उससे पूछा कि आपने तो टूपीस पहना है तो मल्लिका ने कहा कि हीरो ने तो वनपीस (सिर्फ अण्डरवीयर) पहना है, आप उसका इण्टरव्यू क्यों नहीं लेते ? एक कमर्शियल एक्ट्रेस का यह बौद्धिक पहलू हमारे सामाजिक आकाओं को समझ में नहीं आया। उन्हें शायद वही अभिनेत्रियां ‘सूट’ करती हैं जो सभी तरह के दृश्य भी देती रहें और तोते की तरह ‘‘संस्कृति-संस्कृति’’ भी रटती रहें। कमोबेश यही हाल, साहित्य समेत, हमारे अन्य क्षेत्रों में भी है। तो ये मोहरे वाला मामला तो बहुत पेचीदा और उलझा हुआ है सुजाता जी। रही बात भ्रमों की तो उसका भी कोई मानक इलाज उपलब्ध नहीं है। यहाँ तो ऐसा है कि आप ओशो रजनीश का नाम भी ले दो तो सामने वाले को भ्रम होने लगता है कि अगला वेश्यालय खोलना चाहता है। एडस् की बात उसे सेक्स की बात लगने लगती है। स्त्री-मुक्ति से जुड़े मसले उठाने पर आपको भी तो कैसी-कैसी सलाहें दे डाली हैं विद्वान लोगों ने ! हम बस यही कर सकते हैं कि बातों को और ज़्यादा समझा-समझाकर लिखें।
    प्रिय मित्र शाश्वत शेखर ने पूछा है कि अगर मैं इस लेख को आज लिखता तो कैसे लिखता। होता बस यही कि ममता की जगह मल्लिका हो जाता और संजय, सुनील, जैकी की जगह सलमान, अक्षय और जाॅन आ जाते (जैसा कि चतुर्वेदी जी ने कहा है, मगर ऐसा भी नहीं कि बदलाव बिलकुल भी नहीं आया मगर उसके बरक्स कट्टरता भी उतनी ही बढ़ी है)। हां, आसपास ऐसा ज़रुर कुछ घटित हुआ है कि मैं उक्त लेख के निम्न भाग को थोड़ा और विस्तार देता:-
    ‘‘‘‘जहां तक पुरूष केंन्द्रित व्यवस्था का सवाल है, पुरूष कैसे प्रभु बना-इस पर बहुत कहा-सुना गया। मगर अब वह शायद इसलिए भी प्रभु है कि हमारे सामाजिक ढांचे में माता-पिता के बहुत सारे स्वार्थ जैसे वंश चलाना, कमाकर खिलाना, माँ-बाप का नाम रोशन करना, बुढापे का सहारा बनना आदि पुत्र से ही पूरे होते हैं । यह पुत्र की अस्मिता से प्रेम नहीं, बल्कि उसकी तात्कालिक/दीर्घकालिक उपयोगिता का लालच है, जो हमारे स्वार्थपरक सामाजिक,व्यक्तिगत संबंधों की कलई भी खोलता है । बदलते परिवेश में ज्यों-ज्यों स्त्रियां इस दृष्ठि से उपयोगी होती जाएंगी, मां-बाप का ‘प्यार’ स्वतः ही उन पर भी उमड़ने लगेगा । अब भी कई घरों में देखने को मिलता है कि ‘अव्यावहारिक’ व ‘नाकारा’ पुत्र उपेक्षित व अपमानित होते रहते हैं व ‘प्रैक्टीकल’ व ‘सोशल’ लड़़कियों के गीत गाए जाते हैं ।’’’’’

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  5. Grover ji. aapke vichar padhe. sabse pehle to ye kahugi aap likhte accha hain aur bhasa pr pakad bhi acchi hai. rahi istri ki swatantarta ki bat mai samajhti hun jab tak purush apni soch nahi badalta istri aage nahi badh sakti aur purush kabhi apni prabhuta chod nahi sakta.....


    ye word verification hta len...

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  6. देखिए, हरकीरत जी, पहली बात तो यह है कि जिसके मुँह सत्ता का स्वाद लग जाता है वह इतनी आसानी से उसे छोड़ता नहीं चाहे वो मर्दवाद हो, ब्राहमणवाद हो या अमेरिका का गोरावाद हो। दूसरे, यह कि जो सत्ता और सुविधाओं के बीच पैदा होता है उसके मन यह बैठ चुका होता है कि उसकी योग्यता, सक्षमता और मालिकत्व एकदम ‘‘कन्फर्म’’ और नैसर्गिक या प्राकृतिक या ‘‘ईश्वर-प्रदत्त’’ वगैरह है। वह यह आसानी से मानने को तैयार नहीं होता कि दूसरों को अगर मौका मिले तो वे भी उतने ही (या ज़्यादा भी) योग्य बन सकते हैं। याद करें कि जब वी. पी. सिंह ने पहली बार आरक्षण दिया था तो कितना भयानक विरोध हुआ था। मगर आज वही सब पार्टियां बढ़-चढ़कर आरक्षण देने पर तुली हैं। इसलिए इंस इंतज़ार में न बैठे रह जाईए कि पुरुष अपने आप प्रभुता छोड़ देंगे।

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  7. आप अच्छा लिखते हैं। रोचक भी, सलीकेदार भी। आलेख पढ़कर अच्छा लगा।

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  8. muje to aapka woh headline jyada pasand aa gaya... Meri Nazaro se Aasnmaan Dekho... wah...
    bahut hi umda likha hai aapane...

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  9. नया शीर्षक अच्छा है , दोबारा यहँ नही आ पाई ,माफी चाहूंगी। चिंतन चालू आहे !

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  10. संवादघर ( www.samwaadghar.blogspot.com) में नारी की दैहिक स्वतंत्रता व सामाजिक उपयोगिता पर जो बहस चल रही है वह रोचक तो है ही, बहुत महत्वपूर्ण भी है । एक ऐसा एंगिल जिससे अभी तक किसी ने इस विषय पर बात नहीं की है, मैं सुधी पाठकों के सम्मुख रख रहा हूं ! बहस को और उलझाने के लिये नहीं बल्कि सुलझाने में मदद हो सके इसलिये !

    नारी देह के डि-सैक्सुअलाइज़ेशन (de-sexualization) की दो स्थिति हो सकती हैं । पहली स्थिति है - जहरीला फल चखने से पहले वाले आदम और हव्वा की - जो यौन भावना से पूर्णतः अपरिचित थे और शिशुओं की सी पवित्रता से ईडन गार्डन में रहते थे। ऐसा एक ही स्थिति में संभव है - जो भी शिशु इस दुनिया में आये उसे ऐसे लोक में छोड़ दिया जाये जो ईडन गार्डन के ही समकक्ष हो । वहां यौनभावना का नामो-निशां भी न हो । "धीरे धीरे इस दुनिया से भी यौनभावना को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना है" - यह भी लक्ष्य हमें अपने सामने रखना होगा ।

    यदि यह संभव नहीं है या हम इसके लिये तैयार नहीं हैं तो दूसरी स्थिति ये हो सकती है कि हम न्यूडिस्ट समाज की ओर बढ़ें और ठीक वैसे ही रहें जैसे पशु पक्षी रहते हैं । सुना है, कुछ देशों में - जहां न्यूडिस्ट समाज के निर्माण के प्रयोग चल रहे हैं, वहां लोगों का अनुभव यही है कि जब सब पूर्ण निर्वस्त्र होकर घूमते रहते हैं तो एक दूसरे को देख कर उनमें यौन भावना पनपती ही नहीं । "सेक्स नग्नता में नहीं, अपितु कपड़ों में है" - यही अनुभव वहां आया है । इस अर्थ में वे पशु-पक्षियों की सेक्स प्रणाली के अत्यंत निकट पहुंच गये हैं । प्रकृति की कालगणना के अनुसार, मादा पशु-पक्षी जब संतानोत्पत्ति के लिये शारीरिक रूप से तैयार होती हैं तो यौनक्रिया हेतु नर पशु का आह्वान करती हैं और गर्भाधान हो जाने के पश्चात वे यौनक्रिया की ओर झांकती भी नहीं । पूर्णतः डि-सैक्सुअलाइज़ेशन की स्थिति वहां पाई जाती है । पशु पक्षी जगत में मादा का कोई शोषण नहीं होता, कोई बलात्कार का भी जिक्र सुनने में नहीं आता । मादा या पुरुष के लिये विवाह करने का या केवल एक से ही यौन संबंध रखने का भी कोई विधान नहीं है। उनकी ज़िंदगी मज़े से चल रही है । ये बात दूसरी है कि पशु - पक्षी समाज आज से दस बीस हज़ार साल पहले जिस अवस्था में रहा होगा आज भी वहीं का वहीं है । कोई विकास नहीं, कोइ गतिशीलता नहीं - भविष्य को लेकर कोई चिंतन भी नहीं ।

    हमारे समाज के संदर्भ में देखें तो कुछ प्राचीन विचारकों, समाजशास्त्रियों का मत है कि यौनभावना का केवल एक उपयोग है और वह है - 'संतानोत्पत्ति' । उनका कहना है कि प्रकृति ने सेक्स-क्रिया में आनन्द की अनुभूति केवल इसलिये जोड़ी है कि जिससे काम के वशीभूत नर-नारी एक दूसरे के संसर्ग में आते रहें और सृष्टि आगे चलती चली जाये । विशेषकर स्त्री को मां बनने के मार्ग में जिस कष्टकर अनुभव से गुज़रना पड़ता है, उसे देखते हुए प्रकृति को यह बहुत आवश्यक लगा कि यौनक्रिया अत्यंत आनंदपूर्ण हो जिसके लालच में स्त्री भी फंस जाये । एक कष्टकर प्रक्रिया से बच्चे को जन्म देने के बाद मां अपने बच्चे से कहीं विरक्ति अनुभव न करने लगे इसके लिये प्रकृति ने पुनः व्यवस्था की - बच्चे को अपना दूध पिलाना मां के लिये ऐसा सुख बना दिया कि मां अपने सब शारीरिक कष्ट भूल जाये । विचारकों का मानना है कि मां की विरक्ति के चलते बच्चा कहीं भूखा न रह जाये, इसी लिये प्रकृति ने ये इंतज़ाम किया है ।

    सच तो ये है कि सृष्टि को आगे बढ़ाये रखने के लिये जो-जो भी क्रियायें आवश्यक हैं उन सभी में प्रकृति ने आनन्द का तत्व जोड़ दिया है। भूख लगने पर शरीर को कष्ट की अनुभूति होने लगती है व भोजन करने पर हमारी जिह्वा को व पेट को सुख मिलता है। अगर भूख कष्टकर न होती तो क्या कोई प्राणी काम-धाम किया करता ! क्या शेर कभी अपनी मांद से बाहर निकलता, क्या कोई पुरुष घर-बार छोड़ कर नौकरी करने दूसरे शहर जाता ?

    पर लगता है कि हमें न तो ईडन गार्डन की पवित्रता चाहिये और न ही पशु-पक्षियों के जैसा न्यूडिस्ट समाज का आदर्श ही हमें रुचिकर है । कुछ लोगों की इच्छा एक ऐसा समाज बनाने की है जिसमे यौन संबंध को एक कप चाय से अधिक महत्व न दिया जाये । जब भी, जहां पर भी, जिससे भी यौन संबंध बनाने की इच्छा हो, यह करने की हमें पूर्ण स्वतंत्रता हो, समाज उसमे कोई रोक-टोक, अड़ंगेबाजी न करे । यदि ऐसा है तो हमें यह जानना लाभदायक होगा कि ये सारी रोक-टोक, अड़ंगे बाजी नारी के हितों को ध्यान में रख कर ही लगाई गई हैं । आइये देखें कैसे ?

    पहली बात तो हमें यह समझना चाहिये कि समाज को किसी व्यक्ति के यौन संबंध में आपत्ति नहीं है, निर्बाध यौन संबंध में आपत्ति है और इसके पीछे वैध कारण हैं ! हमारे समाजशास्त्रियों ने दीर्घ कालीन अनुभव के बाद ये व्यवस्था दी कि यौन संबंध हर मानव की जैविक आवश्यकता है अतः हर स्त्री - पुरुष को अनुकूल आयु होने पर यौन संसर्ग का अवसर मिलना चाहिये । चूंकि सेक्स का स्वाभाविक परिणाम संतानोत्पत्ति है, इसलिये दूसरी महत्वपूर्ण व्यवस्था यह की गयी कि संतान के लालन पालन का उत्तरदायित्व अकेली मां का न होकर माता - पिता का संयुक्त रूप से हो । यह व्यवस्था केवल मानव समाज में ही है । बच्चे का लालन पालन करना, उसे पढ़ाना लिखाना, योग्य बनाना क्योंकि बहुत बड़ी और दीर्घकालिक जिम्मेदारी है जिसमें माता और पिता को मिल जुल कर अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह करना होता है, इसलिये विवाह संस्था का प्रादुर्भाव हुआ ताकि स्त्री पुरुष के संबंध को स्थायित्व मिल सके, समाज उनके परस्पर संबंध को पहचाने और इस संबंध के परिणाम स्वरूप जन्म लेने वाली संतानों को स्वीकार्यता दे। स्त्री-पुरुष को लालच दिया गया कि बच्चे का लालन-पालन करके पितृ‌ऋण से मुक्ति मिलेगी, बच्चे को योग्य बना दोगे तो गुरु ‌ऋण से मुक्ति मिलेगी, ऐसी अवधारणायें जन मानस में बैठा दी गयीं। विवाह विच्छेद को बुरा माना गया क्योंकि ऐसा करने से बच्चों का भविष्य दांव पर लग जाता है । जो स्त्री-पुरुष इस दीर्घकालिक जिम्मेदारी को उठाने का संकल्प लेते हुए, एक दूसरे के साथ जीवन भर साथ रहने का वचन देते हुए विवाह के बंधन में बंधते हैं, उनको समाज बहुत मान-सम्मान देता है, उनके विवाह पर लोग नाचते कूदते हैं, खुशियां मनाते हैं, उनके प्रथम शारीरिक संबंध की रात्रि को भी बहुत उल्लासपूर्ण अवसर माना जाता है । उनको शुभकामनायें दी जाती हैं, भेंट दी जाती हैं । उनके गृहस्थ जीवन की सफलता की हर कोई कामना करता है ।

    दूसरी ओर, जो बिना जिम्मेदारी ओढ़े, केवल मज़े लेने के लिये, अपने शारीरिक संबंध को आधिकारिक रूप से घोषित किये बिना, क्षणिक काम संतुष्टि चाहते हैं उनको समाज बुरा कहता है, उनको सज़ा देना चाहता है क्योंकि ऐसे लोग सामाजिक व्यवस्था को छिन्न विच्छिन्न करने का अपराध कर रहे हैं ।

    अब प्रश्न यह है कि ये व्यवस्था व्यक्ति व समाज की उन्नति में, विकास में सहयोगी है अथवा व्यक्ति का शोषण करती है ? दूसरा प्रश्न ये है कि कोई पुरुष बच्चों के लालन-पालन का उत्तरदायित्व उठाने के लिये किन परिस्थितियों में सहर्ष तत्पर होगा ? कोई स्त्री-पुरुष जीवन भर साथ साथ कैसे रह पाते हैं ? जो स्थायित्व और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी की, वात्सल्य की भावना पशु-पक्षी जगत में कभी देखने को नहीं मिलती, वह मानव समाज में क्यों कर दृष्टव्य होती है?

    जब कोई स्त्री पुरुष एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करते हुए, एक दूसरे के साथ सहयोग करते हुए, साथ साथ रहने लगते हैं तो उनके बीच एक ऐसा प्रेम संबंध पनपने लगता है जो उस प्यार मोहब्बत से बिल्कुल अलग है - जिसका ढिंढोरा फिल्मों में, किस्से-कहानियों में, उपन्यासों में पीटा जाता है। एक दूसरे के साथ मिल कर घर का तिनका-तिनका जोड़ते हुए, एक दूसरे के सुख-दुःख में काम आते हुए, बीमारी और कष्ट में एक दूसरे की सेवा-सुश्रुषा करते हुए, स्त्री-पुरुष एक दूसरे के जीवन का अभिन्न अंग बन जाते हैं । वे एक दूसरे को "आई लव यू" कहते भले ही न हों पर उनका प्यार अंधे को भी दिखाई दे सकता है । यह प्यार किसी स्त्री की कोमल कमनीय त्वचा, सुगठित देहयष्टि, झील सी आंखों को देख कर होने वाले प्यार से (जो जितनी तेज़ी से आता है, उतनी ही तेज़ी से गायब भी हो सकता है) बिल्कुल जुदा किस्म का होता है। इसमे रंग रूप, शारीरिक गुण-दोष कहीं आड़े नहीं आते। इंसान का व्यवहार, उसकी बोलचाल, उसकी कर्तव्य-परायणता, सेवाभाव, समर्पण, निश्छलता, दया-ममता ही प्यार की भावना को जन्म देते हैं। ये प्रेम भावना पहले स्त्री-पुरुष के गृहस्थ जीवन को स्थायित्व देती है, फिर यही प्रेम माता-पिता को अपने बच्चों से भी हो जाता है। यह प्यार बदले में कुछ नहीं मांगता बल्कि अपना सर्वस्व दूसरे को सौंपने की भावना मन में जगाता है।

    ये सामाजिक व्यवस्था तब तक सफलतापूर्वक कार्य करती रहती है जब तक स्त्री-पुरुष में से कोई एक दूसरे को धोखा न दे । पुरुष को ये विश्वास हो कि जिस स्त्री पर उसने अपने मन की समस्त कोमल भावनायें केन्द्रित की हैं, जिसे सुख देने के लिये वह दिन रात परिश्रम करता है, वह उसके अलावा अन्य किसी भी व्यक्ति की ओर मुंह उठा कर देखती तक नहीं है। स्त्री को भी ये विश्वास हो कि जिस पुरुष के लिये उसने अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया है, वह कल उसे तिरस्कृत करके किसी और का नहीं हो जायेगा । बच्चों का अपने माता - पिता के प्रति स्नेह व आदर भी माता-पिता के मन में अपनी वृद्धावस्था के प्रति सुरक्षा की भावना जगाता है ।

    "पुरुष भी स्त्री के साथ बच्चे के लालन-पालन में बराबर का सहयोग दे" -इस परिकल्पना, व इस हेतु बनाई गई व्यवस्था की सफलता, इस बात पर निर्भर मानी गयी कि पुरुष को यह विश्वास हो कि जिस शिशु के लालन-पालन का दायित्व वह वहन कर रहा है, वह उसका ही है, किसी अन्य पुरुष का नहीं है। इसके लिये यह व्यवस्था जरूरी लगी कि स्त्री केवल एक ही पुरुष से संबंध रखे । कोई स्त्री एक ही पुरुष की हो कर रहने का वचन देती है तो पुरुष न केवल उसके बच्चों का पूर्ण दायित्व वहन करने को सहर्ष तत्पर होता है, बल्कि उस स्त्री को व उसके बच्चों को भी अपनी संपत्ति में पूर्ण अधिकार देता है। इस व्यवस्था के चलते, यदि कोई पुरुष अपने दायित्व से भागता है तो ये समाज उस स्त्री को उसका हक दिलवाता है ।

    स्त्री ने जब एक ही पुरुष की होकर रहना स्वीकार किया तो बदले में पुरुष से भी यह अपेक्षा की कि पुरुष भी उस के अधिकारों में किसी प्रकार की कोई कटौती न करे । दूसरे शब्दों में स्त्री ने यह चाहा कि पुरुष भी केवल उसका ही होकर रहे । पुरुष की संपत्ति में हक मांगने वाली न तो कोई दूसरी स्त्री हो न ही किसी अन्य महिला से उसके बच्चे हों ।

    शायद आप यह स्वीकार करेंगे कि यह सामाजिक व्यवस्था न हो तो बच्चों के लालन पालन की जिम्मेदारी ठीक उसी तरह से अकेली स्त्री पर ही आ जायेगी जिस तरह से पशुओं में केवल मादा पर यह जिम्मेदारी होती है । चिड़िया अंडे देने से पहले एक घोंसले का निर्माण करती है, अंडों को सेती है, बच्चों के लिये भोजन का प्रबंध भी करती है और तब तक उनकी देख भाल करती है जब तक वह इस योग्य नहीं हो जाते कि स्वयं उड़ सकें और अपना पेट भर सकें । बच्चों को योग्य व आत्म निर्भर बना देने के बाद बच्चों व उनकी मां का नाता टूट जाता है । पिता का तो बच्चों से वहां कोई नाता होता ही नहीं ।

    इसके विपरीत, मानवेतर पशुओं से ऊपर उठ कर जब हम मानव जगत में देखते हैं तो नज़र आता है कि न केवल यहां माता और पिता - दोनो का संबंध अपनी संतान से है, बल्कि संतान भी अपनी जन्मदात्री मां को व पिता को पहचानती है । भारत जैसे देशों में तो बच्चा और भी अनेकानेक संबंधियों को पहचानना सीखता है - भाई, बहिन, ताऊ, ताई, चाचा - चाची, बुआ - फूफा, मामा - मामी, मौसा - मौसी, दादा - दादी, नाना - नानी से अपने संबंध को बच्चा समझता है और उनकी सेवा करना, उनका आदर करना अपना धर्म मानता है । ये सब भी बच्चे से अपना स्नेह संबंध जोड़ते हैं और उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आर्थिक विकास में अपने अपने ढंग से सहयोग करते हैं ।

    बात के सूत्र समेटते हुए कहा जा सकता है कि यदि कोई स्त्री या पुरुष सेक्स को "महज़ चाय के एक कप" जैसी महत्ता देना चाहते हैं; उन्मुक्त सेक्स व्यवहार के मार्ग में समाज द्वारा खड़ी की जाने वाली बाधाओं को वह समाज की अनधिकार चेष्टा मानते हैं; यदि उन्हें लगता है कि उनको सड़क पर, कैमरे के सामने, मंच पर नग्न या अर्धनग्न आने का अधिकार है, और उनका ये व्यवहार समाज की चिंता का विषय नहीं हो सकता तो इसका सीधा सा अर्थ है कि वह इस सामाजिक व्यवस्था से सहमत नहीं हैं, इसे शोषण की जनक मानते हैं और इस व्यवस्था से मिलने वाले लाभों में भी उनको कोई दिलचस्पी नहीं है । यदि स्त्री यह विकल्प चाहती है कि वह गर्भाधान, बच्चे के जन्म, फिर उसके लालन-पालन की समस्त जिम्मेदारी अकेले ही उठाए और बच्चे का बीजारोपण करने वाले नर पशु से न तो उसे सहयोग की दरकार है, न ही बच्चे के लिये किसी अधिकार की कोई अपेक्षा है तो स्त्री ऐसा करने के लिये स्वतंत्र है । बस, उसे समाज द्वारा दी जाने वाली समस्त सुख-सुविधाओं को तिलांजलि देनी होगी । वह समाज की व्यवस्था को भंग करने के बाद समाज से किसी भी प्रकार के सहयोग की अपेक्षा भी क्यों रखे ? अस्पताल, डॉक्टर, नर्स, दवायें, कपड़े, कॉपी-किताब, स्कूल, अध्यापक, नौकरी, व्यापार आदि सभी सुविधायें समाज ही तो देता है । वह जंगल में रहे, अपना और अपने बच्चे का नीड़ खुद बनाये, उसक पेट भरने का प्रबंध स्वयं करे। क्या आज की नारी इस विकल्प के लिये तैयार है?

    यदि समाज द्वारा दी जा रही सेवाओं व सुविधाओं का उपयोग करना है तो उस व्यवस्था को सम्मान भी देना होगा जिस व्यवस्था के चलते ये सारी सुविधायें व सेवायें संभव हो पा रही हैं । सच तो ये है कि शोषण से मुक्ति के नाम पर यदि हम अराजकता चाहते हैं तो समाज में क्यों रहें, समाज से, समाज की सुविधाओं से दूर जंगल में जाकर रहें न ! वहां न तो कोई शोषणकर्ता होगा न ही शोषित होगा ! वहां जाकर चार टांगों पर नंगे घूमते रहो, कौन मना करने आ रहा है ?

    - सुशान्त सिंहल

    www.sushantsinghal.blogspot.com

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  11. Singhalji , NishchiNt raheN, Aapki TIPPNI par sheeghra hi KARYAWAHI ki jayegi.

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