बुधवार, 31 मार्च 2010

परिभाषा में बंधते ही प्रगतिशीलता रुढ़ि बन जाती है.

फ़ेस बुक पर एक दोस्ताना बहस


Sanjay Grover : परिभाषा में बंधते ही प्रगतिशीलता रुढ़ि बन जाती है।
Sat at 12:10pm Friends of Friends • Comment •LikeUnlike
Babykumari Kumari, Vijay Krishna Mishra, Ajay Kumar and 2 others like this.

Arkjesh Kumar कोई उदाहरण ? Sat at 1:13pm

Sanjay Grover : zarur deNge. Sat at 2:47pm •

Ernest Albert : @arkjesh ji,
e.g love is blind
non-alignment is the best policy
'we must consign our dead in ganga ma'
'earn max punnya will get manas chola'
(so much punnya after the firangi left that from 34 crores we have crossed 127 crore mark),
i could go on n on.
Sat at 7:18pm •
Anjule Maurya : हर विचारधारा के साथ ये समस्या है ...जहान उसके चाहने वाले बढ़ते हैं..विचारधरा उनसे और समर्पित होने की मांग करती जाती है...एक दिन वों भी आता है जब आपने आगे किसी और विचारधारा का कुछ भी सुनने से इंकार करदेती है...फिर वहीँ से वों प्रगतिशील विचार धारा rudhwadhi बन जाती है...पता नहीं क्यों लेकिन होता अक्सर यही है..
Sat at 8:05pm •
Aradhana Chaturvedi : @ Sanjay Grover पर मानव मन परिभाषाएँ बनाने से बाज भी तो नहीं आता.
Sat at 10:12pm •

Arkjesh Kumar @ Ernest albert
आपके दिए हुए उदाहरण प्रगतिशीलता के नहीं रुढि के ही हैं ।
कोई भी विचार जब समय और परिस्थति के अनुसार स्वयं को अपडेट नहीं करता तो वह रुढि बन जाता है ।
रुढि बदलाव की और रूढ़िवादी, बदलाव करने वालों के दुश्मन बन जाते हैं ।
हर "वाद" प्रगतिशीलता का दुश्मन होता है ।
प्रगतिशील व्यक्ति के लिए मनुष्य और समाज का हित किसी वाद , सिद्धांत या परंपरा से बड़ा होता है ।
नए फैशन के कपड़े या विचारधारा को पहनने से भी कोई प्रगतिशील नहीं होता ।
प्रगतिशील किसी की दी हुई परिभाषा से नहीं बल्कि स्वविवेक से जीता है ।
उदाहरण अभी भी बाकी है :-)
Sat at 10:27pm

Ajay Kumar : # Great.WELL SAID arkjesh. I liked that.
Sun at 9:24am
Sanjay Grover : आम उदाहरणों से बात करता हूं। जब हम बड़े हो रहे थे चारों तरफ़ यही माना जाता था कि जो अंग्रेजी बोलता है, आधुनिक होता है और तरक्की करता है। तरक्की की बात तो समझ में आती है, हालांकि उसकी भी अपनी-अपनी परिभाषाएं हैं। अगर किसी समाज में चोरी-चकारी को मान्यता और प्रतिष्ठा प्राप्त है और व्यवसाय और नौकरी में भी उसे आवश्यक माना जाता है तो बड़ी संभावना इसी बात की है कि वैसे ही लोग तरक्की करेंगे। लेकिन मैं देखता कि अंग्रेजी बोलने वाले दहेज लेते-देते हैं, मूर्ति को दूध पिलाते हैं, स्त्रियों को सामाजिक मान्यताओं के बाहर जाकर कुछ करने नहीं देना चाहते, बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर, सी.ए....आदि से अलग कुछ बनने नहीं देना चाहते, तो मैं उलझन में पड़ जाता। भाषा सिर्फ माध्यम है, बिना विचार और तर्क के आधुनिकता कैसे आ सकती है ? वहां अंग्रेजी को आधुनिकता के रुप में एक आम स्वीकृति थी। हिंदी के लिए बात करते हुए मुझे हंसी भी उड़वानी पड़ती, अकेला भी पड़ जाना होता था। भीड़ उस वक़्त भी अंग्रेजी के साथ थी। ज़्यादातर लोगों को नहीं मालूम था कि वे अंग्रेजी का समर्थन भीड़ की वजह से करते हैं। अगर फिल्म इण्डस्ट्री में या किसी उद्योगपति की बेटी स्कर्ट पहन ले तो इसमें कोई आधुनिकता नहीं है क्यों वहां तो यह आम चलन है। कोई किसी गांव में जींस पहनना शुरु कर देता है तो इसे हम प्रगतिशीलता इतने तक ही मान सकते हैं कि उसने भीड़ के खिलाफ जाने का साहस किया। अगर जींस पहनने के अलावा उसके तमाम व्यवहार और विचार पहले जैसे हैं तो जींस और धोती में क्या फर्क हुआ ? थोड़े दिन में सारा गांव जींस पहनने लगेगा मगर बाक़ी सब यथावत चलता रहेगा। हिंदुस्तान में आज प्रगतिशीलता के नाम पर यही तो हो रहा है। लड़कियां स्कर्ट पहन रहीं हैं, लड़के प्रेम कर रहे हैं, बुड्ढे इंटरनेट पर बैठ रहे हैं मगर अंधविश्वास ख़त्म नहीं हो रहा, बाबा और बाबाई चैनल बढ़ते जा रहे हैं, न्यूज़ चैनल अंधविश्वासों को हवा दे रहे हैं। करवाचैथ तो छोड़िए, सती प्रथा और बुरके तक की वकालत होने लगी है। बुरका और घूंघट भी किसी के लिए प्रगतिशीलता हो सकती है बशर्ते कि वह इन्हें किसी समाज, भीड़, धर्म और प्रतिष्ठा गिर जाने के डरों या दबावों की वजह से नहीं बल्कि अपनी सुविधा के मद्दे-नज़र अपनाए जा रहे हो। जैसे कि मुझे गर्मियों में जींस, कुर्ता और हवाई चप्पल में सुविधा लगती है तो मैं पूना से लेकर अलीगढ़ तक इन्हीं कपड़ों में घूम आता हूं। मुझे परवाह नहीं कि इनमे से क्या पूरब का है, क्या पश्चिम का है,ं क्या फैशन में है, क्या नहीं है, दोस्त क्या कहेंगे, रिश्तेदार क्या कहेंगे, वगैरह.........
(बाक़ी ब्रेक के बाद....) Sun at 11:00am

Sanjay Grover : @Ernest Albert
mujhe lagta hai aapne sirf paribhashayeN samne rakhi haiN, unke ghalat hote jane ke udaharan ko zyada spasht nahiN kiya. ya to maiN aapki bat nahiN samajh paya ya Arkjesh.
Sun at 11:13am

Aradhana Chaturvedi : @ Sanjay Grover मुझे भी यही लगता है कि आज अंग्रेजीदां लोग ज्यादा रूढ़िवादी होते हैं. मैंने यहाँ दिल्ली की कानवेंट एजुकेटेड लड़कियों को करीब से देखा है, उनका एक ही सपना होता है- किसी अमीर लड़के से शादी करना, और कैनेडा चले जाना. जबकि पहनावा देखो तो ऐसा लगेगा कि इनसे अधिक आधुनिक तो और कोई हो ही नहीं सकता. पूजा-पाठ, व्रत-उपवास और अन्धविश्वास में ये लड़कियाँ यू.पी., बिहार की लड़कियों से दस गुना आगे हैं. कुँवारी लड़कियाँ भी करवा चौथ का व्रत इतनी खुशी-खुशी रखती हैं कि आश्चर्य होता है..हमारे उत्तर प्रदेश की भी कॉनवेंटेड लड़कियों का यही हाल है..हद है. Sun at 11:47am

Arkjesh Kumar @ संजय जी
बढ़िया बता रहे हैं , जारी रहिए ।
हमारा क्लीन शेव होना भी उस समय अपने दायरे में एक प्रगतिशील कदम था । काफी साहसी भी :-) अब लोग मुछमुँडोँ को देखकर उतने असहज नहीं होते गाँवों में भी । लेकिन आज से दस साल पहले लड़के को क्लीन शेव देखकर लोग लानत की द्रिष्टि से देखते थे । भले ही दिलीप कुमार के दीवाने हों ।
इस विषय पर हमने काफी लम्बीँ बहसेँ भी की लोगों से । अब उन तर्कोँ को याद करके हँसी भी आती है ।
Sun at 2:48pm
Arkjesh Kumar @ आराधना
अच्छा उदाहरण है ।
कान्वेन्ट की लड़कियों को अच्छा पति पाने की ख्वाहिश नहीं होनी चाहिए क्या :-)
और रही बात अंग्रेजी की तो वह हमारे सामने ग्यान और विचार का व्यापक फलक खोलती है । अब यह हमारे ऊपर है कि हम किधर आँख बंद करते हैं और किधर खोलते हैं ।
यह कहिए कि सिर्फ कोई भाषा इतनी सक्षम नहीं होती कि वह किसी को प्रगतिशील बना सके ।
Sun at 3:10pm
Aradhana Chaturvedi : @ arkjesh, बात अच्छा पति पाने की नहीं है. एक अच्छा जीवनसाथी सभी को चाहिये होता है. बात सिर्फ़ इसी बात के पीछे पड़े रहना है. जैसे ज़िन्दगी में यही सबसे बड़ी बात यही हो. पालन-पोषण ही ऐसे होता है उनका कि सिर्फ़ दुल्हन बनने के लिये तैयार किया जाता है. हाँ, ये बात हो सकती है--- कोई भाषा इतनी सक्षम नहीं होती कि वह किसी को प्रगतिशील बना सके ।
Sun at 6:35pm
Sanjay Grover : @ arkjesh,आराधना ने अपने कमेंट में अच्छा नहीं अमीर शब्द का इस्तेमाल किया था। ज़रुरी नहीं कि अमीर पति अच्छा भी हो। हां, यह भी ज़रुरी नहीं कि वह बुरा हो।
Sun at 7:49pm
Arkjesh Kumar मेरे कमेँट में भी अच्छा की जगह अमीर पढ़ा जाए
Sun at 10:46pm

Sanjay Grover :-) Yesterday at 8:57am    @Anjule Maurya...पता नहीं क्यों लेकिन होता अक्सर यही है..se sahmat.
Yesterday at 12:18pm
Sanjay Grover : अर्कजेश की बात ‘प्रगतिशील स्वविवेक से जीता है’ को बढ़ाते हुए कहूंगा कि जैसे ही प्रगति महज़ भीड़ से संचालित होने लगती है, रुढ़ि बनने लगती है। जैसे कि एक बेटी कल अपनी मां से कहे, ‘‘ मम्मी, आजकल मेरी सारी ही सहेलियां लिव-इन कर रही हैं, मुझे भी कर लेने दो।’’ मां, ‘‘ अच्छा ! हां, कल रिच्चा की मम्मी भी आयी थीं, कह रही थी रिच्चा ने भी किसी से लिव इन कर लिया है। सुनते हो, जब उसकी सारी फ्रेंडस् लिव इन कर रहीं हैं तो एक बार उसको भी कर लेने दो न !’’
‘‘ चल बेटा तेरे पापा को तो मैं मना लूंगी, पर ध्यान रखना, करवाचाौथ कभी मत भूलना....और सुबह उठकर पति के पांव ज़रुर छूना...और बेटा लिव इन के बाद भी पति का घर ही पत्नी का घर होता है.....जहां एक बार लिव इन करने जाओ, अर्थी वहीं से बाहर आनी चाहिए.....
एक पुराना चुटकुला याद आ गया जो बात को और साफ़ करेगा:
गृहस्वामी: पंडजी, वैज लेंगे या नान-वेज ?
पंडजी: नान-वेज चल जाएगा बेटा, पर ध्यान रहे, उसमें प्याज़ नहीं होना चाहिए
Yesterday at 3:02pm
Aradhana Chaturvedi : बिल्कुल, लिव इन भी एक संस्था का रूप लेकर शादी जैसी बन जायेगी, अगर आपने जैसा बताया है, वैसा ही हुआ तो...मतलब लिव इन अब फ़ैशन में आ गया है इसलिये हमें भी करना है... बहरहाल, तो मैं ये देख रही हूँ कि ज्यादातर लोग शादी इसलिये करते हैं क्योंकि तीस के ऊपर होते ही आपके ऊपर सवालों की गोलियाँ ही नहीं लाठी, बम और कट्टे तक चलने लगते हैं, जैसे कि आपने शादी न करके कोई बड़ा अपराध कर दिया हो. औरतों को ज्यादा झेलना पड़ता है, पर पुरुषों को भी कम नहीं.
Yesterday at 3:03pm
Arkjesh Kumar : इस मकाम पर चर्चा यह ध्वनित कर रही है कि फैशन देखादेखी है या कोई काम इसलिए करना कि ज्यादातर लोग वैसा कर रहे हैं । लिव इन मेँ लिवने के बाद भी यदि कुंडली , दहेज वगैरह की शहीदी प्रक्रिया ही दुहरानी है , तो फिर यह सिर्फ शादी के पहले की सुविधापूर्ण व्यवस्था है । और लिव इन के बाद विवाह का रिश्ता बनावटी होगा ।
Yesterday at 8:40pm
Arkjesh Kumar शादी न करना कोई आलोचनात्मक बात नहीं है । फिर भी इस तथ्य से कौन इंकार करेगा कि स्त्री पुरुष का साथ रहना एक प्राकृतिक आवश्यकता है । इसी के लिए शादी का विधान किया गया था । आज शादी की जटिलताओँ की वजह से लोग शादी को तो इंकार कर रहे हैं । लेकिन शादी से इतर स्त्री पुरुष के साथ रहने को समाज सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा ।
फिर लिव इन मेँ भी वही स्त्री के अधिकार , संबंध विच्छेद , और बच्चे से संबंधित कानूनी पेँच शुरू हो गए हैं ।
तो शादी से आप इंकार कर सकते हैं लेकिन उसके विकल्प की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता ।
और इसके विकल्प की समाज द्वारा स्वीकार्यता गैर शादीशुदा लोगों के लाभार्थ जल्द से जल्द बननी चाहिए ।
Yesterday at 9:06pm

इस विषय में आपके विचार जानना ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा.....

सोमवार, 29 मार्च 2010

दोबारा में : 8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक

Saturday, March 7, 2009
8 मार्च पर ‘‘मर्दों वाली बात’’ और 4 लिंक

व्यंग्य

**मर्दों वाली बात**

वातावरण मर्दांनगी से भरपूर था। इतना कि भरी हुई टोकरी से मरी हुई मछलियो की तरह मर्दानगी फिसल-फिसल जाती थी। मर्दानगी के कई रूप थे। कही घनी मूंछों में थी, तो कहीं बांहों की फड़कती पेशियों में। चढ़ी हुई आंखों में थी, तो मस्तानी चाल में थी। बच्चों को गरियाते हुए थी और मां-बहनों को सुरक्षियाते हुए थी। अखबारी कागज़ पर कूद-फांद भी मचा रही थी और धर्म के दंगल में कुश्ती भी लड़ रही थी।
एक खास किस्म के चिंतन की कृपा से एक खास किस्म की पूर्व-निर्धारित शैली में जीने वाले सभी जन मर्द थे। हालांकि वे गैस का सिलिंडर लाने से लेकर बिजली का बिल जमा कराने तक जीवन के सभी क्षेत्रों में ‘एडजस्ट‘ कर लेते थे, मगर फिर भी मर्द बने रहते थे, क्योंकि औरतों के साथ ‘एडजस्ट‘ नहीं कर पाते थे। वे सब इसलिए भी मर्द थे कि वे माइकल जैक्सन नहीं थे। हालांकि उनमें से कई कवि, लेखक और कलाकार थे, जो लंबे बाल भी रखते थे और पान से होंठ लाल भी किए रहते थे। मंच पर सांस्कृतिक हरकतें मचाने में वे माइकल से उन्नीस भी नहीं पड़ते थे, पर वे सुमित्रानंदन पंत भी नहीं थे कि अपनी सुकुमारता को मर्दानगी से स्वीकार पाते। हाय कि मर्द होते हुए भी वे सब कितने लाचार थे।
उनमे से कुछ लोग लंबे बाल रखने की बजाय दाढ़ी बढ़ाए रखते थे, तो कुछ, कुछ और प्रतीकें। ये सब उनके पूर्वजो की पुस्तकों में मर्दानगी के चिन्ह घोषित किए गए थे और मर्दानगी सिर्फ प्रतीकों में ही बची रह गई लगती थी। अपने पूर्वजों की पुस्तकों और उनमें तय किए जा चुके मर्दानगी के मानदंडों में लिथड़े हुए वे आंखें बंद किए पड़े रहते थे। यह उनकी मर्दानगी का एक और प्रकार था। अपनी टोटल मर्दानगी के बावजूद वे मर्दानगी के सभी प्रतीकों का खुलकर प्रदर्शन न कर पाने की अपनी सांस्कृतिक मजबूरी पर मन मसोस कर रह जाते थे।
लगभग सभी मर्द लोग बदलाव के हामी थे, मगर धीरे-धीरे। वे कमीज-धोती से शर्ट-पतलून तक तब आते थे, जब दूसरे (कम मर्द या नामर्द) लोग छींटदार कपड़ों पर पहुंच जाते थे। इस तरह वे एक बदलाव लाते हुए भी, बड़े धैयपूर्वक, एकाध सीढ़ी का ‘गैप‘ बनाए रखते थे। वे चाहते थे कि देश-समाज-सभ्यता-संस्कृति को धक्का एकदम से न लगे बल्कि धीरे-धीरे लगे। हालांकि यह युक्ति किसी असाध्य रोग को झेल रहे वृद्ध रोगी को दयामृत्यृस्वरूप ‘स्लो प्वाइज़न‘ देने जैसे थी, मगर उनकी मर्दानगी के अनुकूल पड़ती थी।
एक दिन उन सबने उन पुरस्कारों पर हाय-तौबा मचा दी, जो उन्हें नहीं दिए गए थे। हालांकि माइकल जैक्सन कोई इधर का उद्योगपति नहीं था। फिर भी उसे न जाने क्या सूझी कि उसने इधर के मर्दों के लिए कुछ लंबे-मोटे पुरस्कारों की घोषणा कर दी।
इसके बाद क्या हुआ? क्या उन्होंने माइकल जैक्सन की भावनाओं का आदर करते हुए पुरस्कार ग्रहण कर लेने की सहृदयता व सहिष्णुता दिखाई? या पुरस्कार लौटा देने का क्रांतिकारी कदम उठाया? पाठक-श्रोता-दर्शक-आलोचक अपने-अपने अंदाजें मारते हुए अपने-अपने नतीजों पर पहुंच गए थे।
इधर मेरे लिए वक्त आ गया था कि हर लेख के अंत की तरह एक बार फिर डरूं। अतः जैसा कि नहीं होना चाहिए, पर अक्सर होता है, मैंने घोषणा की कि यह सब तो एक सपना था।

यह हुई ना मर्दों (ना+मर्दों?) वाली बात।




-संजय ग्रोवर

(जनवरी, 1997 को हंस में प्रकाशित)

+
‘अनुभूति’ पर कविताएं ‘स्त्री थी कि हंस रही थी’ और ‘हमारी किताबों में हमारी औरतें’

‘संवादघर’ पर कार्टून ‘‘कार्टूनखाना में स्कर्टस्’’

‘अमर उजाला’ में ग़ज़ल

‘संवादघर’ में कविता ‘मर्दानगी’

प्रस्तुतकर्ता sanjaygrover पर 2:32 PM
(लेबल: कविता, कार्टून, व्यंग्य, स्त्री-विमर्श के आस-पास, ग़ज़ल)

प्रतिक्रियाएँ:

3 टिप्पणियाँ:

प्रेम सागर सिंह said...
ग्रोवरजी,
शानदार आलेख है, आभर।
March 8, 2009 8:30 PM

amarpathik said...
Sanjay bhai apka lekh sachmuch krantikaari hai....
March 26, 2010 2:51 PM

mukti said...
हा हा हा हा !!! ये इतना अच्छा व्यंग्य कैसे मुझसे छूट गया. अच्छा हुआ फ़ेसबुक पर आपने लिंक दिया.
March 26, 2010 6:15 PM

बुधवार, 17 मार्च 2010

पुरस्कार का बहिष्कार और अखिल-भारतीय अरण्य-रोदन

गधा ऐसे सम्मेलन में कोई पहली बार नहीं आया था।
जब भी वह मानवता, ईमानदारी प्रेम वगैरह जैसी दकियानूसी, पुरातनपन्थी, आउट आॅफ डेट, आउट आॅफ फैशन हो चुकीं बातों का बोझा ढोते-ढोते थक जाता है, ऐसे ही किसी सम्मेलन की किसी कुर्सी पर बैठ कर थोड़ी देर सुस्ता लेता है।
‘शायद हर गधे की यही मजबूरी है’, ऐसा सोचकर वह अपने दिल को तसल्ली दे लेता है।
मंच पर सभी रंगों के कलम कुमार विराजमान थे - लाल, पीले, हरे, केसरिया ... ... ... और इनके अलावा जितने भी रंगों के कलम कुमार हो सकते हैं ... ... ... सभी।
गधे के आगे वाली पंक्तियों में जितने भी लोग बैठे थे, उन सबको वी.आई.पी. का दर्जा दिया गया था।
यह कोई नई बात न थी।
गधे के पीछे यानि सबसे पीछे की पंक्तियों में ढेर सारे आमलाल ढेर हुए पड़े थे।
(चूंकि गधा खुदमें और आम आदमी में कोई फर्क पाता होगा सो फिलहाल उसने आम आदमी का नाम सुविधा के लिए आमलाल रख छोड़ा था।)
गधा इस बात से भी हैरान न होता था। वह जानता था कि जो आमलाल लेखकों और वक्ताओं की सबसे अगली पंक्तियों में गाजे-बाजे, शहनाई या ढोल की आवाज़़ के साथ पेश किए जाते हैं वही आमलाल ऐसे लेखकों व वक्ताओं द्वारा आयोजित सम्मेलनों की पिछली पंक्तियों में ‘खाली जगह भरो‘ के अन्दाज़ में कुर्सियां भरने और तालियां पीटने के काम आ जाते हैं।
हमेशा की तरह आज भी एक विषय रखा गया था। आज का विषय था ‘प्रो0 हठधर्मी ने ‘चमचम’ पुरस्कार क्यों लौटाया‘।
एक बार तो इस वाक्य को पढ़कर गधा गलतफहमी में पड़ गया कि कहीं सभी कलम कुमारों को इस बात का अफसोस तो नहीं है कि प्रो0 हठधर्मी ने पुरस्कार क्यों लौटा दिया।
मगर फिर उसने सोचा कि बिना कुछ जाने-सुने कोई अन्दाजा लगा लेना ठीक नहीं होगा।
सभी कलम कुमारों ने बारी-बारी से अपने हिस्से के विचार रखे।
और गधे ने (चूंकि गधा था) नोट किया सभी कलम कुमार प्रो0 हठधर्मी के इस प्रस्ताव का जिक्र तो बड़े जोर-शोर से करते कि पुरस्कार उदीयमान साहित्यकारों को दिए जाएं और ऐसी कुछ धनराशि वयोवृद्ध व अस्वस्थ साहित्यकारों के लिए रखी जाए। मगर प्रो0 हठधर्मी के बयान के उस हिस्से का जिक्र आते-आते तकरीबन सभी की दशा हवा निकले गुब्बारे की मानिन्द हो जाती, जिसमें प्रो0 ने पुरस्कारों के औचित्य पर उंगली रखी थी कि आखिर पुरस्कार दिए भी क्यों जाते हैं।
खैर साहब, जहाँ तक तालियां बजने की बात है तो उस दिन भी खूब बजी। कलम कुमारों की एकता और परस्पर सहयोग का अनूठा उदाहरण देखने को मिला।
जब लाल कलम कुमार अपना वक्तव्य समाप्त करते तो पीले, हरे, नारंगी आदि सभी कलम कुमार तालियां बजाते। ऐसे ही जब हरे कलम कुमार अपना वक्तव्य खत्म करते तो बाकी सब रंग के बजाते और इतनी बजाते कि वहां बैठे आमलालों को लगने लगता कि अगर हमने तालियां न बर्जाइं तो इसे हमारे साहित्य विरोधी और कूड़मगज़ होने की निशानी मानी जाएगी।
इस बात पर किसी का भी ध्यान न था कि गधा तालियां बजा रहा है या नहीं।
गधों पर ध्यान देता भी कौन है। वैसे भी हर सभा में एक न एक गधा तो पहुंच ही जाता है।
फिर पुरस्कार वितरण समारोह हुआ। लाल रंग के कलम कुमार को पुरस्कृत किया गया। साथ ही यह भी घोषणा की गई कि अगली बार का पुरस्कार नारंगी कलम कुमार को दिया जाएगा।
अबकी बार तो गधा भी थोड़ा सा हैरान हुआ।
उसने अगली पंक्ति में सो रहे एक वी.आई.पी. जी को जगाकर इसका कारण पूछा। वी.आई.पी. जी ने बिना पीछे देखे बताया कि अब तो पीले, हरे, लाल आदि सभी कलम कुमारों को पुरस्कार मिल चुके हैं। अगले साल के लिए नारंगी जी ही बचे हैं। यही इस संस्था के पुरस्कार देने के नियम हैं।
बेचारा मूर्ख गधा। वह समझ बैठा था कि आज का पुरस्कार भी सर्वश्रेष्ठ वक्तव्य और सार्थक विचारों व प्रस्तावों के आधार पर दिया गया है। मगर थोड़ी देर माथापच्ची करने पर उसे ध्यान आया कि ऐसा कुछ हुआ ही कहाँ था।
गधे ने एक बार फिर गधापन दिखाया। उसने वी.आई.पी. जी से विनय की कि उसे मंच पर बोलने की अनुमति दी जाए।
तब पहली बार वी.आई.पी. जी ने मुड़कर देखा। जब उन्होंने गधे को देखा तो वे लगभग गुर्राते हुए स्वर में बोले,‘‘ऐ मूर्ख गधे, हम गधों को मंच पर बोलने की अनुमति नहीं देते।‘‘
‘‘और भी तो बोले हैं,‘‘ गधे ने कहा,‘‘और जब इतने खास लोगों के बाद एक आम गधे को मंच पर लाया जाएगा तो सोचिए आपका कितना नाम होगा। दलितो-शोषितों व आम लोगों ... ... मेरा मतलब है आम गधों के उद्धारक के रूप में आपका नाम व चित्र कल के अखबार में मुखपृष्ठ पर प्रकाशित होगा।‘‘
अपनी मशहूरी की सेहत की समृद्धि में सहायक हो सकने वाले इस मक्खन पर वी.आई.पी. जी का महत्वाकांक्षी पैर ‘स्लिप‘ हो गया। मन में फूट रहे लड्डूओं को दया और सहानुभूति के ढक्कन के नीचे छुपाते हुए उन्होंने कहा,‘‘चलिए, जहां इतने बोले, वहां एक और सही।‘‘
और साहबान, गधे ने मंच पर चढ़कर सिर्फ एक शेर कहाः-

सोचता तो होगा तन्हाई में मनसबदार भी,
जो खिलौना हो गया लड़ने की ठाने किस तरह।

और यकीन मानिए, यह मुझे भी नहीं पता कि दूसरे दिन के अखबारों में गधे का और उस शेर का जिक्र था या नहीं।

(मुल्ला नसरूद्दीन, शरद जोशी, कृश्न चंदर, श्रीलाल शुक्ल और गधे से क्षमा याचना सहित)

-संजय ग्रोवर

(लगभग 15 साल पुराना व्यंग्य)

रविवार, 7 मार्च 2010

हमारी क़िताबों में हमारी औरतें

 ~~~~कविता~~~~

औरतें खुश हो जाएं

आखिर हमने ढूंढ ही निकाला
पवित्र क़िताब की पृष्ठ-संख्या इतने के
उतनेंवें श्लोक में लिखा है
औरतों को दिए जाने चाहिए अधिकार और न्याय

मगर ज़रा ठहरो

यह तो हमने देखा ही नहीं कि
औरतों को अपनी मनपसंद चीज़ें मिलने पर
खुश होने के लिए
पवित्र क़िताब में लिखा है कि नहीं

बहरहाल
जिन औरतों को चाहिएं अधिकार और न्याय
वे अपने जीवन और चिंतन
अपने समय और समझ
अपने संसार और सपनों
अपने अनुभवों और अरमानों
को आले में रखकर
चली आएं

पवित्र क़िताब की पृष्ठ-संख्या इतने की
पंक्ति-संख्या उतनी में

और ज़रा लाइन लगा लें
ठीक से
व्यवस्था बनाएं रखें

जो शरमाती हैं, घबराती हैं
निकल नहीं सकती खुद घर से
वो अपने भाईयों, बापों, पतियों
या पड़ोसी पुरुषों को भेज दें
हम आज सभी को देंगे अधिकार और न्याय

(जो नहीं लेंगी हमसे न्याय-उनके किसी अंजाम के हम नहीं होंगे जिम्मेवार-या हम ही होंगे जिम्मेवार)

हम तो हैं ही दाता
अपने बराबर ही देंगे तुम्हे भी
शुकर करो और प्रार्थना करो कि
हमारी दान देने की योग्यता और विनम्रता
ऐसे ही बनी रहे

और तुम्हे कभी कोई परेशानी न आए
माँगने और पाने में
(तुम माँगती रहो हम देते रहें)

हम क्यों करेंगे भेद
हमारी ही तो हैं औरतें
हमारी ही हैं क़िताबें भी

मानाकि
दीमकों की खायी
धूल में अटी
जालों में लिपटी क़िताबों में
पता लगाना मुश्किल है कि
दीमकें, धूल और जाले
भीतर से बाहर आए हैं
या बाहर से अंदर गए हैं

मगर फिर भी बहुत जगह है इनके अंदर

और औरतों
तुम तो बिलकुल निश्चिंत रहो
तुम्हारे लिए तो कुछ शब्द ही काफी हैं

एक श्लोक, एक आयत, एक वाक्य.............

भारी है
तुम्हारे सारे जीवन,
सारे अस्तित्व,
सारे व्यक्तित्व,
सारे विचारों पर

फिर हम भी तो हैं तुम्हारे साथ
सही-सही तौलकर न्याय करेंगे
तराजू तो हमारे ही हाथ है
एक पलड़े में हैं
पवित्र क़िताब के दो शब्द
दूसरे में दुनिया की सारी औरतें

आओ और तुल जाओ

जैसे-जैसे मिलते जाएंगे क़िताबों में
वैसे-वैसे हम देते जाएंगे
तुम्हे तुम्हारे अधिकार

पहले नहीं मिले थे तो नहीं दिए थे
अब मिल गए हैं तो दे दिए हैं

मगर ज़रा ध्यान रखना
क़िताब से बाहर मत निकलना
बल्कि क़िताब में जो-जो पृष्ठ हमने बताए हैं
उनसे भी नहीं

क़िताब में रख दिया गया है वह सभी कुछ
जो तुम्हारे लिए उचित समझा गया है

इसके अलावा
आगे भी जो कुछ उचित समझा जाएगा
पहुँचा दिया जाएगा क़िताब ही में

क़िताब में साँस लेना
क़िताब में से आसमान देखना
क़िताब में स्वतंत्रता से रहना
(क़िताब में लिखा है कि तुम्हारे लिए कितने फुट कितने इंच स्वतंत्रता ठीक रहेगी)

फिर एक दिन
क़िताब में ही मोक्ष को प्राप्त हो जाना

तुम्हारी सहूलियत के लिए हम
प्राचीन आसमानी ग्रंथकारों के
आधुनिक ज़मीनी अवतारों से
सिफारिश भी कर देंगे कि
क़िताब को कोई अच्छा सा नाम भी दे दें
जैसेकि जीवन

अब तो खुश हो ना औरतों !

हमारी क़िताबों के हवाले से
हमारी औरतों से
हमें बस यही कहना है

---संजय ग्रोवर

~हंस (जुलाई 2000) में प्रकाशित~

मंगलवार, 2 मार्च 2010

धत्त तसलीमा !

तसलीमा जो हैं सो बचपन से ही अत्यंत षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति की रहीं। उन्होंने ख़ुद ही अपने चाचा-मामा को उकसाया कि वे उनसे दुराचार करें या इसकी कोशिश करें ताकि बड़ी होकर वे इस पर लिख कर पैसा कमा सकें।

वे इतनी बेवकूफ़ रहीं कि क्रांति और बदलाव की कुसंगत में पड़ गयीं। उस मूर्ख औरत को यह नहीं न मालूम था कि यहां क्रांतिकारियों और परिवर्तनकारियों को भी पहले कलाकार, शिल्पकार और साहित्यकार होना पड़ता है, भले बाद में उस सीखी हुई भाषा से भ्रांति और भटकाव फैलाओ। नहीं तो आठ लेखों और साठ जुगाड़ों वाला कोई भी महात्मा उन्हें दोयम दर्जे का लेखक सिद्ध करने का आरक्षण पा जाता है। यहां अच्छे-अच्छे ‘रिबेल्स’ को पहले क्यू में खड़े होकर अपने वाक्यों की मात्राएं गिनवानी होती हैं। चाहे तो कोई प्रूफ़ रीडर भी अच्छी-ख़ासी क्रांति को एक टिक लगाकर कर रिजेक्ट कर सकता है। और मैं आपको बताऊं कि तसलीमा कोई धक्के-वक्के नहीं खा रही। आपने वो गाना सुना है न ‘अराउंड द वल्र्ड इन एट डालर्स......’। हां हां बस वैसे ही घूमने निकलीं हैं तसलीमा। मुकदमे खा रही है, फ़तवे जमा कर रही है। शौक़ीन औरत ! धत्त ! क्या कहा संघर्ष ? अरे, संघर्ष तो हम करते हैं। आप क्या समझते हैं जुगाड़ से विदेश यात्राएं हथियाना मामूली काम है !? और, फिर वहां जाना, जाकर रहना, रहकर दोस्तों-रिश्तेदारों से मिलना-जुलना, उनके साथ घूमना-फिरना, पर्यटन-स्थल देखना, शापिंग करना फिर यहां आकर पास्ता और नाश्ता के स्वाद और सुगंध को शब्दों में अभिव्यक्त करना। रिश्तेदारों के घरों में जा-जाकर वहां से लाए तोहफे बांटना...। तसलीमा करके दिखाएं न यह सब।

करतीं क्या है वो। लिखती हैं जी। लिखती भी ऐसा जो साफ-साफ एक बार में समझ में आ जाए। ऐसे तो कोई भी लिख लेगा। अरे, ऐसा लिखो जिसके चार मतलब हों और चार बार में समझ में आए। और जो समझ में आएं वो अगला पैरा पढ़ते ही फ़िर सफ़ा हो जाएं। समझ ही न आए कि हम -तिया हैं कि लेखक बदमाश है। पाठक को सिर न धुनना पड़े तो कला काहे की। अरे, सीधी बात, फ़ायदे हम चारों मतलबों से उठा सकें। नुकसान की बारी आए तो चारों से मुकरा जा सके। तसलीमा में है इत्ती कला ?

इतनी बड़ी हो गयीं अभी तक धर्मनिरपेक्षता का मतलब ही नहीं समझतीं। सरलीकरण करतीं हैं। कहतीं हैं सब धर्मों से समान दूरी। बताईए ! आप जिस घेरे में पैदा हुए उसमें और दूसरों में समान दूरी कैसे हो जाएगी ? अपने घेरे को एक हाथ तो ऊँचा रखना पड़ेगा न ! समान दूरी से देखने के लिए तो अपना घेरा छोड़ कर बाहर निकलना पड़ेगा ! ना बाबा ! हमें तसलीमा नहीं बनना। हमें परिवार भी चाहिए, प्रतिष्ठा भी चाहिए, सुरक्षा भी चाहिए, समाज भी चाहिए और क्रांति भी चाहिए। इसमें क्रांति की क्वालिटी हल्की रहेगी पर चलेगा। तसलीमा तो सरलीकरण करतीं हैं। रामू चाचा मुझे कैंची से डराते थे और मुन्नू मामा रस्सी से। आप सिर्फ़ डराने को देखेंगे ? कैंची और रस्सी में फ़र्क़ ही नहीं करेंगे ?

मैं आपको दूसरे तरह की दूसरी चीज़ें भी समझाता हूं। मान लीजिए मैंने 10 साल और 20 लाख रुपए लगा कर विभिन्न धर्मों और समाजों का अध्ययन किया। इधर बाहर आकर मुझे पता लगा कि इन 10 सालों में समाज, धर्मों और समुदाओं से छुटकारा पाने के कगार पर आ खड़ा हुआ है। अब बताईए आप ? मेरी मेहनत का क्या होगा ? मेरे तो 10 साल गए पानी में ! मेरे पैसे कौन वापिस करेगा ? 10-20 साल और विषमता रहती तो कम-अज़-कम मेरी तो भरपाई हो जाती। एइ, उछलिए मत, अभी 100 साल ऐसा कुछ नहीं हो रहा। एक मामूली मिसाल दी मैंने।

बात कहने का ढंग होता है, सलीका होता है। कभी बाद में अपनी गाली को शिष्टता और दूसरे की सभ्यता को धृष्टता सिद्ध करना पड़ जाए तो ? सब पहले से सोच कर चलना पड़ता है। तसलीमा नहीं करती तो ना करे बाक़ी तो सब धर्म के करते हैं ना ! अपने धर्म पर उंगली उट्ठी नहीं कि कह दिया कि ई तो दूसरे धर्म के आक्रमणकारियों ने कर दिया वरना अपना जो है एकदम पाक-साफ़ था। औरतों की हालत और हमारे धरम में ख़राब ! अरे ऊ तो पितृसत्ता ने कर दी वरना अपुन का तो बिलकुल शुद्ध-बुद्ध था। मर्दों पर अत्याचार ! मातृसत्ता जिम्मेदार। धरम नाहीं। धरम और अपना धरम तो बस्स मीठा-मीठा गप्प। अरे जब कोई हमसे पूछता ही नाही तो हम काहे बताएं ? कोई पूछे तो कि धर्मो-मजहब के बनाने वाले को नाहीं पता था कि कोई पितृसत्ता भी हुआ करे है दुनिया में ? हमारे अलावा भी धरम हुआ करेंगे दुनिया में ? तो ईका ख़ातिर पहले ही इंतेजाम काहे नाही किया क़िताबन में ? इत्ते ही दूरदर्सी रहे का ?

देखिए मेरी भाषा क्या से क्या हो गयी तसलीमा पर लिखते-लिखते। तसलीमा पर इतना लिख दिया, बहुत है। अब आप इसे टिप्पणी समझो, व्यंग्य समझो, पत्र समझो, संपादकीय समझो, बुढ़भस समझो। समझो, समझो, मत समझो। आपका सिरदर्द है। एकदम फालतू टापिक है।

आईए थोड़ी कला पर बात करें।

धत्त तसलीमा !

 
-संजय ग्रोवर
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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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