रविवार, 29 सितंबर 2013

ग़रीबी वगैरह के मामले में अमीर कम्युनिस्ट वगैरह




फ़ेसबुक इत्यादि के स्टेटस इत्यादि से पता चलता है कि भारत का कम्युनिस्ट अकसर भूखा-प्यासा रहता है। उसकी ज़िंदगी निरंतर, निहायत दयनीय, शौचनीय वगैरह बनी रहती है। ज़ाहिर है कि भूखा-प्यासा आदमी शारीरिक रुप से तो कमज़ोर हो ही जाता है। ऐसे में गाड़ी वगैरह चलाने में भी दिक्क़त होती होगी। ताक़त तो उसमें भी लगती है ; इग्नीशन में चाबी घुमानी पड़ती है, पैर से ऐक्सीलरेटर और ब्रेक वगैरह दबाने पड़ते हैं। इसमें काफ़ी संघर्ष लगता होगा। इंटरनेट इत्यादि से ही पता चलता है कि भारत में बहुत सारे कम्युनिस्टों के पास गाड़ियां वगैरह हैं। गाड़ियों का क्या, वो तो आजकल कई आम आदमियों के पास भी चार-चार हैं, एक-दो कम्युनिस्टों के पास भी हों तो आपको क्या तक़लीफ़ है! यू तो दान इत्यादि से तथाकथित कम्युनिस्ट को नफ़रत है मगर गाड़ी, शराब और लैपटॉप की बात अलग है। इस दान से विज्ञान और तकनीक़ का समुचित प्रचार-प्रसार वगैरह होता है। ग़रीबी और विज्ञान वगैरह के चक्कर में ही कम्युनिस्ट को दो-दो, चार-चार मोबाइल वगैरह ख़रीदने पड़ जाते हैं जिससे कि वह समय-समय पर अपनी ग़रीबी के सतत संघर्ष के ऐतिहासिक फ़ोटू इंटरनेट पर इधर-उधर डालकर विज्ञान का प्रसार कर सके। भारतीय तथाकथित कम्युनिस्ट की एक ग़रीबी कई बार मैंने व्यक्तिगत रुप से नोट की है कि अमीरों को ग़ाली देने के क्षेत्र में वह काटा-झिरला-खुंबानी को बेचारा अफ़ोर्ड नहीं कर पाता हांलांकि दिल्ली-बंबई में ये और संबंद्ध अख़बारी सेठ उसके ज़्यादा नज़दीक पड़ते होंगे। मगर किसी रहस्यमय मजबूरी के तहत वह आठ-दस हज़ार में काम चलानेवाले किसी दल-वाद-समर्थन विहीन आदमी को अमीर आदमी घोषित कर देता है और उसे ग़ालियां बक-बक के साम्यवाद का विस्तार करता है।

कम्युनिस्ट या तो गांव में और झोंपड़ी में रहता है या कंगारु की तरह छलांग लगाकर सीधे दिल्ली में जाकर एंकर या संपादक हो जाता है। इससे भी काम नहीं चलता तो बंबई चला जाता है और वहां दर्दनाक़ संघर्ष करने लगता है। ऐसे में कई बार उसका रहन-सहन देखकर लोगों को ग़लतफ़हमी हो जाती है कि कहीं यह आदमी सत्ताधारी, विपक्षी या कोई सेठ वगैरह तो नहीं है। इमेज हैंडल करना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन कम्युनिस्ट वह भी कर दिखाता है। अपने संघर्ष के एक-एक क्षण के स्टिल फ़ोटोग्राफ़ और विज़ुअल उसके पास सुरक्षित रहते हैं जो उसीकी तरह ग़रीब और श्वेत-श्याम होते हैं। इस इमेज के लिए संघियों से अलग दिखना बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए वह संस्कृतनुमा हिंदी को लात मारकर संस्कृतनुमा उर्दू में प्रविष्ट हो जाता है। वह ऐसी-ऐसी ग़ज़लें सुनता है जो अपने अर्थों में भले ग़रीब हों मगर लफ्ज़ों में अमीरी से भरी रहती हैं। वह अध्यात्मिक भजन त्यागकर सूफ़ी संगीत में गोल-गोल घूमने लगता है। समाधियों के बजाय मज़ारों को पकड़ लेता है। कोई कह दे कि इन दोनों में फ़र्क़ क्या है तो वह या तो जवाब नहीं देता या उसे संघी घोषित कर देता है। ये दोनों हैं तो अदाएं हीं पर लाजवाब इसलिए हैं कि कम्युनिस्ट ख़ुदको यथार्थवादी मानता है। वह छंद को छोड़कर बहर पर लटक जाता है। ग़रीबी हटाने से ज़्यादा उसे रात-दिन यह चिंता खाए जाती है कि कोई उसे संघी न कह दे।

दस-बीस साल पहले तक अकसर लोग घर आए मेहमानों से दूध के बारे में पूछते डरते थे। दूध का मनोवैज्ञानिक असर भारतीय मानस पर कुछ ऐसा था कि लोग मेहमानों को उससे महंगी चीज़ खिला देते थे मगर घर में रात रुक गए मेहमान से दूध की बाबत इस तरह पूछते थे,‘‘भाईसाहब/बहिनजी, आप रात को दूध तो नहीं लेते ? नहीं ना। हां, वही तो मैंने सोचा, ,भाईसाहब/बहिनजी को तो मैंने दूध लेते कभी देखा नहीं।’’ इधर भाईसाहब/बहिनजी भी सोचते थे कि अगर आज मैंने इनके घर में पी लिया तो कलको ये भी तो मेरे घर आएंगे। यह कस्बों-शहरों की बात है। गांवों में भूले-भटके कोई चला जाए तो लोग दूध लेकर सवार हो जाते थे और कभी-कभी तो दवाई की तरह ज़बरदस्ती पिला देते थे। दूध शायद अमीरी का प्रतीक होगा और प्रतीकों में कथित भारतीयों की जान बसती है। कुछ-कुछ दूध जैसी खिचड़ी मानसिकता शराब को लेकर कम्युनिस्टों की है। उनकी फ़िल्मी और ग़ैरफ़िल्मी शायरी में शराब बिलकुल अध्यात्मिकता की तरह बहती है। अगर गानों से कम्युनिस्टों को जाना जाए तो लगता है कि शराब अगर कोई दूसरा पिलाए तो आदमी एकदम ख़ानदानी आवारा बन जाता है और ऊंची रुहानी शायरी करता है वरना अपने पैसे से पिए तो वह अमीरी की पंूजीवादी नालियों में सड़ता है। लगता है कम्युनिस्ट शायरों के लिए बंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री ने व्हाइट मनी वाले सेठ अलग से रखे हुए हैं। जिस फ़िल्म में कम्युनिस्ट काम करते हैं उनमें सिर्फ़ व्हाइट मनी लगाई जाती है। या फ़िर ये पैसा उन्हें मजदूरों वगैरह के चंदे से दिया जाता है।

मुझे जब शराब पीनी होती है तो मैं पांच सौ रुपए की बोतल के साथ सौ रुपए के काजू भी ख़रीद लेता हूं। एक तो मेरी प्रतीकात्मकता में कोई ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है दूसरे मुझे पता है कि सड़ी हुई नमकीन भी आजकल बीस-तीस रुपए की आती है। पैसे भी मुझे ख़ुदही खर्च करने होते हैं इसलिए मुझे अपना बजट भी मालूम रहता है। पैदल जाकर ख़ुद ही लाइन में लगकर दारु ख़रीद लेता हूं और हाथ झुलाकर घर आ जाता हूं। कम्युनिस्ट होता तो शर्म के मारे गाड़ी में जाना पड़ता और मारे शर्म के जाने से पहले भी दो पैग़ मारने पड़ते। मैं इतना अमीर हूं कि मेरे दो पैग़ दो महीने चलते हैं। इतना अय्याश हूं कि दो पैग़ में दो सौ पैग़ों की बदनामी बिना किसी संपादकत्व, एंकरत्व, आयकनत्व, महापुरुषत्व, प्रोफ़ेसरत्व के अफ़ोर्ड कर सकता हूं। जहां फ़िल्मकारों, नेताओं, पत्रकारनुमाओं और यथार्थवादी साहित्यकारों को भी शराब छुपकर पीनी पड़ती हो वहां मुझसे ज़्यादा मस्त, असली और दोटूक जिंदगी क्या हो सकती है।

क्योंकि न तो मैं कम्युनिस्ट हूं न मैंने यह लेख हिंदूवादियों को ख़ुश करने को लिखा है। मैं महज़ आदमी हूं। जिस किसीको आदमी के लिखे से छूत लगती हो वो मंतर वगैरह मारकर ख़ुदको शुद्ध कर ले। या कुछ प्रतीक वगैरह घिस ले। लेख तो अब आपने पढ़ ही लिया है।

न तो मैंने इसके लिए ज़बरदस्ती की थी न आप नशे में थे।

-संजय ग्रोवर 

29-09-2013

2 टिप्‍पणियां:

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