बुधवार, 28 अगस्त 2013

एक नई जाति



हर आदमी चाहता है, जीवन में कुछ अच्छा काम करुं। इस चक्कर में कई लोग मंदिर-मस्ज़िद जाते हैं, दान-पुन्न वगैरह करते हैं, कई तरह से कई तरीक़े करते हैं। लेकिन कई बार फ़िर भी मन नहीं भरता। रात को नींद नहीं आती, जीवन खोखला-सा लगता है। इस चक्कर में मैंने भी काफ़ी सोचा और एक आयडिया निकल आया। अपने यहां प्रतीकात्मकता का बड़ा महत्व है। प्रतीकात्मकता नाम की इस महान अवधारणा में माना गया है कि आप बाहर कुछ प्रतीक सजा-धजा लेंगे तो ये आपके भीतर पवित्रता का सूखा हुआ सोता खोल डालेंगे। जैसे आप गांधी टोपी पहन लेंगे तो आप गांधीजी की तरह हो जाएंगे। टोपी में तो फिर भी पैसे लगते हैं। मुझे जो आयडिया सूझा है, उसमें कोई ख़र्चा भी नहीं है।

आप एक काम कीजिए। आजकल तो वैसे भी भ्रष्टाचार-विरोध का सीज़न है। मैं जो आयडिया दे रहा हूं, हर मौसम और हर काल में काम आएगा। आपको कुछ भी नहीं करना अपने नाम के साथ बस ईमानदार, सज्जन, शरीफ़, मासूम जैसा कोई शब्द लगा लेना है। फ़िर देखिए, किस तरह सब बदलने लगेगा। मान लीजिए आपने अपने नाम के आगे ईमानदार को जोड़ लिया। आप तो जानते ही हैं कि यहां लोग नाम से कम और उपनाम या सरनेम से ज़्यादा बुलाते हैं।

आप किसी मित्र के घर जाएंगे, वह दरवाज़े से झांकते ही बोलेगा, ‘अरे यार ईमानदार! बड़े दिन बाद आए।’ दोस्त के दोस्त भी कहेंगे कि हां यार, ईमानदारों की तो संख्या ही इतनी कम है, रोज़ाना आ भी कैसे सकते हैं, बड़े दिन बाद ही आएंगे। इस तरह आप देखेंगे कि पहले ही दिन से आपको एक राहत मिलनी शुरु हो जाएगी।
आप जहां से भी निकलेंगे, आपको जाननेवाले यही कहेंगे-‘देखो, ईमानदार आ रहा है। वो देख, ईमानदार जा रहा है।’

देखते-देखते यह उपनाम आपके बीवी-बच्चों के साथ जुड़ जाएगा। परंपरा जो ठहरी। लोग कहेंगे, ‘देखो, सबके सब ईमानदार हैं, बीवी-बच्चे सब। पहले भाईसाहब ईमानदार हुए, थोड़े दिन बाद भाभीजी और बच्चे भी ईमानदार हो गए।’ बात टैक्नीकली बिलकुल सही है। सुननेवाला कहेगा-‘कमाल का परिवार है, यार!’ इस तरह आपका एक स्टेटस बनना शुरु हो जाएगा।

इस जादू का असर ज़रुर आपके मित्रों, परिचितों, रिश्तेदारों पर भी पड़ेगा। उन्हें भी लगेगा यार ईमानदारी तो अच्छी चीज़ है, हमें भी बनना चाहिए। इस तरह समाज में ईमानदारों की संख्या बढ़ने लगेगी। यह आपका एक सामाजिक योगदान भी होगा। नींद ज़रा और अच्छी आने लगेगी।

जैसे-जैसे समाज की दशा बदलेगी और ईमानदारों की संख्या बढ़ेगी, दुर्घटनाओं पर लोग कुछ इस तरह बात करेंगे-

‘बॉस, रात एक आदमी ने दूसरे को ठग लिया ; ठगा हुआ बेचारा बहुत रो रहा था....’
‘अच्छा, किसने ठगा ?’
‘कोई ईमानदार था, बताते हैं।’
‘ईमानदार था! हुम....फ़िर तो ठीक ही ठगा होगा ; ईमानदार किसीको ग़लत क्यों ठगेगा।’

पोलिस थाने में पूछेगी,‘कौन हो भाई?’
‘जी, मैं तो ईमानदार हूं।’
‘कबसे ईमानदार है भाई ?’
‘जनम से ही हूं जी।’
बात यह भी टैक्नीकली सही है। अगले ने जबसे होश संभाला है, हर कोई उसे ईमानदार कहकर ही पुकारता है।
‘पिताजी, के बारे में बता।'
‘ईमानदार हैं जी’
टैक्नीकली बात यह भी ठीक है। सरनेम उनका भी ईमानदार है।

इस तरह समाज में ईमानदारों की संख्या तेजी से बढ़ती जाएगी। क्योंकि इनवेस्टमेंट तो कुछ है नहीं, फ़ायदा ठीक-ठाक है।

आप किसी चैनल पर डिबेट देखते होंगे। कितना अच्छा लगेगा जब देखेंगे कि अ पार्टी से बहस में भाग ले रहे हैं श्री ईमानदार, ब पार्टी से सुश्री ईमानदार, सामाजिक कार्यकर्त्ता श्री ईमानदार, अधिवक्ता श्री ईमानदार, फ़िल्म स्टार श्री ईमानदार और साथ में है वही आपका पुराना ऐंकर ईमानदार, जिसे आप करते हैं बहुत प्यार।
ज़ाहिर है कि आपके मुंह से ख़ुदबख़ुद निकलेगा,‘भई, मीडिया में तो ईमानदारी की कोई कमी नही; फ़िर भी जो हो रहा है पता नहीं क्यों हो रहा है!’

ज़्यादा बताने से क्या फ़ायदा, आप सब परिपक्व लोग हैं। आयडिया मेरा एकदम मौलिक है। फ़िर भी कई बार ऐसा होता है कि आप अपनी तरफ़ से मौलिक काम करते हैं मगर बाद में पता चलता है कि यह काम 2-4 या सौ या हज़ार-दस हज़ार साल पहले भी कोई कर चुका है। तो अगर यह स्कीम भी पहले से कहीं चल रही हो तो बता ज़रुर दीजिएगा। मैं विदड्रा कर लूंगा।

-संजय ग्रोवर

28-08-2013

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29-08-2013 को चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

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  2. यह स्‍कीम तो बहुत पहले ही चल रही है, नयी खोजिए। बस कलयुग आते आते अन्‍तर यह आ गया कि लोग खलनायकों जैसे नाम रखने लगे। जैसे विद्रोही, अकेला, विप्‍लवी आदि आदि। ईमानदार भी शायद किसी ने रखा था लेकिन फिर उसे ईनामदार कर दिया गया। खैर चिन्‍तन करते रहिए कुछ न कुछ मार्ग तो निकल ही जाएगा।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena69.blogspot.in/

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  4. क्या बात कह दी आपने। सोचती हूं आखि़र वे कौन हैं जो ईमानदार की इमेज बना-बनाके हर कहीं कब्ज़ा जमाये बैठे हैं?

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  5. संजय ईमानदार जी अच्छा व्यंग्य है...बधाई....

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कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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