शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

हाय! पता नहीं ऐसा क्यों होता है!

व्यंग्य



मानसिक रुप से परतंत्र आदमी की मनोदशा इतनी विचित्र होती है कि कई बार वह स्वंतंत्रता और स्वतंत्र आदमी की कल्पना भी ठीक से नहीं कर पाता। किसी भी सत्ता को ग़ाली देने से पहले भी वह ठीक वैसी ही एक सत्ता तलाशता है। उसे लगता है कि दुनिया में आदमी और विचार बाद में पैदा हुआ, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, मार्क्सवाद, गांधीवाद, अंबेडकरवाद, क्रेमलिन, व्हाइट हाउस, संसद भवन, जे एन यू, पटेल चौक, आई टी ओ मार्ग आदि-आदि पहले पैदा हुए। वह सोचता है चूंकि मैं इसलिए ‘स्वतंत्र’ हूं क्योकि किसीकी गोद में बैठा हूं इसलिए दूसरा आदमी बिना मेरे जैसी तरक़ीब किए स्वतंत्र कैसे हो सकता है, वह बेचारा तो गोदविहीन है ! यह आदमी हैरान होता रहता है कि हाय सत्ता में आते ही सब एक जैसे क्यों हो जाते हैं !? यह आदमी थोड़ा ख़ुद पर नज़र डाल लिया करे तो इसे समझ में आ जाए कि इसमें हाय-बाय करने जैसा कुछ नहीं है, ऐसे लोग सत्ता में आने से पहले भी एक जैसे होते हैं। और दरअसल ऐसे लोग अकसर सत्ता में आने से पहले भी किसी न किसी छोटी-मोटी या अमूर्त्त सत्ता का पूरा लुत्फ़ ले रहे होते हैं। कहने को ये ज़िंदगी-भर सत्ता में न आएं पर दरअसल ये हमेशा किसी न किसी सत्ता में रहते है। यह शीशे की तरह साफ़ है कि जो लोग स्पष्टतः किसी विचारधारा के घोषित समर्थक होते हैं, ज़्यादातर उन्हींके हर विचारधारा में ‘बढ़िया संबंध’ और अच्छा ‘आना-जाना’ होता है। ऐसा आदमी कभी कहता है कि ‘मैं इसके-उसके साथ मंच शेयर नहीं करुंगा’ तो कभी कहता है कि ‘लोकतंत्र में बिना बात-चीत के गाड़ी कैसे चलेगी !’ यह आदमी पैसा शेयर करता है, शादी-समारोह शेयर करता है, त्यौहार शेयर करता है पर मंच शेयर नहीं करता।

लगता तो यही है कि इस आदमी को व्यक्तिगत और सार्वजनिक रुप में क्या-क्या और कैसा-कैसा होना चाहिए से ज़्यादा चिंता इस बात की होती है कि दिखना कहां कैसा चाहिए। परेशानी एक यह भी है कि सामाजिक या सार्वजनिक रुप से तो आदमी दिख भी सकता है मगर ‘व्यक्तिगत रुप से दिखने’ का तो कोई तरीक़ा अभी तक ईजाद हुआ नहीं है ! ऐसा कैसे हो जाएगा कि वही क्षण व्यक्तिगत भी रहें और वही दिख भी जाएं! ऐसे में साफ़ है कि व्यक्तिगत रुप में तो आदमी ऐसा ही ‘दिखेगा’ जैसा दिखना चाहेगा। और जैसा ख़ुद दिखना चाहे वैसा तो आजकल कोई नेता को भी नहीं दिखाता तो इस तथाकथित पवित्र साहित्यकार को क्यों दिखाए!!  ऐसा आदमी कभी तो कहता है कि ‘देखो मेरा कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है, सब कुछ लोगों के सामने है, मैं तो ख़ुली क़िताब हूं’ तो कभी कहता है कि ‘व्यक्तिगत पर बात मत करो, इससे ज़्यादा घटिया कोई बात नहीं होती’। कई तो मैं ऐसे देखता हूं कि उनका बस चले तो किसीसे पहली बार हाथ मिलाने से पहले भी उसका सारा व्यक्तिगत बायोडाटा मंगा लें। यही सबसे ज़्यादा व्यक्तिगत के खि़लाफ़ होते है और इन्हींके पास सबसे ज़्यादा औरों की व्यक्तिगत जानकारियां होतीं हैं। इन्हें व्यक्तिगत रुप से एड्स् हो चाहे कैंसर हो, वो तो ‘ईश्वर की अनुकंपा’ और इनका ‘इम्तिहान’ होता है और दूसरे को सामाजिक रुप से ज़ुकाम या कब्ज़ भी हो जाए तो वो उसकी ’सामाजिक और साहित्यिक त्रुटि’ होती है। हिंदी तथाकथित साहित्य में व्यक्तिगत का लफ़ड़ा और मज़ेदार है। यह सारा लफ़ड़ा तब खड़ा होता है जब कोई सही-सही आलोचना कर दे। वरना आप किसीकी जितनी मर्ज़ी तारीफ़ करो, झूठी ही करो, कोई नहीं कहेगा कि भाई मेरा व्यक्तिगत क्यों लिख रहे हो। तारीफ़ तो इनका बस चले तो ये दूसरों को अपने ख़र्चे से इंजेक्शन देके भी करवा लें। क्या दिलचस्प नहीं है कि सच्चे लेखन का आधार तो अपना अनुभव ही होना चाहिए। और अनुभव और उसका आकलन तो ज़्यादातर व्यक्तिगत स्तर पर ही होता है। वरना लिखते रहो कथित पवित्र हवाओं में कथित पवित्रता की कविताएं।  

मज़े की बात यह है कि यही लोग कभी एक ही आदमी की ‘अकेले पड़ जाओगे’ के महान ‘तर्क’ से हंसी भी उड़ा रहे होते हैं और फिर कभी उसी आदमी को ‘सत्ता के दलाल’ जैसे ‘तर्क’ से बदनाम करने की कोशिश में भी जुट जाते हैं। मुझे लगता है कि अब तो तोते भी जानने लगे होंगे कि ‘अकेले पड़ जाओगे’ या ‘सत्ता के दलाल’ कह देना, दोनों में से किसीको भी तर्क नहीं कहा जा सकता। मगर असली दलालों को तो सब कुछ रेडीमेड पाने की आदत होती है। उन्हें आप चाहे ‘कर्म’ के ‘फ़ील्ड’ में डाल दो चाहे ‘विचार’ के चाहे तर्क के, वे हर जगह दूसरों के बनाए माल पर मौज मारते हैं। मज़े-मज़े में एक और मज़े की बात यह भी है कि अकेले मरोगे तुम लेकिन ‘अकेले मरने’ का क्रेडिट भी वह ले जाएगा जिसके पास ख़ुदको मीडिया में ‘अकेला मरा’ घोषित करवा पाने की जुगाड़ होगी। इन अकेलों में भी कईयों के मकान स्थाई रुप से किसी सत्ता के क़रीब होते हैं तो कईयों के अस्थाई तौर पर। बच्चे भी जानने लगे हैं कि कई मकानों के लोग सत्ता के इतने क़रीब होते हैं कि वहां से बतौर विद्रोही विभिन्न मीडिया माध्यमों में आना-दिखना सबसे आसान होता है।

अपन के यहां ऐसे दूसरे रास्ते दोस्ती, जुगाड़ और चमचागिरी वगैरह रहते हैं। चमचागिरी कमरे के अंदर बैठकर अपना काम करती है तो स्वाभिमान कमरे के बाहर खड़ा पहरा देता है कि अंदर क्या देखने जा रहे हो, यहां मुझे देखकर काम क्यों नहीं चलाते ! ऐसा आदमी जिस भी पेशे या गुट या इमारत से जुड़ जाता है उसीके आस-पास तरह-तरह की नकली पवित्रताएं, शुद्धताएं और परिभाषाएं इकट्ठा करना शुरु कर देता है। मुसीबत जब हो जाती है जब वह कभी-कभार अपने ही पेशे, ख़ानदान, इमारत, मकान, दुकान वगैरह के किसी आदमी से किसी वजह से नाराज़ हो जाता है। अब तक वह इतना ज्यादा इस पवित्रता की घोषणा कर चुका होता है कि अब उसी मुंह  से उस पवित्रता के खि़लाफ़ तर्क जुटाना भारी पड़ जाता है (मैं यहां मुंह की जगह थूथन भी लिख सकता हूं मगर मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई व्यंग्य या तर्क है।) ऐसे में किसी दोस्त विचारधारा से कुछ दिन के लिए उसका मुंह मांगना पड़ता है, भारी-भरकम, अटपटी पवित्रता से लिथड़ी रचनाओं से वक्त काटना पड़ता है। कई बार तो उसी अध्यात्मिक प्रभामंडल को विस्तार देना पड़ जाता है जिसके विरोध में पर्सनैलिटी निखरी होती है। ऐसा आदमी तब तक क्रांतिकारी रहता है जब तक उसे भरपूर प्रतिष्ठा और झोली-भर पुरस्कार न मिल जाएं। यह आदमी हीन-भावना से इस कदर ग्रस्त होता है कि रात-दिन जिस सत्ता को ग़ालियां देता है, जब तक उसीसे पुरस्कार, वजीफ़े वगैरह न पाले तब तक अपनी नज़रों में ही संदिग्ध बना रहता है। ठीक ये सब मिलते ही वह अपनी मुरझाई हुई डंडी को अपनी जगह लाने के लिए नक़ली दुश्मन तलाशने और नकली लड़ाईयां लड़ने निकल पड़ता है।

ऐसा आदमी अपने यहां, कहां नहीं होता !

-संजय ग्रोवर

02-08-2013

(कोई एक व्यक्ति इस व्यंग्य को अपने ऊपर लिखा समझकर ख़ामख़़्वाह ख़ुशफ़हमियां न पाले, यह कई व्यक्तियों पर लिखा गया है। और सब जानते हैं कि कई व्यक्तियों पर लिखते ही बात सामाजिक हो जाती है।)



4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति को शुभारंभ : हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियाँ ( 1 अगस्त से 5 अगस्त, 2013 तक) में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

    उत्तर देंहटाएं
  2. संजय भाई...कमाल का लिखा है...सटीक और धारधार...

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपके ब्लॉग को ब्लॉग एग्रीगेटर "ब्लॉग - चिठ्ठा" में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

पुराने पोस्ट पढने के लिए इस पोस्ट के नीचे दाएं ‘पुराने पोस्ट’ पर क्लिक करें-

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अनुसरण (1) अफवाहें (1) असमंजस (2) अस्पताल (1) अहिंसा (2) आंदोलन (4) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (3) आत्मविश्वास (2) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (1) इतिहास (1) इमेज (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (1) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचाई (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (1) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (3) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कम्युनिज़्म (1) कविता (57) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (3) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) खीज (1) खेल (1) गज़ल (4) ग़जल (1) ग़ज़ल (26) गाना (2) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (2) ग़ुलामी (1) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (3) चलती-फिरती लाशें (1) चालू (1) चिंतन (1) चिंता (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) जागरण (1) जाति (1) जातिवाद (2) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) टॉफ़ी (1) डर (3) डायरी (3) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज़ (10) तन्हाई (1) तर्क (2) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (2) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दयनीय (1) दर्शक (1) दलित (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (1) देह और नैतिकता (6) दोबारा (1) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (3) दोहरे मानदण्ड (14) दोहा (1) दोहे (1) धर्म (1) धर्मग्रंथ (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धारणा (1) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़्म (4) नज़्मनुमा (1) नज़्मनुमां (1) नफरत की राजनीति (1) नया (2) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (1) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (2) निष्पक्षता (1) पक्ष (1) परंपरा (3) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (7) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुरस्कार (2) पैंतरेबाज़ी (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फ़क्कड़ी (1) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बजरंगी (1) बड़ा (1) बदमाशी (1) बदलाव (4) बहस (15) बहुरुपिए (1) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (1) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (1) भगवान (2) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भीड़ (1) भ्रष्टाचार (7) मंज़िल (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (6) मर्दानगी (1) महात्मा गांधी (3) महानता (1) मां (1) माता (1) मानवता (1) मान्यता (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (2) मौक़ापरस्ती (1) मौलिकता (1) युवा (1) योग्यता (1) रंगबदलू (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रहस्य (2) राज़ (1) राजनीति (4) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रिश्ता और राजनीति (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) रोज़गार (1) लघु कथा (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (7) लघुव्यंग्य (2) लालच (1) लोग क्या कहेंगे (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (80) व्यंग्य कथा (1) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) शब्द और शोषण (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (45) शायरी ग़ज़ल (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संदिग्ध (1) संस्मरण (3) सकारात्मकता (1) सच (1) सड़क (1) सपना (1) सफ़र (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (39) सर्वे (1) सवाल (3) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साभार (3) साहित्य (1) साहित्य की दुर्दशा (5) साहित्य में आतंकवाद (17) स्त्री-विमर्श के आस-पास (19) स्लट वॉक (1) हमारे डॉक्टर (1) हल (1) हास्य (2) हास्यास्पद (1) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (1) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) animal (1) atheism (1) audience (1) awards (1) Blackmail (1) chameleon (1) character (1) communism (1) cow (1) cricket (1) cunning (1) devotee (1) dishonest (1) Doha (1) dreams (1) employment (1) experiment (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless god (1) friends (1) funny (1) funny relationship (1) ghazal (12) god (1) gods of atheists (1) greatness (1) hindi literature (3) Hindi Satire (8) history (1) humanity (1) Humour (3) hypocrisy (3) hypocritical (2) innovation (1) IPL (1) life (1) literature (1) logic (1) Loneliness (1) lyrics (3) mob (1) movements (1) music (2) name (1) one-way relationships (1) opportunist (1) opportunistic (1) oppressed (1) paper (1) parrots (1) pathetic (1) pawns (1) plagiarism (1) poem (1) poetry (19) pressure (1) prestige (1) puppets (1) radicalism (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) royalty (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (1) satire (22) secret (1) senseless (1) short story (4) slavery (1) song (2) sponsored (1) spoon (1) stature (1) The father (1) The gurus of world (1) tradition (1) trash (1) travel (1) ultra-calculative (1) values (1) verse (3) vicious (1) woman (1) world cup (1)

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....