रविवार, 11 अप्रैल 2010

बिना जुगाड़ के छपना


कस्बे में यह खबर अफवाह की तरह फैल गई कि एक नवोदित लेखक एक राष्ट्रीय अखबार में बिना किसी जुगाड़ के छप गया। सभी हैरान थे कि आखिर यह हुआ कैसे। तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं। कोई कहता कि यह चमत्कारों का युग है, इसमें कुछ भी हो सकता है, तो किसी का मानना था कि संयोगवश इस नवोढ़े कस्बाई लेखक और उस छपित राष्ट्रीय लेखक के नाम मिलते-जुलते से है। असल में दोनों अलग-अलग व्यक्ति है। बहुत सारे लोगों का अनुमान यह भी था कि यह सब खुद इसी लेखक की स्टंटबाजी है और यह अपनी ‘इमेज‘ बनाने के लिए झूठ बोल रहा है। वो दिन हवा हुए जब भारत सोने की चिड़िया था और लेखक बिना जुगाड़ के छपा करते थे। खैर! बंद कस्बे की ऊंघती सड़कों पर यह खबर खुले सांड की तरह दौड़ने लगी और अनुमानों के कुत्ते-बिल्ली, गलियों-गलियों होते हुए घरों कें खिड़की-दरवाज़ों और यहां तक कि रसोइयों-पाखानों तक में जा घुसे। पत्रकार-नगर के साहित्य मोहल्ले में तो दिन में ही रात्रि-जागरण जैसा मौसम बन चुका था। वरिष्ठ कवि ददुआ शहरी जी के यहां एक आपात्कालीन गोष्ठी चालू हो चुकी थी। अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए ददुआ शहरी जी की आंखें भर आई। रूआंसे स्वर में वे बोले, ‘एक वो भी समय था जब साप्ताहिक ‘जुगनू का बच्चा’ में छपने के लिए मै सारी-सारी रात संपादक जी के पैर दबाया करता था। दैनिक ‘पैसे का दुश्मन‘ को तो मैंने दस-दस रूपए वाले पांच सौ विज्ञापन ला कर दिए। तब कहीं जाकर उन्होंने मेरी एक रचना छापी। एक यह कल का छोकरा है, जो बिना कोई संघर्ष किए, बिना पैर दबाए, बिना जुगाड़ किए ही राष्ट्रीय अखबार में छपने लगा। अगर ऐसा ही होने लगा तो हम संघर्ष करने वाले लेखकों का क्या होगा, जिन्होंने जुगाड़ लगाने में संघर्ष करते-करते अपनी सारी उम्र गुज़ार दी ... ...।‘‘ कहते-कहते उनका गला रूंध गया। पीड़ा के अतिरेक से उनका चेहरा जो पहले ही खूब लाल था, और लाल हो गया। अपना वक्तव्य यहीं पर समाप्त करके वे नीचे बिछी दरी पर जा बिछे।
उनके गिरने से ठीक पहले श्री अजीबो-गरीब ‘प्रौढ़‘ उठकर खड़े हो चुके थे। और एक बार खड़े हो जाने का मतलब था, अपना भाषण समाप्त करके ही बैठना। ‘प्रौढ़‘ जी अपेक्षाकृत सधे हुए स्वर में बोले, ‘‘संघर्ष की रवायत के ये कीमती हीरे जो हमारे बुजर्गों ने बड़ी हिफाज़त और नफासत से हमे सौंपे थे, क्या हम उन्हें यूं ही बिखर जाने देंगे। क्या एकाध मामूली और ग़ैर ज़िम्मेदार नया लेखक हमारी इस समृद्ध परम्परा को तोड़ डालेगा। नहीं! हम ऐसा नहीं होने देंगे। हम एक प्रतिनिधिमंडल लेकर उस राष्ट्रीय अखबार के संपादक के पास जाएंगे और सामूहिक व सार्वजनिक रूप से उसकी सेवा करके बताएंगे कि एक लेखक और एक संपादक के रिश्ते में संघर्ष का क्या महत्व है। किस तरह से और किस तरह का संघर्ष एक साहित्यकार के जीवन को उपलब्धियों से भर देता है।‘‘ इतना कहकर उन्होंने अपनी बात के अनुमोदन की आशा में बाकियों की तरफ देखा तो पाया कि बाकी सब पहले से ही उनको निहार रहे हैं। इस प्रकार कुछ-कुछ खुश, कुछ-कुछ उत्तेजित ‘प्रौढ़‘ जी कुछ इस अंदाज में नीचे बैठ गए कि कहना मुश्किल था कि वे ढह गए हैं या बह गए है।
‘प्रौढ़‘ जी से पहले और बाद में भिन्न-भिन्न प्रकार के कई भाषण हुए मगर जो आखिरी भाषण हुआ वह युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले श्री हमजवान ‘मैं‘ जी का था। हमजवान ‘मैं‘ जी काफी तैश में दिख रहे था। बोले,‘‘काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। मेरे पिता अक्सर कहते थे कि साहित्यकार को तो चिकनी मिट्टी का बना होना चाहिए, जिस पर अच्छी-बुरी परिस्थितियों का पानी ठहर ही न सके और वह अपनी चमक भी बरकरार रख सके। मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि हम हमेशा की तरह इस संकट से भी उबर आएंगे और संघर्ष की अपनी पुरानी परम्परा को साफ बचा ले जाएंगे। मेरा दावा है और वायदा है कि जब तक हमारे युूवा लेखकों के कंधों में दम है, हमारी इस संघर्षपूर्ण साहित्यिक यात्रा को कोई नहीं रोक सकता ... ...।‘‘ अभी वे शायद और भी कुछ कहते, मगर जब उन्होंने पचास से ऊपर के चार युवा साहित्यकारों को अपनी ‘कंधों‘ और ‘यात्रा‘ वाली बात का समर्थन करते देखा तो भावावेश में भाले की तरह अपनी ही धरती में जा धंसे।
इस सब और चाय-समोसों के मामूली अवरोध के उपरांत वातावरण को हल्का-फुल्का बनाने के लिए एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें तेरह कवि और बारह श्रोता थे। गणित इस प्रकार था कि जब एक पढ़ता तो बाकी बारह श्रोता बन जाते थे। इन बारह श्रोताओं में से दस स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अखबारों के संवाददातां थे, जिन्हें काफी संघर्ष करके कलके अखबारों में इस गोष्ठी की लगभग तीन, चार या पांच कालम की खबर छपवानी थी। इस संघर्ष के लिए उन्हें साहस मिलता रहे, इसके लिए वे बीच-बीच में समोसों का सहारा ले लेते थे।
समोसा-भोजन और गोष्ठी-समापन अपने ‘क्लाइमैक्स‘ पर थे कि तभी वे एक खलनायक की तरह वहां से गुजरे। वे जिनके कारण यह सारा आयोजन किया गया था। यानी कि बिना जुगाड़ के छपने वाले लेखक महोदय। गोष्ठी में मौजूद तेरहों साहित्यकारों ने स्वाभावानुसार उन्हें घृणा से घूरा और परम्परानुसार प्रेम से अपने पास बिठाया। फिर कुछ शर्माते हुए, कुछ हिचकिचाते हुए, कुछ लड़खड़ाते हुए उनके बीच एक पुल सा बना और आखिरकार तेरह-मंडली ने झिझकते हुए पूछ ही डाला कि बिना जुगाड़ के छपने के इस हैरतअंगेज कारनामे को उन्होंने कैसे अंजाम दिया। इस पर उन्होंने मुस्कराते हुए बताया कि यह बहुत ही आसान है। आप अपनी रचना साफ कागज के एक तरफ हाशिया छोड़कर लिखें या टाइप करवाएं और फिर उसे अपना पता लिखे टिकट लगे लिफाफे के साथ अखबार के संपादक को भेज दें।
एल्लो! खोदा पहाड़ निकली चुहिया। तेरह-मंडली ने अपना माथा पीटा कि उन्होंने चम्मच खाली होने का चमत्कार तो देखा मगर नाली से निकलते दूध को क्यों नहीं देखा। फिर भी तेरह मंडली यह राज़ जानकर फूली नहीं समाई। दुश्मन से दोस्त बन चुके लेखक को उन्होंने कई धन्यवाद दिए और दो समोसे भी ज़बरदस्ती खिलाए। तदुपरांत वे सब योजना बनाने में व्यस्त हो गए कि क्या जुगाड़ लगाई जाए जिससे कि रचना बिना जुगाड़ के ही छप जाए।

इधर बिना जुगाड़ छपने वाला लेखक एक बार फिर अकेला रह गया।

-संजय ग्रोवर

(18 अक्तूबर, 1996 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)

35 टिप्‍पणियां:

  1. आप अपनी रचना साफ कागज के एक तरफ हाशिया छोड़कर लिखें या टाइप करवाएं और फिर उसे अपना पता लिखे टिकट लगे लिफाफे के साथ अखबार के संपादक को भेज दें

    -भेज कर देखते हैं वरना फिर उन तेरह के साथ शामिल हो जायेंगे.

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  2. भाईसाहब, पंजाब केसरी में किस जुगाड़ के तहत छपे थे आप. :)

    आपकी उत्कृष्ट लेखनी द्वारा एक और बहुत बढ़िया लेख. पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. अनेक शुभकामनाएं.

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  3. ''इस पर उन्होंने मुस्कराते हुए बताया कि यह बहुत ही आसान है। आप अपनी रचना साफ कागज के एक तरफ हाशिया छोड़कर लिखें या टाइप करवाएं और फिर उसे अपना पता लिखे टिकट लगे लिफाफे के साथ अखबार के संपादक को भेज दें।''

    इसके अलावा किसी और तरह से छपने वाला बस कलमघसीट है…लेखक नहीं।

    एक और अच्छा व्यंग्य

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  4. भाई साहब,


    ये जुगाड तो हमने भी अपना कर देख लिया पर लोग तो हमें छापते ही नहीं। अब कोई दूसरा जुगाड बताओ भाई।

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. हा हा हा वाह क्या मारा है पापड वाले को ..पंजाब केसरी को हम ट्राई करते हैं संजय जी
    अजय कुमार झा

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  7. हम्म, चलिये आपके व्यंग्य के द्वारा यह जानकारी तो प्राप्त हो गई कि बिना जुगाड़ के कैसे छपा जा सकता है. मुझे तो छपने की आरज़ू है नहीं, अलबत्ता अपने छपने के शौकीन कुछ दोस्तों को ये तरीका ज़रूर बता दूँगी.
    आप ने अपने व्यंग्य में हर बार की तरह ही इस बार भी कुछ लोगों की जमकर खबर ली है.

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  8. " dil khush ho gaya ...waki me aapne bahut hi kamal ka lekhan bhari post likhhi hai .."

    " badhai du ya fir ...chalo de hi dete hai "

    ----- eksacchai { AAWAZ }

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  9. सच्ची में घोर कलयुग आ गया है जी.. घोर कलयुग..

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  10. बहुत बढ़िया व्यंग्य है ।
    यह सच है कि बिना जुगाड़ छपने वाला लेखक अकेला रह जाता है । लेकिन वही सही लेखक होता है ।

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  11. हा हा, आप सही चोट करते हैं....

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  12. बेहतरीन, बिना सांस लिये पढ़ गई मैं तो। जुगाड़ पर तो देश टिका है भई।

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  13. वाह बहुत बढ़िया लगा! मज़ेदार! बेहतरीन प्रस्तुती!

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  14. छपने का जुगाड़ अच्छा है ...लेकिन आज कल तो मुझे लगता है की साहित्यक पत्रिकावों में छापी कहानियां हों या मोटे मोटे हिंदी नॉवेल,इनको कितने लोग पढ़ते हैं...सवाल यही है ..मैं देखता हूँ बहुत सारी मगज़ीन हैं लेकिन छपने वाले कमेंट्स करने वाले एक ही लोग होते हैं.एक ही नाम घूम फिर के देखते हैं हम ..क्या आज का साहित्य केवल साहित्य बिरादरी के ही लिए लिखा जाता है क्या...ये बिरादरी महज कुछ हजार या लाख के ही करीब होगी..आम पाठक के लिए लिखी जाने वाली कहानियों को कितने पढ़ते आम पाठक हैं.kitne hajar chapti hain ye patrikayen..इन पत्रिकावों से बेहतर तो आज कल के ब्लॉग हैं जिन्हें कोई भी पढता है..आसानी से और समझता भी है...जहान जुगाड़ की नहीं बस थोड़े से समय की दरकार होती है आप अपने खुद के संपादक और लेखक होते हैं....ab mujhe nahi lagta agar aam pathak ke liye likhna hai to jugad ki jarurat hai...

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  15. shi hai janab...
    humne to patrakarita me aate hi ye baat janli ki chapne ke liye jugad chahiye hi...
    baki अविनाश ji badhai ho.......

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  16. दैनिक धनसत्ता जल्द ही क्लासिफ़ाइड रचनाये छापने की योजना लाने पर विचार कर रहा है !

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  17. मजा आ गया,आजकल हमको भी जुगाड ढूंढना पड़ता है,कभी हम खुद ही जुगाड कर देते थे कुछ लोगों के लिये।

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  18. @Udan Tashtari,
    प्रदीप कांत,
    अजय कुमार झा
    mukti

    आप अपनी रचना साफ कागज के एक तरफ हाशिया छोड़कर लिखें या टाइप करवाएं और फिर उसे "अपना पता लिखे टिकट लगे लिफाफे के साथ" अखबार के संपादक को भेज दें

    Gaur kareN :

    "अपना पता लिखे टिकट लगे लिफाफे के साथ"

    Baad me mat kahna ki bataaya nahiN tha !

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  19. बहुते हिलारियस था जी, और बहुत मारक। एकदम हकीकत बयान करती आपकी रचना बहुत अच्छी लगी।

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  20. जुगाड़ सुन कर ही रूह काँप जाती है सर ...इसका मूलभूत कारण ये है कि "अपना कोई जुगाड़ नहीं"... बेहतरीन व्यंग्यात्मक आलेख के लिए आभार ...

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  21. हा हा हा हा....लाजवाब व्यंग्य...
    आनंद आ गया पढ़कर...
    आभार..

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  22. बहुत बढ़िया! जुगाड़ के इस काल में जुगत का भी अपना महत्व है। जुगाड़िये नें भी जुगत लगाई थी ये तो किसी जुगाड़िए नें जाना नहीं, बस नए जुगाड़ की तलाश में जुगत लगानें लग गए...वाह!

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  23. जब दिमाग से ज्यादा अधिकार दिल का हो तो कलम इसी अन्दाज से चलती है मियाँ दिल का काम दिल को और दिमाग का काम दिमाग को करने देना चाहिए !
    पर आज लिखने वाले कलम के साथ भी बलात्कार कर रहे है उसे भी अपनी मर्जी से नही चलने देते , खैर अपकी तो तारिफ करना मेरी मजबुरी है , क्यो कि
    अपकी कलम कि जवानी कि तारिफ करना जरुरि है

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  24. हमने तो सारे जुगाड़ करके देख लिए ...कुछ नही हुआ । !!!!!

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