मंगलवार, 31 मार्च 2015

बचकाने बच्चे और पुरस्कार की टॉफ़ियां

पुरस्कार टॉफ़ियों की तरह होते हैं, देनेवाले अंकल की तरह होते हैं, लेनेवाले बच्चों की तरह। बल्कि बचकाने।


अंततः तसल्ली यही बचती है कि हमने कौन-से वाले अंकल से टॉफ़ी ली, तथाकथित अच्छे अंकल से या तथाकथित बुरे अंकल से। ज़्यादा लालची बच्चे यह सावधानी भी नहीं रख पाते, कई बार वे झोंक में आकर उन अंकलों से भी टॉफ़ी ले लेते हैं जिन्हें वे सार्वजनिक रुप से बुरा घोषित कर चुके होते हैं। ऐसे बच्चे एक-दूसरे का लालच छुपा लेते हैं। इनके लिए यह विषय व्यंग्य का नहीं होता।

जो भी अंकल टॉफ़ी देते हैं वे थोड़ा सिर पर हाथ फिराते हैं, बाल सहलाते हैं, गोद में उठाते हैं, कई बार कुछ काम भी बता देते हैं करने को।

जो बचकाने बच्चे टॉफ़ी के पीछे पगलाए रहते हैं, उन्हें इसकी या उसकी में से एक गोद चुननी होती है।

उनकी सारी लड़ाई ‘तेरेवाले अंकल अ़च्छे या मेरेवाले अंकल अच्छे’ की होती है। गोद में बैठने का शौक़ दोनों को बराबर होता है।

कभी-कभी कोई बच्चा ऐसा आ जाता है जो कहता है कि मुझे किसी भी अंकल से टॉफ़ी नहीं लेनी तो दोनों तरह के बच्चे हैरान और परेशान हो जाते हैं। पहले ये पूरी कोशिश करते हैं कि उसको भी किसी न किसी अंकल से टॉफ़ी दिला दें। अगर वह नहीं लेता तो ये कोशिश करते हैं कि किसी भी तरह यह प्रचारित कर दें कि वह भी टॉफ़ी लेता है। या कि उसे टॉफ़ी नहीं मिली इसलिए वह टॉफ़ी के खि़लाफ़ है।

समझनेवाले समाज की हालत देखकर ही समझ जाते हैं कि टॉफ़ियां भले बदल जाएं मगर बचकाने बच्चे और उनके अंकल लोग ज़रा नहीं बदलते।

किसीने ठीक ही कहा है कि आत्मविश्वास से हीन और अपनी ही नज़र में संदिग्ध लोग पुरस्कार लेकर ख़ुदको ख़ुदके लिए विश्वसनीय बनाने की कोशिश करते हैं।

किसीने क्या मैंने ही कहा है।


-संजय ग्रोवर

31-03-2015



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