शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

भगवान, भ्रष्टाचार और चमत्कार

व्यंग्य

पता नहीं भगवान, भ्रष्टाचार और चमत्कार का क्या रिश्ता है पर पिछले कुछ सालों से इन तीनों का नाम कई बार एक साथ सुनने में आया है। आप भी सुनना चाहते हैं तो यह वार्त्तालाप सुनिए-

‘देखिए, मैं ज़रुर भ्रष्टाचार दूर कर दूंगा, यह अच्छा मौक़ा है, भगवान भी अब यही चाहता है, लगता है कि उसीने मुझे इसके लिए चुना है, ज़रुर कोई चमत्कार होने वाला है।’

‘यह तो बहुत अच्छी बात है, सभी परेशान हैं, लेकिन मुझे एक बात समझ में नहीं आई।’ भगवान क्या आपके बड़े होने का इंतज़ार कर रहा था ?’

‘यह क्या बात हुई ?’

‘मतलब इतने सालों से अपने यहां भ्रष्टाचार भगवान की इच्छा से था ? भगवान क्या भ्रष्टाचार दूर करने के लिए आप पर डिपेंड करता है? वह ख़ुद भी तो दूर कर सकता था। या किसी और को चुन सकता था ?‘

‘यह भी कोई प्रश्न है ?’

‘नहीं, मतलब इतने सालों से भगवान को भ्रष्टाचार बुरा नहीं लग रहा था, आपके बड़े होते ही बुरा लगने लगा ? लगता है भगवान आपसे डरता है !’

‘हा हा हा, आप भी क्या बात कर रहे हैं, हम तो बहुत साधारण आदमी हैं।’

‘आपकी इसी विनम्रता का मैं क़ायल हूं, आप बुरा न मानें तो कृपया बताएं कि इतने सालों से भगवान भ्रष्टाचार के साथ मज़े से रह रहा था तो एकाएक उसे हुआ क्या ? कहीं आपने तो उसे भ्रष्टाचार दूर करने के लिए नहीं राज़ी किया !?’

‘क्या यार.....आप भी कमाल करते हैं....’

‘नहीं नहीं, अब तो आपको बताना ही पड़ेगा कि आपकी टीम ने भगवान को कैसे तैयार किया ? प्लीज़ अपनी टीम से बात करवाएं, लोग आपकी स्ट्रेटजी जानना चाहेंगे, लीजिए माइक लीजिए, सब आप ही के तो हैं.....’

‘नहीं नहीं, सब जनता के हैं, देखिए अभी टीम के सदस्य थके हुए हैं, एक-दो की तबीयत भी ख़राब है....’

‘ओह! तो भगवान उनकी तबियत कब तक ठीक करेगा ? क्या भगवान की तबियत आप पता करेंगे कि कब उसकी तबियत आएगी और वह उनकी तबियत ठीक करेगा ?’

‘हा हा हा, आप भी ना......, चलिए दूसरे लोगों को भी टाइम दे रक्खा है....’

‘चलिए, नमस्कार, भगवान को भी मेरी नमस्ते दीजिएगा।’

‘हा हा हा।‘

-संजय ग्रोवर 
14-02-2015


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