सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

ख़ज़ाने हमको यां इतने मिलेंगे.....






ख़ज़ाने हमको यां इतने मिलेंगे
सुबह से शाम तक हंसते रहेंगे

नया कह-कहके देते हो पुराना
हम अपने-आप ही अब ढूंढ लेंगे

डराने से ख़ुशी मिलती है तुमको !
डराओ हमको, हम हंसने लगेंगे

बदलती जाएगी ये सारी दुनिया
और हम बस पैंतरे बदला करेंगे

वो ख़ुद ही सीढ़ियां हैं, ख़ुद ही मंज़िल
वो अपने सर की चोटी पर चढ़ेंगे


-संजय ग्रोवर

17/21-10-2013

 

1 टिप्पणी:

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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