Monday, July 13, 2009

ग़ज़ल,काफ़िया,माफ़िया.....


ग़ज़ल

अपनी तरह का जब भी उन्हें माफ़िया मिला
बोले उछलके देखो कैसा काफ़िया मिला

फ़िर नस्ल-वर्ण-दल्ले हैं इंसान पे काबिज़
यूँ जंगली शहर में मुझे हाशिया मिला

मुझ तक कब उनके शहर में आती थी ढंग से डाक
यां ख़बर तक न मिल सकी, वां डाकिया मिला

जब मेरे जामे-मय में मिलाया सभी ने ज़ह्र
तो तू भी पीछे क्यों रहे, आ साक़िया, मिला

मुझको जहाँ पे सच दिखा, हिम्मत दिखी, ग़ज़ब-
उनको वहीं पे फ़ोबिया.....सिज़ोफ्रीनिया मिला

-संजय ग्रोवर

6 टिप्पणियाँ:

ओम आर्य said...

behatarin ..............atisundar

Udan Tashtari said...

सही काफ़िया मिलाया है जनाब!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अच्छा गढ़ा है।
सुन्दर है।
बधाई।

डॉ .अनुराग said...

सुभानाल्लाह...काफिया भी खूब है ओर माफिया भी....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

:-)

raj said...

मुझ तक कब उनके शहर में आती थी ढंग से डाक
यां ख़बर तक न मिल सकी, वां डाकिया मिला.....boht khobsurat...

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