
मित्रों,देख रहा हूँ कि एक दुनिया है जो नेट के अंदर है और वहाँ ब्लाॅग की अद्भुत विधा विकसित हो चुकी है( हांलांकि आजकल इसके अंत की घोषणाओं की शुरुआत हो चुकी है ) जहाँ हमारे ढंग से या मिलते-जुलते ढंग से सोचने वाले कई एक लोग मौजूद हैं। अगर हम नेट से बाहर की दुनिया देखें जहाँ ‘साहित्यिकों’ में भी उदारतापूर्ण ढंग से सोचने वाले ढूंढने पड़ते हों ( इसकी एक वजह हमारी अपनी कई तरह की सीमाएं भी होती हैं,तकनीकी समेत), वहाँ ब्लाॅग एक बहुत बड़ी राहत है, रोशनी है, सहारा है। यहाँ अनुराग अन्वेषी के ब्लाॅग पर ‘ईश्वर पर एक जिरह’ संभव है। यहाँ आकांक्षा की कविता पर सीधे-सीधे, ‘अनएडीटेड’ कमेंट संभव है। इसके अलावा, हिन्दी ब्लाॅग की दुनिया में हमारे मित्रों ने तकनीक से संबंधित बहुत ही महत्वपूर्ण व श्रमसाध्य काम तो किए ही हैं, उन्हें निस्वार्थ भाव से दूसरों के साथ साझा भी कर रहे हैं। जिन मित्रों से सहयोग, सलाहें, समाधान, सुझाव, प्रेम, प्रेरणा, प्रोत्साहन और अपने चिट्ठों पर आने के आमंत्रण मिल रहे हैं उनमें अनुराग अन्वेषी जी सहित श्यामल सुमन, कविता वाचक्न्वी, सारथी, प्रदीप मानोरिया, संगीता पुरी, शास्त्री, भूतनाथ, अमित सागर, अभिषेक, रचना गौड़ ‘भारती’ और नारद मुनि शामिल हैं। मैं सभी चिट्ठों पर जाने की कोशिश कर रहा हूँ। मित्रों, 15-11-2008 के आस-पास यह चिट्ठा और इसके लिए उखाड़-पछाड़/तांक-झांक शुरु की थी। तब से लेकर अब तक जानकारियों में कुछ इज़ाफ़ा तो हुआ है। जिसके चलते चिट्ठे की पहली पोस्ट के उस हिस्से को हटाकर जो कि रोमनी हिन्दी में लिखा गया था, इन्हीं पंक्तियों को लगा रहा हूँ। हाँ, कैलियोस्कैनी में लिखा गया हिस्सा यथावत रहेगा, ताकि सनद रहे।अगली पोस्ट में आकांक्षा और अन्वेषी जी की ‘ईश्वर पर एक जिरह’ को आगे बढ़ाने की कोशिश करुंगा।
आपने कहा ...हांलांकि आजकल इसके अंत की घोषणाओं की शुरुआत हो चुकी है....
जवाब देंहटाएंकहां हुई है ऐसी घोषणाएं।
देखिए रविवार, 23-11-2008 का संडे नई दुनिया और रविवारी जनसत्ता का चिट्टा-चर्चा
जवाब देंहटाएंरोमन से हिंदी में आने में मुझे भी अज्ञानता की वज़ह से साल लग गया था। अपने ढाई साल के हिंदी ब्लागिंग के अनुभव से कह सकता हूँ कि यहाँ आपको अपनी जैसी सोच ,रुचियों के लोग मिलते जाएँगे जो सतत लेखन के लिए प्रेरणा का जरिया बनें।
जवाब देंहटाएंइस यात्रा पर आगे बढ़ते जाने के लिए शुभकामनाएँ !