No east or west,mumbaikar or bihaari, hindu/muslim/sikh/christian /dalit/brahmin… for me.. what I believe in logic, rationality and humanity...own whatever the good, the logical, the rational and the human here and leave the rest.
गुरुवार, 24 जून 2010
टीवी से पहले, टीवी के बाद
सारे के सारे बादल चाँद के पीछे जा छुपे थे। हर सितारा सूरज की तरह चमकता मालूम होता था। सुबह का सूरज आँखों को शीतलता प्रदान कर रहा था। लू के थपेड़े ऐसे लगते थे जैसे माँ बचपन में सुलाते वक्त लोरी गाते हुए थपकियाँ दिया करती थी। गली की लड़कियां जो मुझे दूर से आते देखकर प्रत्यक्षतः पिछली दीवार पर लगे राजेश खन्ना के फटे-पुराने फिल्मी पोस्टर को देखने को वरीयता देती थी आज मुझे नमकीन निगाहों से निहार रही थीं। मेरे पड़ोसी का पालतू कुत्ता जो प्रति पदचाप पाँच गुर्राहट की दर से मेरा मुकाबला करता था आज मेरी गन्ध मात्र पर ऐसे पूंछ हिला रहा था जैसे ऐतिहासिक फिल्मों के दृश्यों में राजा महाराजाओं के सिरहाने खड़ी दासियाँ पंखे झुलाया करती थीं।
यह एकाएक सबको क्या हो गया था?
दरअसल मैं कल रात पहली बार टीवी पर आया था।
कविताएं तो मैंने पहले भी बहुत कहीं थी। साहित्य सृजन तो मैंने हमेशा ही इसी तरह किया था। और कल रात टीवी पर जो रचनाएं मैंने पढ़ीं उन्हें कल से पहले लोगों तक पहुंचाने के लिये मुझ इतनी ही मेहनत करनी पड़ती थी जितनी एक फिक्रमंद बाप को अपने बीमार बच्चे के हाथ-पैर पकड़ कर, नाक बन्द करके कड़वी दवा पिलाने में करनी पड़ती है। लेकिन आज लोगों की बदली हुई (पोज़ीटिव) निगाहें देखकर ही अंदाजा हो गया था कि रचनाओं का रसास्वादन उन्होंने कैसे किया था। लगता था जैसे सभी रात को रसगुल्ला खाकर सोए हों।
फिर भी लोगों के मूड में एकाएक आया यह परिवर्तन बेहद रहस्यमयी था। यह कमाल मेरी रचनाओं का था या दूरदर्शन की साख का। हालांकि दोनों ही अपने-अपने रूपों में बिल्कुल पहले जैसे थे। न मैंने अपनी रचनाओं में कोई परिवर्तन किया था न दूरदर्शन ने अपनी दृष्टि में। फिर इन दोनों के विलय से ऐसा चमत्कारी रासायनिक परिवर्तन कैसे हो गया था। इस महत्वपूर्ण रासायनिक फार्मूले को मैं शीघ्रातिशीघ्र समझकर सुरक्षित रख लेना चाहता था।
फिर मैंने एक-एक कर इन सभी घटनाओं पर दोबारा दृष्टि डालना शुरू किया जो मेरे टीवी स्क्रीन की छत तक पहुँचने के दौराने-सफर बीच सीढ़ियों में घटी थी। मेरी स्मृति के पर्दे पर सारे दृश्य टीवी के बिना सेंसर किए गए विज्ञापनों की तरह तेजी से तैरने लगे। जैसे मंचीय मुद्राएं सीखते समय मुझे किन मुश्किलात और कैसी मानसिक जद्दोज़हद से गुजरना पड़ा था। कितनी उम्र गुज़र जाने पर मेरी समझ में आ सका था कि साहित्यकार होने के साथ-साथ साहित्यकार दिखना भी जरूरी है। तब कैसे-कैसे मैंने पता लगाया था कि साहित्यिक चेहरे को फोटोजेनिक-टच देने के लिए सौन्दर्य-प्रसाधन बनाने वाली कम्पनियों (अर्थात् गुटों) में से किसके उत्पादन सबसे सस्ते, असरकारक और टिकाऊ हैं।
कैसे मैंने आम जनता का प्यारा कवि बने रहने के गुर सीखे थे और जहां जनता जैसा चाहती थी वहां वैसा ही कहना-लिखना शुरू कर दिया था। साथ ही नियमित अंतराल के बाद बात-बेबात जनता की तारीफ करना शुरू कर दिया था। कैसे मैंने पद-प्रतिष्ठा-पैसा-पहुँच-पौरूष-प्रचार इन छः तत्वों के संयोग से सम्मेलनों को सफल आयोजनों में ढालना सीखा और तब ‘‘तू मुझे बुला मैं तुझे बुलाऊँ‘‘ का सफल सूत्र मेरी बीमार होती साहित्यिक सेहत के लिये रामबाण औषधि सिद्ध हुआ था। मुझे यह भी याद है कि अपने विचारों और संवेदनाओं को स्थगित करना मैंने उन लोगों से सीखा था जिन्हें यह सब करने और सीखने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। (क्योंकि वहाँ न तो विचार थे न संवेदनाएं)।
शहर में अगर मेरे होने के बावजूद उभरता कोई साहित्यकार किसी बड़े प्रकाशन में अपनी रचना तीन साल के कड़े संघर्ष के बाद छपवा पाता तो मैं तीन दिन उसके साथ चैराहे -चैराहे घूमने जितनी मामूली मेहनत से ही मशहूर कर देता कि ‘‘ये आज जो कुछ है इन्हीं की (मेरी) बदौलत हैं।‘‘ जब कि अन्दर ही अन्दर खुद मैं मरा जा रहा होता था कि जल्द से जल्द इसकी स्थिति साहित्य में सचमुच सुदृढ़ हो जाए ताकि इसके सहारे मेरी भी दो-चार रचनाएं बड़े अखबार में स्थान पा सकें। खैर! जो संपादक मेरे दोस्त बन गए थे, ख़ुद ही बता देते थे कि आज तुम्हारी रचना के विरोध में 20-25 जो ख़त आए थे, हमने रद्दी में फिंकवा दिए हैं, अब तुम क्षतिपूर्ति के लिए इतने ही ख़त प्रशंसा में अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से लिखवाकर हमें दे दो। मैं कहता, मैं तो 50 लिखवा कर ले आया हूं, चलो आधे अगली बार लगा देना। इस मामले में जिन संपादकों के स्वभाव और विचार मुझसे भिन्न होते, उनके मैं स्टाफ़ को सैट कर लेता। स्टाफ भी अगर हरामी होता तो मैं कुछ और कमीनी तरकीबें इस्तेमाल कर लेता था। आपको नहीं बताऊंगा।
तत्पश्चात् कैसे मैंने नेताओं से सम्पर्क सांठा। कैसे अधिकारियों से रिश्ता गाँठा। कैसे लोगों, विचारों, किताबों और अखबारों को दलों, वादों, पंथों, सम्प्रदायों, धाराओं, धर्मों वगैरह के हिसाब से बाँटा। कैसे-कैसे उपायों से विरोधियों का पत्ता काटा। कैसे मैंने अपने से मिलती- जुलती विचारधारा के लोगों को छाँटा।
अर्थात् ऐसी तमाम तात्कालिक, त्वरित तपस्याओं के बाद मेरे मन के मुर्गे की बांग बुद्धत्व को प्राप्त हुई और उसने जब चाहे तब अपनी इच्छा पर साहित्यिक सुबह का सूर्योदय सुलगाने का हुनर हासिल कर लिया। यानि अब इतना हुआ कि मुझे व मेरी बातों को ‘‘बच्चा है‘‘ कहकर अपने अनुभवों की नाक पर से मक्खी की तरह उड़ा देने वाले ‘बाबागण‘ मुझ पर नज़र पड़ते ही ‘‘भाई साहब हम तो आपके ही बच्चे हैं। ज़रा नज़र रखना।‘‘ जैसे दूधिया वाक्यों की (दु)र्गन्ध से मुझे आकर्षित करने के उपाय खोजने लगते। रिश्तों के विलोमान्तर का मध्यान्तर अन्ततः अपनी मौत आप मर गया था।
इस प्रकार आपने देखा कि देखने में छोटी-छोठी लगने वाले बातें महसूस करने में कित्ती बड़ी-बड़ी हो सकती हैं। खुद मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या बताऊँ और क्या छोडूँ? क्यों बताऊँ या क्यों छोड़ूं! लेकिन एक बात साफ कर दूं। जो बालबुद्धि साहित्य-छौने बल खा-खाकर बौराए जा रहे हों कि सस्ते में सफलता के सूत्रों की सन्दूकची हाथ लग गई है, वे ज़रा अपने उत्साह की अंगीठी को ठंडा कर लें। ज़माना एक बार फिर आगे निकल चुका है। टाप-लेवल साहित्यिक स्थानों की आई.ए.एस. परीक्षाओं में उपरोक्त सूत्र अब प्रिलिमिनरी परीक्षा की कुंजी से ज्यादा महत्व नहीं रखते। वक्त और परिस्थितियों के साथ-साथ सफलता के सूत्र भी बदल जाते हैं। नई परिस्थितियों एवं नई चुनौतियों के लायक फार्मूले गढ़ने के लिये प्रतिभा और सृजनात्मकता की जरूरत होती है। जिसमें होती है उसे ऐसे लेख पढ़ने की कोई जरूरत नहीं होती।
और जो साहित्यशावक ईमानदारी वगैरह के आले में पड़े हों उन्हें भी कहना ज़रूरी समझता हूं कि जो ‘‘मैं‘‘ टीवी में आता हूँ वह ‘‘मैं‘‘ वह ‘‘मैं‘‘ नहीं हूँ जो ‘‘मैं‘‘ अखबार में होता हूँ। इसलिये मेरे अखबार वाले ‘‘मैं‘‘ में मीन मेख निकालने से मेरे टीवी वाले ‘‘मैं‘‘ पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। बाकी फिर देख ही ली जाएगी। हाँ।
हाँ, होते हैं दो एक साहित्यकार ऐसे भी जो जैसे जीवन में रहते हैं वैसे ही अखबार में होते हैं और वैसे ही टीवी पर आते हैं। लेकिन उनकी आमद पर न तो गली की लड़कियाँ आभारी होती हैं न पड़ौसी का ‘‘पप्पी‘‘ ताली बजाता है। अब मेरी क्या मजाल कि मैं गली की लड़कियों या पड़ौसी के पप्पी के बारे में अखबार में भी कहूँ:
वो कि जिसकी अपनी कोई अहमियत बाक़ी नही,
उनकी नज़रों में उसी की अहमियत है दोस्तो।
-संजय ग्रोवर
(23.06.1995 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)
मंगलवार, 22 जून 2010
साहित्य में फिक्सिंग
साहित्य में फिक्सिंग अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची जिस स्तर तक क्रिकेट में पहुंच गयी लगती है। यहां मामला कुछ अलग सा है। किसी नवोत्सुक उदीयमान लेखक को उठने के लिए विधा-विशेष के आलोचकों, वरिष्ठों, दोस्तों आदि को फिक्स करना पड़ता है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता तो उसके उदीयमान लेखक होने की संभावनाएं अत्यंत क्षीण हो जाती हैं। यहां तक कि उसे समाज से कटा हुआ, जड़ों से उखड़ा हुआ, जबरदस्ती साहित्य में घुस आया लेखक करार दिया जा सकता है।
जिस तरह नेतागण अकसर पूड़ी-साग-लड्डू का प्रलोभन देकर गांवों और कस्बों से भीड़ मंगवा कर रैली के नाम पर अपना शक्ति-प्रदर्शन करते हैं उसी तरह नवोदित लेखक अपने या प्रकाशक के खर्चे पर आलोचकों, अध्यक्षों, रूठे हुओं, जीभ-लपोरूओं और फोटू-खिंचवाईयों को मारूतियों में मंगवा कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। यह बात दीगर है कि उसमें प्रतिभा कम प्रदर्शन ज़्यादा होता है।
इस तरह गोष्ठियों आदि से नया लेखक चर्चा में आने लगता है। जैसे कि नगर स्तर का कोई खिलाड़ी रणजी ट्राफी में स्थान पा गया हो। अब यह लेखक अपना प्रथम संग्रह छपवाने की तैयारी पर उतर आता है।
इसके लिए तरह-तरह के दाव-पेंच अपनाने होते हैं। मजबूरी में पचास तरह के झूठ भी बोलने पड़ते हैं। हर आलोचक को पितामह, हर वरिष्ठ साहित्यकार को गुरू, हर संपादक को अभिभावक और हर प्रकाशक को बाप बनाना पड़ता है। लेखक के दिल में एक यही तसल्ली रहती है कि कल को अगर मैं बड़ा और पॉपुलर लेखक बन गया तो यही पितामह, गुरू और बाप लोग मेरी चौखट पर माथा रगड़ेंगे। रिश्तों के विलोमांतर का मध्यांतर खुद-ब-खुद मर जाएगा।
साहित्यिक फिक्सिंग में मामला पैसों पर कम ही आधारित होता है। यहां सफलता का मंत्र होता है कि कौन किसको कब कितना ‘ऑब्लाइज‘ कर सकता है। एक संपादक अगर आपको सदी का सर्वाधिक चर्चित लेखक घोषित करता है तो आपका भी ‘फिक्स्ड-फर्ज़‘ बनता है कि आप ऐसा माहौल बनाएं कि उस संपादक का नाम पद्मश्री, ज्ञानपीठ या ऐसे ही किसी और तोप-सम्मान या पुरस्कार के लिए न सिर्फ नामित हो जाए बल्कि येन-केन-प्रकारेण उसे यह पुरस्कार मिल कर ही रहे।
इसी तरह एक विचारक आपको अपने घर पर एक गंभीर गोष्ठी में आमंत्रित करता है तो ज़ाहिर है कि आपको भी अपने घर पर होने वाली गोष्ठी को इतना ‘स्तरीय‘ बताना व बनाना पड़ेगा कि उसमें आपके महान विचारक वह मित्र भी निःसंकोच शिरकत कर सकें। आपका एक अन्य पत्रकार मित्र इसमें यह कर सकता है कि गोष्ठी की धांसू रपट बना कर सभी बड़े-बड़े अखबारों में छपवा दें। बदले में आप उसे शहर का सबसे बड़ा खोजी, प्रामाणिक और ईमानदार पत्रकार बता सकते हैं।
आपकी पहली पुस्तक के लोकार्पण के वक्त ये सारी ‘फिक्सिंग‘ ही तो काम आती है। आप अपने विश्वासपात्र साहित्यकारों को लोकार्पण समारोह का मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, अध्यक्ष, संचालक और वक्ता के तौर पर ‘फिक्स‘ कर सकते हैं। हल्के-फुल्के मित्रों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों की ‘फिक्सिंग‘ बतौर श्रोता कर सकते हैं। इस फिक्सिंग का फायदा यह होता है कि आलोचक आपकी रचना की एक भी पंक्ति पढ़े बिना आपको कालजयी लेखक या महाकवि घोषित कर देता है। हार कर पड़ोसी, मित्र और रिश्तेदार भी आपको इंटेलैक्चुअल मान लेते हैं क्योंकि बदले में आप भी उन्हें इंटेलीजेण्ट कह देते हैं। आखिरकार वे आप जैसे महाकवि की रचनाएं जो पढ़ते हैं।
जो लेखक संपादक को तीन नए लेखकों की रचनाएं मुफ्त में मुहैय्या करवाता है, संपादक उसे अच्छा मेहनताना देने में संकोच नहीं करता। फिक्सिंग के इस फलसफे का नतीजा आखिरकार यह होता है कि वरिष्ठ बन चुका नया लेखक एक दिन संपादक की कुर्सी पर आ विराजता है। और उसके सामने फिक्सिंग की कई नयी संभावनाएं खुल जाती हैं। जो पेशकश वह लेखक होते समय संपादको/मालिकों के सम्मुख रखा करता था वैसी ही पेशकश उसके सामने रखी जाने लगती हैं।
शायद क्रिकेट में भी खिलाड़ी से कप्तान बने व्यक्ति के साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही होता हो। मगर क्रिकेट में जैसे ही राज़ खुलने लगते हैं तो कुछ दिन तो खिलाड़ियों को जनता को मुंह दिखाना मुश्किल हो जाता है। मगर साहित्य में ऐसा कुछ नहीं है। जो जितना ज्यादा विवादास्पद है उतना ही ज्यादा मशहूर है। तिस पर साहित्य में न तो अम्पायर होते हैं न कंट्रोल बोर्ड। अगर आलोचक को हम अम्पायर मानें तो मानना होगा कि फिक्सिंग साहित्य के खेल का एक अनिवार्य तत्व है।
-संजय ग्रोवर,
(जून 2000 में अप्रस्तुत फीचर्स द्वारा प्रसारित एवं कई छोटे-बड़े अखबारों में प्रकाशित)
जिस तरह नेतागण अकसर पूड़ी-साग-लड्डू का प्रलोभन देकर गांवों और कस्बों से भीड़ मंगवा कर रैली के नाम पर अपना शक्ति-प्रदर्शन करते हैं उसी तरह नवोदित लेखक अपने या प्रकाशक के खर्चे पर आलोचकों, अध्यक्षों, रूठे हुओं, जीभ-लपोरूओं और फोटू-खिंचवाईयों को मारूतियों में मंगवा कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। यह बात दीगर है कि उसमें प्रतिभा कम प्रदर्शन ज़्यादा होता है।
इस तरह गोष्ठियों आदि से नया लेखक चर्चा में आने लगता है। जैसे कि नगर स्तर का कोई खिलाड़ी रणजी ट्राफी में स्थान पा गया हो। अब यह लेखक अपना प्रथम संग्रह छपवाने की तैयारी पर उतर आता है।
इसके लिए तरह-तरह के दाव-पेंच अपनाने होते हैं। मजबूरी में पचास तरह के झूठ भी बोलने पड़ते हैं। हर आलोचक को पितामह, हर वरिष्ठ साहित्यकार को गुरू, हर संपादक को अभिभावक और हर प्रकाशक को बाप बनाना पड़ता है। लेखक के दिल में एक यही तसल्ली रहती है कि कल को अगर मैं बड़ा और पॉपुलर लेखक बन गया तो यही पितामह, गुरू और बाप लोग मेरी चौखट पर माथा रगड़ेंगे। रिश्तों के विलोमांतर का मध्यांतर खुद-ब-खुद मर जाएगा।
साहित्यिक फिक्सिंग में मामला पैसों पर कम ही आधारित होता है। यहां सफलता का मंत्र होता है कि कौन किसको कब कितना ‘ऑब्लाइज‘ कर सकता है। एक संपादक अगर आपको सदी का सर्वाधिक चर्चित लेखक घोषित करता है तो आपका भी ‘फिक्स्ड-फर्ज़‘ बनता है कि आप ऐसा माहौल बनाएं कि उस संपादक का नाम पद्मश्री, ज्ञानपीठ या ऐसे ही किसी और तोप-सम्मान या पुरस्कार के लिए न सिर्फ नामित हो जाए बल्कि येन-केन-प्रकारेण उसे यह पुरस्कार मिल कर ही रहे।
इसी तरह एक विचारक आपको अपने घर पर एक गंभीर गोष्ठी में आमंत्रित करता है तो ज़ाहिर है कि आपको भी अपने घर पर होने वाली गोष्ठी को इतना ‘स्तरीय‘ बताना व बनाना पड़ेगा कि उसमें आपके महान विचारक वह मित्र भी निःसंकोच शिरकत कर सकें। आपका एक अन्य पत्रकार मित्र इसमें यह कर सकता है कि गोष्ठी की धांसू रपट बना कर सभी बड़े-बड़े अखबारों में छपवा दें। बदले में आप उसे शहर का सबसे बड़ा खोजी, प्रामाणिक और ईमानदार पत्रकार बता सकते हैं।
आपकी पहली पुस्तक के लोकार्पण के वक्त ये सारी ‘फिक्सिंग‘ ही तो काम आती है। आप अपने विश्वासपात्र साहित्यकारों को लोकार्पण समारोह का मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, अध्यक्ष, संचालक और वक्ता के तौर पर ‘फिक्स‘ कर सकते हैं। हल्के-फुल्के मित्रों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों की ‘फिक्सिंग‘ बतौर श्रोता कर सकते हैं। इस फिक्सिंग का फायदा यह होता है कि आलोचक आपकी रचना की एक भी पंक्ति पढ़े बिना आपको कालजयी लेखक या महाकवि घोषित कर देता है। हार कर पड़ोसी, मित्र और रिश्तेदार भी आपको इंटेलैक्चुअल मान लेते हैं क्योंकि बदले में आप भी उन्हें इंटेलीजेण्ट कह देते हैं। आखिरकार वे आप जैसे महाकवि की रचनाएं जो पढ़ते हैं।
जो लेखक संपादक को तीन नए लेखकों की रचनाएं मुफ्त में मुहैय्या करवाता है, संपादक उसे अच्छा मेहनताना देने में संकोच नहीं करता। फिक्सिंग के इस फलसफे का नतीजा आखिरकार यह होता है कि वरिष्ठ बन चुका नया लेखक एक दिन संपादक की कुर्सी पर आ विराजता है। और उसके सामने फिक्सिंग की कई नयी संभावनाएं खुल जाती हैं। जो पेशकश वह लेखक होते समय संपादको/मालिकों के सम्मुख रखा करता था वैसी ही पेशकश उसके सामने रखी जाने लगती हैं।
शायद क्रिकेट में भी खिलाड़ी से कप्तान बने व्यक्ति के साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही होता हो। मगर क्रिकेट में जैसे ही राज़ खुलने लगते हैं तो कुछ दिन तो खिलाड़ियों को जनता को मुंह दिखाना मुश्किल हो जाता है। मगर साहित्य में ऐसा कुछ नहीं है। जो जितना ज्यादा विवादास्पद है उतना ही ज्यादा मशहूर है। तिस पर साहित्य में न तो अम्पायर होते हैं न कंट्रोल बोर्ड। अगर आलोचक को हम अम्पायर मानें तो मानना होगा कि फिक्सिंग साहित्य के खेल का एक अनिवार्य तत्व है।
-संजय ग्रोवर,
(जून 2000 में अप्रस्तुत फीचर्स द्वारा प्रसारित एवं कई छोटे-बड़े अखबारों में प्रकाशित)
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