ग़ज़ल

बिलकुल ही एक जैसी बातें बोल रहे थे
वो राज़ एक-दूसरे के खोल रहे थे
तहज़ीब की तराज़ू भी तुमने ही गढ़ी थी
ईमान जिसपे अपना तुम्ही तोल रहे थे
अमृत तो फ़क़त नाम था, इक इश्तिहार था
अंदर तो सभी मिलके ज़हर घोल रहे थे
वो तितलियां भी तेज़ थीं, भंवरे भी गुरु थे
मिल-जुलके, ज़र्द फूल पे जो डोल रहे थे
-संजय ग्रोवर
12-10-2015

बिलकुल ही एक जैसी बातें बोल रहे थे
वो राज़ एक-दूसरे के खोल रहे थे
तहज़ीब की तराज़ू भी तुमने ही गढ़ी थी
ईमान जिसपे अपना तुम्ही तोल रहे थे
अमृत तो फ़क़त नाम था, इक इश्तिहार था
अंदर तो सभी मिलके ज़हर घोल रहे थे
वो तितलियां भी तेज़ थीं, भंवरे भी गुरु थे
मिल-जुलके, ज़र्द फूल पे जो डोल रहे थे
-संजय ग्रोवर
12-10-2015
आपके गजल से यहाँ भी गजल जैसी चीज बन गयी, सो रखता हूँ :-
जवाब देंहटाएंफकत ईमान के नाम पे,
यहाँ बेईमानों का ठिकाना है ।
अमृत तो महज बहाना है ,
जिंदगी का तो जहर से ही याराना है ।