बुधवार, 3 जून 2015

ब्लैकमेल और हम

छोटे थे तो फ़िल्मों से पता चलता था कि ब्लैकमेल नाम की भी एक क्रिया होती है और बहुत ही घिनौने लोग इसे
अंजाम देते हैं। बड़े होते-होते, समझ आते-आते समझ में आया कि इस महानता में तो जगह-जगह, तरह-तरह से लोग हाथ बंटा रहे हैं। ‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ के मुहावरे से तो आज बहुत-से लोग परिचित हैं। सही बात तो यह है कि ब्लैक-मेलिंग सिर्फ़ ब्लैक-मेल करनेवाले व्यक्ति या समाज के बारे में ही नहीं बताती, होनेवाले के बारे में भी बताती है।

मुझे जहां तक समझ में आता है, पाखंडी समाजों में और पाखंडी व्यक्तियों के साथ ब्लैक-मेल की संभावनाएं दूसरों की तुलना में अधिक होतीं हैं। एक व्यक्ति अगर दूसरों से कहता है कि मर्यादा वाले पुरुष बनो, मगर ख़ुद वह मर्यादा तोड़ने से मिलनेवाले सभी आनंद लेना चाहता है तो ज़ाहिर है कि ऐसा करते जब वह पकड़ा जाएगा तो डरेगा ही कि सबको पता चल गया तो क्या होगा ?

ऐसे समाजों की स्त्रियां भी ऐसे ही पुरुषों को पसंद करेंगीं जो उनके और अपने ‘परिवारों की प्रतिष्ठाओं’ को बचाते-छुपाते हुए संबंधों को ‘गरिमापूर्वक’ निभाए। और पुरुष भी यही चाहेंगे। प्रतिष्ठा (!) और गरिमा(!) अगर झूठ से पैदा होतीं हों तो आदमी सच का गला काटने में एक मिनट नहीं लगाता। पाखंडी समाज का बहुमत पाखंडी के पक्ष में जाएगा ही। पाखंडी समाज में यह बहुत आसानी से संभव है कि रात को आप नास्तिकता पर कविताएं सुनाएं और सुबह ढोल बजा-बजाकर किसी प्रार्थना-स्थल पर चले जाएं और दोनों तरफ़ से पैसा और प्रतिष्ठा पीट लें। जो इस पाखंड को पूरी तरह नहीं साध पाता या साधना नहीं चाहता या उसकी सामाजिक स्थिति ऐसी नहीं बन पाई है, उसे अकसर क़दम-क़दम पर ख़तरे और नुकसान उठाने पड़ते हैं।

पाखंडी व्यक्ति की मानसिकता अगर ऐसी है कि वह फ़ायदे तो लेना चाहता है पर नुकसान या ख़तरे नहीं झेलना चाहता तो स्थिति फंसने जैसी बन सकती है। पाखंडी पुरुष या स्त्री, अगर उसे लगता है कि आठ, दस या बीस स्त्रियो या पुरुषों से संबंध दिखाने से उसकी छवि ‘विद्रोही’, ‘आवारा’ या ‘प्रगतिशील’ की बनेगी और इससे उसे फ़ायदा होगा तो वह चिल्ला-चिल्लाकर इसे बताना चाहता है। मगर जैसे ही उसे लगता है कि इससे उसके परिवार, प्रतिष्ठा, छवि, कैरियर आदि को नुकसान होगा तो वह छुपाने के लिए हाथ-पैर मारने लगता है। पाखंडी समाजों में पाखंडियों द्वारा अपनी सुविधाओं के अनुसार बनाया गया ‘सामाजिक’ और व्यक्तिगत’ का फ़ासला भी इसकी वजह हो सकता है।

सभी जानते हैं कि आपके घर का शयनकक्ष आपके सोने के लिए है, बाथरुम नहाने के लिए है, पाख़ाना टट्टी करने के लिए है। आप अपने शयनकक्ष में सो रहे हैं, कोई इसकी तसवीर उतार ले तो इसमें आपको डरने की क्या ज़रुरत है भला !? आप मेरे टॉयलेट में मेरे टट्टी करने का वीडियो बना लें और इंटरनेट पर डाल दें, मुझे तो रत्ती-भर फ़र्क नहीं पड़ता। लोग न जाने कैसी-कैसी बातों पर ब्लैकमेल हो जाते हैं !! अगर कोई मेरे बाथरुम में मेरे नहाने की तसवीर देखकर हंसता है तो यह उसकी मानसिक समस्या है, मेरी नहीं। ऐसे दस करोड़ लोग भी हंसें तो मुझे तो अक़्ल होनी चाहिए कि अपने बाथरुम में नहाना कोई अपराध नहीं है। बाथरुम में भी  आदमी कपड़े पहनकर नहाएगा क्या!?

अगर कोई किसीसे कहता है कि मरने के बाद कहीं (न जाने कहां!) पहुंचकर तुम्हारे साथ बहुत बुरा व्यवहार हो सकता है, उससे बचना है तो मेरी पेटी में कुछ पैसे डालो, तो यह भी ब्लैकमेलिंग का ही एक रुप है। अगर कोई तथाकथित प्रेमी या प्रेमिका किसीसे कहता है कि मेरी बात नहीं मानी तो मैं तुम्हारे पत्र (आजकल ईमेल या एस एम एस) लोगों को दिखा दूंगा/दूंगी, तो यह तो ब्लैकमेलिंग है ही। एक और संभावना यह भी होती है कि प्रेमसंदेशों के आदान-प्रदान के दौरान ऐसे व्यक्ति ने दूसरे पक्ष को ऐसे द्विअर्थीय/बहुअर्थीय संदेश भेजे हों जिनके बाद में उसकी सुविधानुसार अर्थ निकाले जा सकें। ऐसे लोग आदतन ब्लैकमेलर हो सकते हैं या किसी व्यवस्थित (और प्रतिष्ठित भी) रैकेट का हिस्सा भी हो सकते हैं। अपने मन की बात साफ़ शब्दों में कहनेवाला व्यक्ति अपेक्षाकृत ज़्यादा विश्वसनीय है। वह या तो अपने किए की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार ही है, नही तो मजबूरी में तो उसे लेनी ही पड़ेगी। और ऐसे लोग तो जगह-जगह मिलते हैं जो, जब तक दूसरा उनके अनुकूल चले, उसकी ग़लतियों पर भी शाबाशियां देते हैं, जिस दिन विरुद्ध जाए, डराना शुरु कर देते हैं कि अगर नहीं मानोगे तो बता दूंगा, खोल दूंगा, ऐसा-वैसा कुछ कर दूंगा। मगर फ़िर भी, जो व्यक्ति अपने किए के प्रति समझपूर्ण है या अपने किए की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार है, उसे आसानी से ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता।

मगर जिस समाज में पाखंड को ही चरित्र में बदल देनेवाले लोग कुछ नए पाखंडों की रचना करके, पुराने पाखंडों से छुटकारा दिलाकर उसे ‘सुधारने’ की कोशिशों में लगे होंगे, वहां ब्लैकमेलिंग के बढ़ते जाने की संभावनाएं ही ज़्यादा होंगीं।

-संजय ग्रोवर

15-10-2013
(on FaceBook)



4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (05-06-2015) को "भटकते शब्द-ख्वाहिश अपने दिल की" (चर्चा अंक-1997) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक सामाजिक और राजनैतिक बीमारी हो गई है.
    कुछ छिपाने को ही न रहे तो क्या भय.
    सच कहा.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. ग़ुलज़ार साहब का एक शे‘र है-

      कुछ और भी हो गया नुमायां
      मैं अपना लिक्खा मिटा रहा था

      जो बहुत छुपाया गया था, आजकल सब नुमायां होता जा रहा है......

      हटाएं
  3. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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