शुक्रवार, 27 जून 2014

एक कुर्सी पे तोंद रक्खी है

ग़ज़ल
रेखाकृति: संजय ग्रोवर


कई सदियों की गोंद रक्खी है
एक कुर्सी पे तोंद रक्खी है

तोंद पर लटकी एक दाढ़ी है
झाड़ ने दुनिया रौंद रक्खी है

ज़हर में रंग की न फ़िक़्र करो
हमने तो आंख मूंद रक्खी है

तेज है उनका तेल के जैसा
बासी बातों में सौंध रक्खी है

बदन आता है, ज़हन आएगा
चौंध में उनके लौंद रक्खी है
27-06-2014

(लौंद=छलांग leap,  सौंध=बासी की बदबू  ill-smelling, musty, चौंध=a very harsh, bright, dazzling light, तेज=आभा aura)

2.
अकसर साजिश करते भी हैं
खुले तो थोड़ा डरते भी हैं

असल तो कुछ भी नहीं है ज़िंदा
रस्मन अब भी मरते भी हैं

ख़ार, चढ़ावा मिले, तो मुंह से
फूल-वूल कुछ झरते भी हैं

सदियों से हैं ज़हर के मालिक़
दास के दिल में भरते भी हैं

ख़ुद ही ख़ुदको बोलके ऊंचा
दम तहज़ीब का भरते भी हैं
17-06-2014


-संजय ग्रोवर



3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (28-06-2014) को "ये कौन बोल रहा है ख़ुदा के लहजे में... " (चर्चा मंच 1658) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खूब...सुन्दर कथ्य...

    उत्तर देंहटाएं
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    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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