कविता
कुछ लोगों में कल तक आत्मविश्वास था।
कुछ लोगों में कल तक आत्मविश्वास आ जाएगा।
या ऐसा भी हो सकता है कि
जिनमें कल तक आत्मविश्वास था
उन्हीं में कल भी रहेगा
जिनमें कल तक नहीं था
उनमें कल भी नहीं आएगा
कुछ भी हो
एक बात तो है
लोगों को अपने आत्मविश्वास के बारे में
ठीक से कुछ भी पता नहीं है
कि यह एक कलंडर पर टिका है
कि यह एक तारीख़ पर टिका है
कि यह एक पार्टी पर टिका है
कि यह एक पद पर टिका है
कि यह एक दुकान, एक मकान पर टिका है
कि यह एक प्रेमी, एक प्रेमिका पर टिका है
कि यह एक सफ़लता, एक हार, एक जीत पर टिका है
कि यह एक भीड़ के इधर से उधर या उधर से इधर हो जाने पर टिका है
कि यह कुछ पैंतरों, कुछ रणनीतियों पर टिका है
कि यह कुछ समझौतों, कुछ मौक़ापरस्ती पर टिका है
या
हमारी मेहनत का नतीजा है
हमारी सोच से उपजा है?
मैंने ईमानदारी के लिए लड़ते.......
छोड़िए यह झूठ ही होगा
मैंने हक़ के लिए लड़ते लोगों को
देखा था कभी-कभी
उन्हें क्या ध्यान रहता था कि लड़ते समय उनका चेहरा कैसा हो जाता है
क्या वे ऐसा अफ़ोर्ड भी कर सकते थे?
क्या घर से निकलते उन्हें मालूम भी होता था कि
आज किस बात के लिए किससे लड़ना पड़ जाएगा
उनका तो कांपने लगता था सारा शरीर
होंठों के किनारे हो जाते थे थूक से सफ़ेद
सच कहूं तो
वे तो दयनीय लगने लगते थे
वे तो शुक्र करते होंगे कि आस-पास कोई कैमरा नहीं था
वरना क्या वे आत्मविश्वासी की परिभाषा में फ़िट बैठ पाते
वे तो कलंकित ही करते
सभी मान्यताओं को
आत्मविश्वास अगर इतनी ही हास्यास्पद चीज़ है
तो इसे हास्यास्पद लोगों को दान कर देना चाहिए
हंसी आए तो हंस लेना चाहिए
कम-अज़-कम इतना आत्मविश्वास तो होना ही चाहिए
कि यह सोचने की हिम्मत की जा सके
कि आत्मविश्वास होता क्या है
इसकी ज़रुरत क्या है
इसकी क़ीमत क्या है
कि बेईमान आदमी
भरे बाज़ार में छाती ठोंककर कैसे चिल्लाता है
कि झूठा आदमी
सबसे ज़्यादा अभ्यस्त कैसे है
आंख से आंख मिलाकर बात करने का
माफ़ कीजिए
ऐसा आत्मविश्वास आप अपने पास रखिए
हमें जो करना है
बिना आत्मविश्वास के बेहतर कर रहे हैं
-संजय ग्रोवर
15-05-2014
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रेखाकृति: संजय ग्रोवर |
कुछ लोगों में कल तक आत्मविश्वास था।
कुछ लोगों में कल तक आत्मविश्वास आ जाएगा।
या ऐसा भी हो सकता है कि
जिनमें कल तक आत्मविश्वास था
उन्हीं में कल भी रहेगा
जिनमें कल तक नहीं था
उनमें कल भी नहीं आएगा
कुछ भी हो
एक बात तो है
लोगों को अपने आत्मविश्वास के बारे में
ठीक से कुछ भी पता नहीं है
कि यह एक कलंडर पर टिका है
कि यह एक तारीख़ पर टिका है
कि यह एक पार्टी पर टिका है
कि यह एक पद पर टिका है
कि यह एक दुकान, एक मकान पर टिका है
कि यह एक प्रेमी, एक प्रेमिका पर टिका है
कि यह एक सफ़लता, एक हार, एक जीत पर टिका है
कि यह एक भीड़ के इधर से उधर या उधर से इधर हो जाने पर टिका है
कि यह कुछ पैंतरों, कुछ रणनीतियों पर टिका है
कि यह कुछ समझौतों, कुछ मौक़ापरस्ती पर टिका है
या
हमारी मेहनत का नतीजा है
हमारी सोच से उपजा है?
मैंने ईमानदारी के लिए लड़ते.......
छोड़िए यह झूठ ही होगा
मैंने हक़ के लिए लड़ते लोगों को
देखा था कभी-कभी
उन्हें क्या ध्यान रहता था कि लड़ते समय उनका चेहरा कैसा हो जाता है
क्या वे ऐसा अफ़ोर्ड भी कर सकते थे?
क्या घर से निकलते उन्हें मालूम भी होता था कि
आज किस बात के लिए किससे लड़ना पड़ जाएगा
उनका तो कांपने लगता था सारा शरीर
होंठों के किनारे हो जाते थे थूक से सफ़ेद
सच कहूं तो
वे तो दयनीय लगने लगते थे
वे तो शुक्र करते होंगे कि आस-पास कोई कैमरा नहीं था
वरना क्या वे आत्मविश्वासी की परिभाषा में फ़िट बैठ पाते
वे तो कलंकित ही करते
सभी मान्यताओं को
आत्मविश्वास अगर इतनी ही हास्यास्पद चीज़ है
तो इसे हास्यास्पद लोगों को दान कर देना चाहिए
हंसी आए तो हंस लेना चाहिए
कम-अज़-कम इतना आत्मविश्वास तो होना ही चाहिए
कि यह सोचने की हिम्मत की जा सके
कि आत्मविश्वास होता क्या है
इसकी ज़रुरत क्या है
इसकी क़ीमत क्या है
कि बेईमान आदमी
भरे बाज़ार में छाती ठोंककर कैसे चिल्लाता है
कि झूठा आदमी
सबसे ज़्यादा अभ्यस्त कैसे है
आंख से आंख मिलाकर बात करने का
माफ़ कीजिए
ऐसा आत्मविश्वास आप अपने पास रखिए
हमें जो करना है
बिना आत्मविश्वास के बेहतर कर रहे हैं
15-05-2014
इस ऐग्रीगेटर पर मेरी पोस्ट साझा करने के लिए बहुत-बहुत आभार।
जवाब देंहटाएंयहां विनम्रतापूर्वक यह स्पष्ट करना ज़रुरी समझता हूं कि यह कविता किसी दलविशेष के समर्थन या विरोध में कतई नहीं है।
थोड़ा ज़्यादा स्पष्ट करने में भी कोई बुराई नहीं। यह कविता इंसान द्वारा अब तक स्थापित मान्यताओं, धारणाओं और मनोविज्ञान की प्रामाणिकता पर संदेह को मुखरता से दर्ज़ करने-कराने के लिए है।
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