गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

(फ़ेसबुक-पीतम के नाम एक लार्ज एस एम एस पाती)



हे प्रिय सन्नाटन्न लीलाधर,
नमस्ते, गुड मॉर्निंग प्लस कबूतर-कबूतरी के जोड़े का चित्र(समझ ही गए होगे)
पैलेंटाइन-पसंत त्वमेव बहुत मुबारक़
पैलेंटाइन दिवस को मैं बहुत गंदी चीज़ मानती थी मगर जबसे तुमने पुरानी-पीली-मृतप्रायः क़िताब में दिखाया कि हमारे यहां भी यह होता था, तबसे मैं एकदम चेंज हो गयी हूं जैसे पहले बिना सोचे-समझे इसमें लट्ठ बजाती थी वैसे ही बिना सोचे-समझे अब इसकी पूजा करती हूं। तुम्हारी संगत में लोगों की रंगत कुछ इसी अंदाज़ में निखरती है। आगे इसका और ज़्यादा वरनन करुंगी।

हे चिर-चीरकुमार, इधर फ़ेसबुक-पत्रिका का माहौल कुछ अजीब होने लगा है, लोग कुछ ज़्यादा ही विचार परकट करने लगे हैं। बाक़ी सब तो मैं निपट जाती पर इधर मन में तुम्हारे प्रति भी संदेह घिर-घिर आता है। जिन्हें तुम दानव कहते रहे उन्हीं के विचार अब मुझे मानवीय लगने लगे हैं। इधर फ़ेसबुक पर सखियां भी पूछने लगीं हैं कि लल्ला ख़ुद तो प्रतिसमय रधाओं और गुपिकाओं में घिरे रहते हैं पर कभी रोकमणि जी को भी तो फ़ेसबुक की हवा लगने दिया करें, रोकमणि जी की तो वे हवा भी नहीं लगने देते! क्या रोकमणि जी को भी इनकी हवा नहीं लगती? मैं क्या जवाब दूं लीला-च-आर्य?

कई फ़ास्ट-फ्रेंडिकाएं अब ऑबजेक्शन करती हैं कि ये जो तुम्हारे विवाहित-लिव-इन-आंकाक्षी चौबीस घंटे लार-निवेदन डालते फिरते हैं, उन अविवाहित फ़ेसबुकग़ामियों जिनकी संबंधी स्त्रियां फ़ेसबुक पर ओपन-विचरण करतीं हैं, को मर्यादा की रेखा बताते क्या भद्दे नहीं लगते!? फ्रेंडगण पूछते हैं कि ये तुम्हारे रसियाचारी हर हर जगह बिन बुलाए ऊंगली की तरह क्यों घुसते हैं, ये क्यों तय करते फिरते हैं कि किसको किस उम्र में प्रेम करना चाहिए!? इन्होंने कौन-सी जड़ी-बूटी खाई है कि ये किसी भी उम्र में कुछ भी निःशब्द करेंगे फिर भी विद्रोह-च-आर्य कहलाएंगे और दूसरे करेंगे तो ये स्वघोषित जज उसे लंपट घोषित कर देंगे। एक सखि यहीं खड़ी है और पूछ रही है कि अभी 62 बरस की बोल्ड नायिका ने 36 साल के लड़के से एक संबंध स्थापित किया है, क्या तुम्हारे धनाधीष द्वंदी उसे भी लंपटिका कहेंगे? इन द्विमुखियों-चौमुखियों के हर बात पर अपने लिए अलग और दूसरों के लिए कुछ और मानदण्ड क्यों रहते हैं!? ये बिलकुल ही ठस्सबुद्धि हैं क्या? एक अतिऐंग्री गुपिका पूछ रही है कि ये मूर्ख दस-पांच हज़ार साल पुराना, बिना जांघिए का नाड़ा पहने खड़े दूसरों को मूर्ख बना रहे हैं या ख़ुदको!?

ज़्यादा न लिखूंगी पीतम, अच्छा दिन है। पर इसका क्या करुं कि कुछ फ्रेंडिकाओं के सखालोग इस बात पर क्रुद्ध हैं कि ये(मतलब तुम) कुछ प्रिंटसंपादकों-विद्रोहियों के घरों में घुसि-घुसि जाते हैं, उनकी पत्नियों, नौकरों और रोटियों-सब्ज़ियों के हिसाब ले आते हैं पर अपना हिसाब हमेशा हिज़ाब में रखते हैं, ये कभी अपना भी हिसाब दूसरों को देंगे? झूठ न कहूंगी, क्षण-क्षण-रंगबदलाचार्य, मन मेरा भी अब शकाग्नि में जलने लगा है। और किसीको न सही, मुझे तो डिटेल में कुछ इन-शॉर्ट ही बता दो। और कुछ नहीं स्वतन रोकमनि जी और बहन द्रुपादि जी की फ्रेंड-रिक्वेस्ट ही भिजवा दो, बाक़ी हाल-चाल मैं ख़ुद ही ले लूंगी।
मिलते हैं, शाम को फ़ेसबुक-मंदर के पीछे
बाय-बाय-राम-राम-इनकीलाब जींदाबाद
फूल पर फूल का जोड़े का स्केच
(समझ ही गए होगे)
योर्स फूलली
गुपिका

--संजय ग्रोवर

1 टिप्पणी:

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

देयर वॉज़ अ स्टोर रुम या कि दरवाज़ा-ए-स्टोर रुम....

ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

Protected by Copyscape plagiarism checker - duplicate content and unique article detection software.

ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

अंतर्द्वंद (1) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (1) अंधविश्वास (1) अनुसरण (1) अफ़वाह (1) अफवाहें (1) असमंजस (2) अस्पताल (1) अहिंसा (3) आंदोलन (4) आकाश (1) आज़ाद (1) आतंकवाद (2) आत्म-कथा (2) आत्मकथा (1) आत्मविश्वास (1) आत्मविश्वास की कमी (1) आध्यात्मिकता (1) आभास (1) आरक्षण (3) आवारग़ी (1) इंटरनेट की नयी नैतिकता (1) इंटरनेट पर साहित्य की चोरी (2) इंसान (1) इतिहास (2) इमेज (1) ईक़िताब (1) ईमानदार (1) ईमानदारी (1) ईमेल (1) ईश्वर (5) उत्कंठा (2) उत्तर भारतीय (1) उदयप्रकाश (1) उपाय (1) उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (1) ऊंचा (1) ऊब (1) एक गेंद करोड़ों पागल (1) एकतरफ़ा रिश्ते (1) ऐंवेई (2) ऐण्टी का प्रो (1) औरत (2) औरत क्या करे (3) औरत क्या करे ? (3) कचरा (1) कट्टरपंथ (2) कट्टरपंथी (1) कट्टरमुल्लापंथी (1) कठपुतली (1) कन्फ्यूज़न (1) कमज़ोर (1) कम्युनिज़्म (1) कविता (52) कशमकश (1) क़ाग़ज़ (1) कार्टून (3) क़िताब (1) कुंठा (1) कुण्ठा (1) क्रांति (1) क्रिकेट (2) ख़ज़ाना (1) खामख्वाह (2) ख़ाली (1) खीज (1) खेल (1) गज़ल (4) ग़जल (1) ग़ज़ल (24) ग़रीबी (1) गांधीजी (1) गाना (2) गाय (2) ग़ायब (1) गीत (2) गौ दूध (1) चमत्कार (2) चरित्र (3) चलती-फिरती लाशें (1) चालू (1) चिंतन (1) चिंता (1) चिकित्सा-व्यवस्था (1) चुनाव (1) चुहल (2) चोरी और सीनाज़ोरी (1) छप्पर फाड़ के (1) छोटा कमरा बड़ी खिड़कियां (3) छोटापन (1) जड़बुद्धि (1) ज़बरदस्ती के रिश्ते (1) जागरण (1) जाति (1) जातिवाद (2) जानवर (1) ज़िंदगी (1) जीवन (1) ज्ञान (1) झूठे (1) टॉफ़ी (1) डर (3) डायरी (2) डीसैक्सुअलाइजेशन (1) ढिठाई (2) ढोंगी (1) तंज (1) तंज़ (9) तर्क (2) तसलीमा नसरीन (1) ताज़ा-बासी (1) तोते (1) दबाव (1) दमन (1) दयनीय (1) दर्शक (1) दलित (1) दिमाग़ (1) दिमाग़ का इस्तेमाल (1) दिल की बात (1) दिल से (1) दिल से जीनेवाले (1) दिल-दिमाग़ (1) दिलवाले (1) दिशाहीनता (1) दुनियादारी (1) दूसरा पहलू (1) देश (1) देह और नैतिकता (6) दोबारा (1) दोमुंहापन (1) दोस्त (1) दोहरे मानदंड (3) दोहरे मानदण्ड (14) दोहा (1) दोहे (1) धर्मग्रंथ (1) धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री (1) धर्मनिरपेक्षता (4) धारणा (1) धार्मिक वर्चस्ववादी (1) धोखेबाज़ (1) नकारात्मकता (1) नक्कारखाने में तूती (1) नज़्म (4) नज़्मनुमा (1) नफरत की राजनीति (1) नया (2) नाथूराम (1) नाथूराम गोडसे (1) नाम (1) नास्तिक (6) नास्तिकता (2) निरपेक्षता (1) निराकार (3) निष्पक्षता (1) पक्ष (1) पड़़ोसी (1) परंपरा (4) परतंत्र आदमी (1) परिवर्तन (4) पशु (1) पहेली (3) पाखंड (7) पाखंडी (1) पाखण्ड (6) पागलपन (1) पिताजी (1) पुरस्कार (2) पैंतरेबाज़ी (1) पोल (1) प्रकाशक (1) प्रगतिशीलता (2) प्रतिष्ठा (1) प्रयोग (1) प्रायोजित (1) प्रेम (2) प्रेरणा (2) प्रोत्साहन (2) फ़क्कड़ी (1) फालतू (1) फ़िल्मी गाना (1) फ़ेसबुक (1) फ़ेसबुक-प्रेम (1) फैज़ अहमद फैज़्ा (1) फ़ैन (1) बंद करो पुरस्कार (2) बच्चन (1) बच्चे (1) बजरंगी (1) बड़ा (2) बदमाशी (1) बदलाव (4) बहस (14) बहुरुपिए (1) बासी (1) बिजूके (1) बिहारी (1) बेईमान (2) बेईमानी (1) बेशर्मी (2) बेशर्मी मोर्चा (1) बेहोश (1) ब्लाॅग का थोड़ा-सा और लोकतंत्रीकरण (3) ब्लैकमेल (1) भक्त (2) भगवान (2) भारत का चरित्र (1) भारत का भविष्य (1) भावनाएं और ठेस (1) भीड़ (1) भ्रष्टाचार (5) मंज़िल (1) मज़ाक़ (1) मनोरोग (1) मनोविज्ञान (4) ममता (1) मर्दानगी (1) महात्मा गांधी (3) महानता (1) महापुरुष (1) मां (2) मातम (1) माता (1) मानवता (1) मान्यता (1) मीडिया का माफ़िया (1) मूर्खता (3) मूल्य (1) मेरिट (2) मौक़ापरस्त (2) मौक़ापरस्ती (1) मौलिकता (1) युवा (1) योग्यता (1) रंगबदलू (1) रचनात्मकता (1) रद्दी (1) रहस्य (2) राज़ (1) राजनीति (3) राजेंद्र यादव (1) राजेश लाखोरकर (1) राष्ट्र-प्रेम (3) राष्ट्रप्रेम (1) रास्ता (1) रिश्ता और राजनीति (1) रुढ़ि (1) रुढ़िवाद (1) रुढ़िवादी (1) लघु व्यंग्य (1) लघुकथा (8) लघुव्यंग्य (2) लालच (1) लेखक (1) लोग क्या कहेंगे (1) वात्सल्य (1) वामपंथ (1) विचार की चोरी (1) विज्ञापन (1) विवेक (1) विश्वगुरु (1) वेलेंटाइन डे (1) वैलेंटाइन डे (1) व्यंग्य (79) व्यंग्यकथा (1) व्यंग्यचित्र (1) शब्द और शोषण (1) शरद जोशी (1) शराब (1) शातिर (2) शायद कोई समझे (1) शायरी (42) शायरी ग़ज़ल (1) शेरनी का दूध (1) संगीत (2) संघर्ष (1) संजय ग्रोवर (3) संदिग्ध (1) संपादक (1) संस्मरण (2) सकारात्मकता (1) सच (1) सड़क (1) सपना (1) समझ (2) समाज (6) समाज की मसाज (34) सर्वे (1) सवाल (2) सवालचंद के चंद सवाल (9) सांप्रदायिकता (5) साकार (1) साभार (3) साहित्य की दुर्दशा (6) साहित्य में आतंकवाद (18) स्त्री-विमर्श के आस-पास (18) स्लट वॉक (1) स्वतंत्र (1) हमारे डॉक्टर (1) हल (1) हास्य (4) हास्यास्पद (1) हिंदी दिवस (1) हिंदी साहित्य में भीड/भेड़वाद (2) हिंदी साहित्य में भीड़/भेड़वाद (5) हिंसा (2) हिन्दुस्तानी चुनाव (1) होलियाना हरकतें (2) active deadbodies (1) animal (1) atheism (1) audience (1) author (1) autobiography (1) awards (1) big (2) Blackmail (1) book (1) chameleon (1) character (1) child (1) comedy (1) communism (1) confusion (1) cow (1) cricket (1) cunning (1) devotee (1) devotees (1) dishonest (1) dishonesty (1) Doha (1) dreams (1) ebook (1) Editor (1) experiment (1) Facebook (1) fan (1) fear (1) forced relationships (1) formless (1) formless god (1) friends (1) funny (1) funny relationship (1) gandhiji (1) ghazal (11) god (1) gods of atheists (1) great (1) greatness (1) highh (1) hindi literature (3) Hindi Satire (8) history (1) history satire (1) hollow (1) humanity (1) humor (1) Humour (3) hypocrisy (3) hypocritical (2) in the name of freedom of expression (1) inner conflict (1) innovation (1) IPL (1) jokes (1) life (1) logic (1) lyrics (3) mob (1) mother (1) movements (1) music (2) name (1) neighbors (1) non-violence (1) one-way relationships (1) opportunist (1) opportunistic (1) oppotunism (1) oppressed (1) paper (1) parrots (1) pathetic (1) pawns (1) plagiarism (1) poem (2) poetry (17) poverty (1) pressure (1) prestige (1) publisher (1) puppets (1) radicalism (1) Rajesh Lakhorkar (1) rationality (1) royalty (1) rumors (1) sanctimonious (1) Sanjay Grover (1) satire (25) secret (1) senseless (1) shayari (1) short story (5) shortage (1) sky (1) song (2) sponsored (1) spoon (1) Surendra Mohan Pathak (1) The father (1) The gurus of world (1) tradition (2) trash (1) ultra-calculative (1) unemployed (1) values (1) verse (2) vicious (1) violence (1) virtual (1) weak (1) weeds (1) woman (2) world cup (1)