गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

आईने फिर अक़्स भुनाने निकले हैं


ग़ज़ल


देश को जुमलों से बहलाने निकले हैं
लगता यूं है देश बचाने निकले हैं

नाक पकड़ कर घूम रहे थे सदियों से
अंदर से जो ख़ुद पाख़ाने निकले हैं

नशा पिलाकर यारा इनका नशा उतार
ज़हन में जिनके दारुख़ाने निकले हैं

ज़िंदा लाशों की रहमत कुछ ऐसी है
चलते-फिरते मुर्दाखाने निकले हैं

बचके रहना, सामने मत इनके आना
आईने फिर अक़्स भुनाने निकले हैं

आम आदमी फिर कुछ खोने वाला है!
ख़ास आदमी फिर कुछ पाने निकले हैं


-संजय ग्रोवर


मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012

व्यंग्य : शेरनी क्यों ‘हमें’ दूध नहीं देती !?


भैंस हमें दूध देती है।
गाय हमें दूध देती हैं।
बकरी हमें दूध देती हैं।

दूध तो देती हैं पर यह कैसे पता चलता है कि ‘हमें’ देतीं हैं !

अगर हम जबरन बांध-बूंधकर इनका दूध न निकालें तो क्या वे हमारे घर पर देने आ जाएंगीं कि अंकल, जब तक दूध नहीं लोगे, कॉल-बैल से खुर नहीं हटाऊंगी।

कया ये इंसान से भी ज़्यादा मानवीय हैं ? इंसान तो अपना दूध किसी को देता नहीं।
इंसान तो बड़ा चालू है। भैंस का दूध कुत्ते को पिला देता है। मदरडेयरी का पूजास्थल पर चढ़ा देता हैं।
कभी बचपन में किसी निबंध तक में नहीं पढ़ा कि शेरनी ‘हमें’ दूध देती है!
रीछनी ‘हमें’ दूध देती है!
भेड़ियाइन ‘हमें’ दूध देती है!

बेचारी सीधी-सादी गाय-भैंस-बकरी!
कभी किसी मीडिया मैन ने भी जाकर उनसे नहीं पूछा कि ‘माताजी, यह दूध आप किसे देती हैं!? ज़रा टेस्ट कराओ तो ‘ख़ाना-पकाना भारतवाला’ में तुम्हारी भी रैसिपी दिखा देंगे।
‘कैसा बुद्धू है, कि घाघ है रे, यहां बिना रैसिपी दिखाए ही जान के लाले पड़े हैं और ये....... गाय-भैंस सोचेंगीं।

सोचने की बात है कि गाय-भैंस-बकरी अगर दूध हमें देतीं हैं तो अपने बछड़ों और मेमनों को क्या देतीं हैं ? उन्हें क्या कैश पकड़ा देतीं हैं कि ‘बेटा ये लो 20 रु., बाज़ार से मदर डेयरी की थैली लेकर सरकंडा लगाकर चूस लेना! अपन का दूध तुपन के लायक नहीं है, इंसान को ही माफ़िक आता है।’

शेरनी का दूध इंसान को सूट नहीं करता क्या!?
यू तो वह मुर्गी के अंडे भी झट से चट कर जाता है!
कल्पना कीजिए कि एक टूटे टिन शेड के नीचे एक पतली रस्सी से एक शेरनी बंधी है। नीचे भगौना तैयार है। एक श्वाला (ग्वाले का काल्पनिक दोस्त) दूध दुहने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है।
‘‘गगुर्रर्रर्रर्र...’’
कहां गया श्वाला? कहां गई रस्सी? कहां है दूध?

इंसान को गाय-भैंस-बकरी का दूध ही सूट करता है।


-संजय ग्रोवर

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

....और देश बच गया!


....और देश बच गया!
तीन दिन पहले भी बचा था। तीन दिन बाद फिर बचेगा। 47 में बचा। 77 में बचा। 2004 में बचा। 2009 में बचा। रामलीला ग्राउंड में बचा। जंतर-मंतर पे बचा।
आए दिन बचता है।
बचानेवाले बदल जाते हैं, देश वही रहता है।
बच-बचाकर काट रहा है किसी तरह।
इतनी गुज़र गयी, बाक़ी भी गुज़र जाएगी।
× × ×
लो, यह रखा है देश, आओ और बचा लो।
जो बचाएगा, उसीका हो जाएगा।
कोई भी बचा सकता है।
जिनसे इसे बचाना चाहिए, वे भी।
× × ×
भीड़ बहुत थी।
हर कोई देश बचाना चाहता था, किसी भी क़ीमत पर।
मगर देश कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था।
मुझे मिल गया, अंधेरे कोने में, हांफ़ता-कांपता।
‘क्या हुआ !?’
‘कुछ नहीं, बचाने वालों से बचके खड़ा हूं।’
× × ×
मांग उठ रही है कि देश को राजनेताओं से बचना चाहिए।
संशय उठ रहा है कि यह भी नज़र बचाकर की जाने वाली राजनीति है।
यहां ‘बच-बचके कबड्डी खेलना’ वाला मुहावरा याद आ सकता है।
× × ×
अगर देश न बचता तो क्या होता !
फुर्र ! छूमंतर !
क्या एकदम से उड़ जाता ? कपूर की तरह !
भाप की तरह ग़ायब हो जाता !
या उतना और वैसा फिर भी बचा रहता जितना और जैसा आज है !
क्या बचने और न बचने में कोई फ़र्क़ है या सब मन का वहम है !


-संजय ग्रोवर
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ख़ुद फंसोगे हमें भी फंसाओगे!

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ढूंढो-ढूंढो रे साजना अपने काम का मलबा.........

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