गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

आईने फिर अक़्स भुनाने निकले हैं


ग़ज़ल


देश को जुमलों से बहलाने निकले हैं
लगता यूं है देश बचाने निकले हैं

नाक पकड़ कर घूम रहे थे सदियों से
अंदर से जो ख़ुद पाख़ाने निकले हैं

नशा पिलाकर यारा इनका नशा उतार
ज़हन में जिनके दारुख़ाने निकले हैं

ज़िंदा लाशों की रहमत कुछ ऐसी है
चलते-फिरते मुर्दाखाने निकले हैं

बचके रहना, सामने मत इनके आना
आईने फिर अक़्स भुनाने निकले हैं

आम आदमी फिर कुछ खोने वाला है!
ख़ास आदमी फिर कुछ पाने निकले हैं


-संजय ग्रोवर


8 टिप्‍पणियां:

  1. सादर अभिवादन!
    --
    बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (27-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. Thursday, October 25, 2012

    आईने फिर अक़्स भुनाने निकले हैं


    ग़ज़ल


    देश को जुमलों से बहलाने निकले हैं
    लगता यूं है देश बचाने निकले हैं

    नाक पकड़ कर घूम रहे थे सदियों से
    अंदर से जो ख़ुद पाख़ाने निकले हैं

    नशा पिलाकर यारा इनका नशा उतार
    ज़हन में जिनके दारुख़ाने निकले हैं

    ज़िंदा लाशों की रहमत कुछ ऐसी है
    चलते-फिरते मुर्दाखाने निकले हैं

    बचके रहना, सामने मत इनके आना
    आईने फिर अक़्स भुनाने निकले हैं

    आम आदमी फिर कुछ खोने वाला है!
    ख़ास आदमी फिर कुछ पाने निकले हैं


    -संजय ग्रोवर

    संजय ग्रोवर साहब सीधा संवाद है यह गजल आजकी बदकारी से व्यवस्था से .हर अश -आर .करता है मार ,बे -शुमार .

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूब। पाखाने का प्रयोग बहुत साहसी रहा।

    उत्तर देंहटाएं
  4. नशा पिलाकर यारा इनका नशा उतार
    ज़हन में जिनके दारुख़ाने निकले हैं

    वाह वाह वाह...

    उत्तर देंहटाएं
  5. shailagrawala@gmail.com

    आँख खोलने वाला व्यंग्य संजय जी। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आँख खोलने वाला व्यंग्य संजय जी। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आँख खोलने वाला व्यंग्य संजय जी। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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