गुरुवार, 2 अगस्त 2012

मुझको कुछ-कुछ गणित लगा..


ग़ज़ल

जो भी था सब अभिनय था
सब कुछ पहले से तय था


ख़ुद समझा हो, काफ़ी है
जो भी उसका आशय था


नीयत भी कुछ साफ़ न थी
भावुक भी वो अतिशय था


मुझको कुछ-कुछ गणित लगा
वो कहता है परिणय था



हम उसका करते भी क्या
उसको तो ख़ुदसे भय था



-संजय ग्रोवर

24 टिप्‍पणियां:

  1. खुद समझा हो काफी है
    जो भी उसका आशय था --- वाह !

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  2. वाह ....
    बहुत बढ़िया संजय जी.....
    लाजवाब गज़ल...यूँ भी छोटे बहर की गज़ल का अपना आनंद है..

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. मुझको कुछ-कुछ गणित लगा
    वो कहता है परिणय था


    .....:))

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह संजय भाई. बहुत खूब! बहुत बहुत ही खूब!!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह संजय भाई. बहुत खूब! बहुत बहुत ही खूब!!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. मैंने सोचा पढ़कर देखूँ
    लेकिन वो 'संजय' था.

    .... अंधों को जब 'संजय' सहजता से मिलते हों तब आँखों की चाहना नहीं रहती.

    उत्तर देंहटाएं
  7. @Pratul vashisht
    वैसे विज़नविहीन आंखवालों को दुष्यंत का शेर ऑलरेडी समर्पित हैः
    रोशन हुए चराग़ तो आंखें नहीं रहीं
    अंधों को रोशनी का गुमां और भी ख़राब।

    उत्तर देंहटाएं
  8. usko to khud se bhay thaa.bahut sundar gajal padvaee hai aapne,badhai deta hoon.

    उत्तर देंहटाएं
  9. मुकुट बिहारी सरोज की पंक्तियां हैं-
    अक्षरों को अंक करके रख दिया है
    तुम कसम से खूब साहूकार हो

    उत्तर देंहटाएं
  10. kyaa baat hai,
    aaj pehli baar aapka blog padaa
    dil keh oothaa..

    VAAH !!

    mujh ko kuchh kuchh Ganit lagaa,
    vo kehtaa hai parinay thaa..

    kitnee calculative, correct, and related to life thaught hai....just wow....

    with your due permission i am inspired to write further :-



    Pyaar vo andhaa kaisaa thaa
    ootraa chashmaa tab saaf dikhaa....


    Regards.
    -renu ahuja.

    उत्तर देंहटाएं
  11. नज़र जो कर सकती है दोस्त
    कैसे कर लेगा चश्मा!? :-)

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कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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