No east or west,mumbaikar or bihaari, hindu/muslim/sikh/christian /dalit/brahmin… for me.. what I believe in logic, rationality and humanity...own whatever the good, the logical, the rational and the human here and leave the rest.
Monday, December 21, 2009
उदारता क्या है ?
लगभग सभी धर्मों के मानने वाले यह दावा करते हैं कि धर्म इंसान को उदार, सहिष्णु और मानवीय बनाता है। मेरे मन में अकसर कुछ सवाल उठते हैं। चूंकि मैंने इन सवालों को आज तक किसी दूसरी जगह नहीं पढ़ा, इसलिए मन हुआ कि इन्हें आपके सामने रखूं। यह मेरी एकतरफा सोच हो सकती है कि ये सवाल भी व्यक्ति को उदार बनाने की दिशा में ही एक छोटा-मोटा क़दम हो सकते हैं। इसलिए आपकी राय भी इन सवालों को प्रासंगिक या अप्रासंगिक बनाएगी। बचपन से लेकर आज तक कई तरह के आस्तिकों और नास्तिकों से वास्ता रहा है। मुझ एक भी उदाहरण याद नहीं आता जब किसी नास्तिक ने किसी आस्तिक पड़ोसी पर एतराज़ किया हो, झगड़ा किया हो कि जागरन, कीर्तन या नमाज मेरे विश्वासों के खि़लाफ है इसलिए आप इसे करना बंद कर दें। हालांकि बारीकी से अघ्ययन करें तो कोई दो नास्तिक या दो आस्तिक भी बिलकुल एक जैसे नहीं होते। मैंने कभी अखबार में नहीं पढ़ा या रेडियो-टी.वी. पर नहीं देखा-सुना कि नास्तिकों का कोई गुट क्रोघित होकर भागा गया हो और उसने आस्तिकों के किसी आयोजन में जाकर तोड़-फोड़ की हो। मेरे सुनने में आज तक नहीं आया कि ‘लिव इन’ करने वाजे युवाओं या विवाह संस्था में विश्वास न करने वाले लोगों ने शादीशुदा लोगों पर जाकर दबाव डाला हो कि आप अपनी शादी तोड़ दें नहीं तो हम आपको पीटेंगे, आपका मुंह काला करेंगे। वेलेटाइन मनाने वाले या प्यार करने वाले लोगों ने कभी किसी को धमकाया हो कि आप सब भी ये सब करो नहीं तो आप पागल हो, हास्यास्पद हो, समाज विरोधी हो और आप फलां मोहल्ला, शहर, देश, प्रदेश छोड़ कर चले जाओ। क्या आपने कभी सुना है कि किसी स्कर्ट या नेकर पहनने वाले ने कहा है कि कुत्र्ता-पायजामा, धोती-बंडी जैसे कपड़े अश्लील हैं, हमारे जैसे कपड़े पहनो नहीं तो हम तुम्हारे कपड़े फाड़ डालेंगे, ये-वो कर देंगे ! क्या आपने कभी सुना कि वस्त्र-विहीन आकृतियां बनाने वाले किसी पेण्टर ने या उसके समर्थकों ने वस्त्रदार पेण्टिग बनाने वालों पर आपत्ति की हो, उनकी पेण्टिग फाड़ डालीं हों ! पक्ष-विपक्ष में कई उदाहरण रखे जा सकते हैं। पर मुझे लगता है कि मेरी बात स्पष्ट हो गयी है और ज़्यादा शब्द या जगह ख़र्च करने का कोई अर्थ नहीं है।
इस लेखक की ज़िंदगी का अधिकांश हिस्सा कुत्र्ता-पायजामा, हवाई चप्पल और सायकिल के साथ बीता है पर इसे किसी के भी कुछ और पहनने-ओढ़ने-चलाने पर कोई आपत्ति नहीं है।
उम्मीद है उदारता को लेकर दृष्टि विकसित करने में आप मेरी मदद करेंगे।
-संजय ग्रोवर
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Friday, December 18, 2009
कुछ खुरदुरी-सी दो ग़ज़लें/लगभग बुरी-सी दो ग़ज़लें
ग़ज़ल
जोकि ये समझ रहे हैं मुझे कुछ पता नहीं है
उन्हें जाके ये बता दो उन्हें ख़ुद पता नहीं है
यूंही ख्वाहमख्वाह ही डरके कोई बात मान लेना
इसे तुम हया न समझो, हरगिज़ हया नहीं है
दुत्कारना दलित को, चालू को चाट लेना
जो इसी को जीत समझे कभी जीत़ता नहीं है
वो जो सामने न आए, तू उसी से बचके रहना
वो ज़रुर काट लेगा कि जो भौंकता नहीं है
चालू से मिला चालू, साजिश को कैसे टालूं
यंूकि तुम भी बैठे गाफ़िल, वो कि पूछता नहीं है
उसे सर्द-गर्म कैसा, वो तो खा रहा है पैसा
उसे क्यूं पसीने छूटें, वो जो कांपता नहीं है
इसी रास्ते से मैं क्यों कोई रास्ता निकालूं !
मेरे वास्ते जगत में, क्या रास्ता नहीं है !?
2.
दिखा जो उनको कीचड़,
लिथड़ गए सब लीचड़
ठग-वग की जगमग से,
चमक रहा है प्रांगण
पढ़े-लिखे नंगों से
सहम गए हैं अनपढ़
फ्यूज़-उड़े-कट-आउट
कड़क रहे हैं कड़-कड़
ये रुटीन-रोज़ाना-
तुम कहते हो गड़बड़ !?
कथित 'उच्चता' गुड़-गुड़,
’योग्य’ मक्खियां भड़-भड़
रटो रदीफ़ो रट-रट,
सड़ो काफ़ियो सड़-सड़
-संजय ग्रोवर
जोकि ये समझ रहे हैं मुझे कुछ पता नहीं है
उन्हें जाके ये बता दो उन्हें ख़ुद पता नहीं है
यूंही ख्वाहमख्वाह ही डरके कोई बात मान लेना
इसे तुम हया न समझो, हरगिज़ हया नहीं है
दुत्कारना दलित को, चालू को चाट लेना
जो इसी को जीत समझे कभी जीत़ता नहीं है
वो जो सामने न आए, तू उसी से बचके रहना
वो ज़रुर काट लेगा कि जो भौंकता नहीं है
चालू से मिला चालू, साजिश को कैसे टालूं
यंूकि तुम भी बैठे गाफ़िल, वो कि पूछता नहीं है
उसे सर्द-गर्म कैसा, वो तो खा रहा है पैसा
उसे क्यूं पसीने छूटें, वो जो कांपता नहीं है
इसी रास्ते से मैं क्यों कोई रास्ता निकालूं !
मेरे वास्ते जगत में, क्या रास्ता नहीं है !?
2.
दिखा जो उनको कीचड़,
लिथड़ गए सब लीचड़
ठग-वग की जगमग से,
चमक रहा है प्रांगण
पढ़े-लिखे नंगों से
सहम गए हैं अनपढ़
फ्यूज़-उड़े-कट-आउट
कड़क रहे हैं कड़-कड़
ये रुटीन-रोज़ाना-
तुम कहते हो गड़बड़ !?
कथित 'उच्चता' गुड़-गुड़,
’योग्य’ मक्खियां भड़-भड़
रटो रदीफ़ो रट-रट,
सड़ो काफ़ियो सड़-सड़
-संजय ग्रोवर
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Sunday, December 6, 2009
ऐ आगंतुक ख़लल न डाल
ईमानदारी एक रणनीति है
होने से ज़्यादा ज़रूरी है दिखना
दोस्ती एक मजबूरी है
जीने के लिए
कोई न कोई शगल
ज़रूरी है
स्वाभिमान एक लहंगा है
हालांकि पड़ता बड़ा मंहगा है
और हालात की हवा भी है
बहुत तेज़
विनम्रता एक चालाकी है
ज़्यादा कसके पकड़ो तो
हाथ से छूट जाती है
बची-खुची को कहना पड़ता
अपनी बेबाक़ी है
संबंधों के ड्राइंग-रूम में
सजी हैं
घर की सबसे सुंदर और बनावटी चीज़ें
अरे ये कौन घुस आया कमरे में
मासूम सा दिखता आदमी
इसे तो कोई अनुभव ही नहीं जीवन का
आईए इंतज़ार करें और कोशिश करें
धीरे-धीरे यह भी हमारे जैसा हो जाए
और निश्चिंतता से जी सकें हम
अपनी बची-खुची
ज़िंदगी!?
-संजय ग्रोवर
होने से ज़्यादा ज़रूरी है दिखना
दोस्ती एक मजबूरी है
जीने के लिए
कोई न कोई शगल
ज़रूरी है
स्वाभिमान एक लहंगा है
हालांकि पड़ता बड़ा मंहगा है
और हालात की हवा भी है
बहुत तेज़
विनम्रता एक चालाकी है
ज़्यादा कसके पकड़ो तो
हाथ से छूट जाती है
बची-खुची को कहना पड़ता
अपनी बेबाक़ी है
संबंधों के ड्राइंग-रूम में
सजी हैं
घर की सबसे सुंदर और बनावटी चीज़ें
अरे ये कौन घुस आया कमरे में
मासूम सा दिखता आदमी
इसे तो कोई अनुभव ही नहीं जीवन का
आईए इंतज़ार करें और कोशिश करें
धीरे-धीरे यह भी हमारे जैसा हो जाए
और निश्चिंतता से जी सकें हम
अपनी बची-खुची
ज़िंदगी!?
-संजय ग्रोवर
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Tuesday, December 1, 2009
गालियों और लात-घूंसों के साथ जूठन भी प्राकृतिक स्वभाव !?
मटुकजूली के ब्लाग से चली यह बहस रा. सहारा और गीताश्री के ब्लाग से होती हुई मुझ तक आ पहुंची है क्यांकि एक टिप्पणी मटुक जूली के ब्लाग पर मैंने की थी। जिसपर उन्होंने अपने विचार रखे और उनपर मैं अपने रख रहा हूं।
(तकनीकी कारणों से यह मटुकजूली ब्लाग पर पोस्ट नहीं हो पा रही है। अपने और दूसरे ब्लाग पर डाल रहा हूं।)
प्रिय मटुकजूली जी,
कृपया इस ’प्रिय’ शब्द के कोई विशेष अर्थ न निकालें, यह कामचलाऊ भाषागत शिष्टाचार है, जिसका मैं खामख्वाह विरोध नहीं करना चाहता। चूंकि आपने ‘अपनत्व के छिलके’ शब्दों का प्रयोग किया इसलिए यह सावधानी बरतनी पड़ रही है। मैंने किसी विशेष अर्थ में आपके साथ ‘अपनत्व’ का कोई दावा किया हो, मुझे तो याद नहीं। हां, इस भीड़वादी समाज में दो लोग और निकलकर आए जिनके पास अपने कुछ विचार हैं और उन्हें सलीके से कहने का हौसला भी वे रखते हैं, इस नाते अपने से मिलते-जुलते स्वभाव और विचारों के लोगों को प्रोत्साहित करने की जो भावना मन में उठती है, वह ज़रुर कारण बनी। अब आप इसका अर्थ यह भी मत लगा लीजिए कि किसी का या मेरा प्रोत्साहन नहीं होगा तो आप कुछ कर नहीं पाएंगे। बिलकुल करेंगे। ऐसे प्रोत्साहन का एक कारण प्रोत्साहन देने वाले का अपना अकेलापन भी होता है जिसके चलते ही वह इस ज़रुरत को समझ पाता है कि उसके जैसे लोगों को प्रेरणा, प्रोत्साहन और नैतिक समर्थन की कितनी ज़रुरत होती है। इसका अर्थ कोई यह भी न लगा ले कि मैं हर उस आदमी का समर्थक हूं जो भीड़ से अलग या भीड़ के खिलाफ़ कुछ भी कर रहा है। देखना होता है कि उसके ऐसा करने की वजह क्या है, उससे समाज में किस तरह का बदलाव आने की संभावना है।
आपका धन्यवाद कि आपने इतने धैर्य और सदाशयता के साथ मेरी टिप्पणी पर अपने विचार रखे। कलको गीताश्री भी मेरी उस सहमति पर आपत्ति उठा सकतीं हैं जो मैंने आपके कुछ विचारों पर व्यक्त की है। मैं उनका भी स्वागत करुंगा। आखिर यही तो वैचारिक और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसके लिए मैं, आप, गीताश्री और हमारे जैसे लोग एक जगह बनाना चाहते हैं। पर कभी-कभी आप अतिरेक में चले जाते हैं (हो सकता है मैं भी जाता होऊं और जब ऐसा हो तो आप मुझे भी टोकिएगा) और बातों को अपने अर्थ दे देते हैं। आप मुझे मेरी अगली-पिछली टिप्पणियों में से एक वाक्य निकाल कर दिखाईए जिससे यह पता चलता हो कि मैं आपको तुलसीदास से वंचित रखना चाहता हूं ! हां, किसी कवि, लेखक, चिंतक या दार्शनिक को पसंद करने के सबके अपने-अपने कारण होते हैं। आपके भी हैं, मेरे भी हैं। मुझे वे लोग अच्छे लगते हैं जो आम आदमी को समझ में आने वाली भाषा में बदलाव की बात करते हैं, रुढ़ियों और कुप्रथाओं के खिलाफ लिखते हैं। मुझे सौंदर्य इसी में नज़र आता है। चरित्र-चित्रण की बात है तो क्या आप यह मानते हैं कि ऐसा करते हुए लेखक के अपने पूर्वाग्रह आड़े नहीं आते होगे ! अगर मुझे घुट्टी में ही औरत से, कमज़ोर और वंचित से (सर्वावाइल आफ द फिटेस्ट !) नफ़रत सिखाई गयी है तो मैं उक्त सबका चरित्र-चित्रण बिना पूर्वाग्रहों के कैसे कर पाऊंगा !? और माफ़ कीजिए, मैं इस आधार पर किसीके बारे में अपनी राय नहीं बना सकता कि उसे रवींद्रनाथ टैगोर या बर्नार्ड शा पसंद करते थे कि नहीं करते थे। मैं किसी को पढ़ता हूं तो सीधे-सीधे पढ़ता हूं। मुझे एक लेखक की कोई बात जम रही है मगर चूंकि जयशंकर प्रसाद या अरुंधति राय को नहीं जमी इसलिए मैं भी विरोध करुं, मेरी समझ से कतई बाहर है। मुझे तो अत्यंत हैरानी है कि ऐसी बातें आप कह रहे हैं ! अभी कल ही कहीं पढ़ रहा था कि मिर्ज़ा ग़ालिब मीर के बड़े प्रशंसक थे। अब मैं इसका क्या करुं कि ग़ालिब मुझे अत्यंत प्रिय हैं, मीर समझ में नहीं आते। हांलांकि मीर मेरी इस कसौटी पर खरे हैं कि उनकी भाषा ग़ालिब की तुलना में आसान है। मगर इधर ग़ालिब ने व्यक्ति और समाज के मनोविज्ञान को जिस तरह समझा है, उधर दिखाई नहीं पड़ता। मेरी समझ में आज भी हमारे समाज को आसान भाषा में खरी-खरी कहने वाले लेखकों-चिंतकों की ज़रुरत है क्यों कि कबीरदास के ‘माला फेरत जुग भया‘ और ‘ता चढ़ मुल्ला बांग दे’ के बावज़ूद हमारा समाज वहीं का वहीं पड़ा है। कबीरदास के ऐसे दो-चार दोहे ज़रुर हमारे कोर्स की क़िताबों में हैं मगर कबीर, बुद्ध या चार्वाक के वास्तविक विचारों से हमारा आम आदमी ठीक से परिचित नहीं है या उसे होने नहीं दिया गया। ओशो का भी मैं प्रेमी हूं और मनसा आनंद जी के ब्लाग पर आजकल उनका ‘‘स्वर्णिम बचपन’’ पढ़ रहा हूं। लेकिन जैसे ही पूर्व-जन्म, अध्यात्म, आत्मा, ईश्वर, गुरु में अंधी श्रद्धा जैसे प्रसंग आते हैं, बात मेरी समझ से बाहर चली जाती है। किसी भी लेखक या चिंतक का लिखा-कहा सब कुछ कैसे सही हो सकता है !? मेरे दिमाग में तो यह बात कभी अट नहीं पायी। आपको मेरी या मुझे आपकी भी सारी बातें कहां जम रही हैं। तय परिभाषाओं के हिसाब से आप और मैं बड़े लेखक हों न हों, दोनों एक-दूसरे को तो कुछ-ना-कुछ समझ ही रहे थे।
औरतों-मर्दों के प्राकृतिक गुणों पर आते हैं। आपने बताया कि आपने परिवार में हमेशा औरतों को मिल-बांट कर खाते देखा। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है। होनी भी क्यों चाहिए !? यहां एक मुसीबत यह भी तो है कि जो मिल-बांटकर नहीं खाएगी, आप तय कर देंगे कि यह तो औरत ही नहीं है। मुझे कुछ उदाहरण याद आते हैं। जब पिता किसी व्यवसायिक कार्य से रातों को बाहर जाया करते तो मां रात को घर में सोने के लिए किसी पुरुष रिश्तेदार को बुला लिया करतीं थीं। हांलांकि घर में हम छः छः बच्चे भी होते थे और थोड़े साहसी और व्यवहारिक हों तो एक-दो चोरों से निपटने के लिए कम नहीं होते। मगर उस मानसिक-सांस्कारिक कमज़ोरी का आप क्या करेगे जो स्त्रियों और कुछ बच्चों को परिवेश से मिली होती है। अब जिस पुरुष रिश्तेदार को बुलाया जाता था ज़ाहिर है कि उसकी अच्छी आवभगत भी होती थी। अब मैं और आप कैसे तय करेंगे कि यह मिल-बांट कर खाना था या कुछ और था !? जब मैं स्त्रियों और उनकी समस्याओं के प्रति न के बराबर संवेदनशील था तब भी नोट करता था कि मां हमेशा बासी चीज़ें खातीं थीं। घर की आर्थिक स्थिति कुछ खराब भी नहीं थीं। पिता ने भी कभी मां से ऐसी कोई टोका-टाकी नहीं की थी कभी। मगर मां जब भी अच्छा या महंगा कुछ खातीं तो तब जब घर में कोई सामने न हो या रसोई के एक कोने में छुपकर खातीं थीं। कोई चाहे तो इसे त्याग कह सकता है मगर मेरी समझ में सामाजिक-पारिवारिक-सांस्कारिक परिवेश से मिले अपराध-बोध और हीन-भावनाएं सीधे-सीधे इसके पीछे थीं। कमाल की बात कि मुझे भी एक रिश्तेदार महिला ने एक-दो बार रात सोने के लिए बुलाया जब उनके पतिदेव बाहर गएं। भाभी और उनकी बिटिया ठीक-ठाक ताकतवर थीं। जहां तक शारीरिक ताकत की बात है तो वे महिला अगर मुझे एक धक्का मारतीं तो मैं दो-चार कदम दूर जाकर ही गिरता। मगर संस्कारों की घुट्टी में मिली मानसिक कमज़ोरी का क्या करें !
और स्त्रियां तो बांटकर खातीं हैं मगर हमारे दलित-हरिजन-वंचित-पिछड़े ! वे तो गालियों और लात-घूंसों के साथ जूठन खाते आएं हैं। इसे भी उनका प्राकृतिक स्वभाव कहेंगे आप !? उनकी बुद्धि भी ‘भटक’ गयी है जो वे अपने हक मांग रहे हैं। मेरा कहना आपसे यही था कि हम पहले ठीक से तय तो कर लें कि क्या प्राकृतिक है और क्या समाज-व्यवस्था द्वारा लादा गया है। इसमें मेरी या आपकी उम्र से कोई लेना-देना नहीं था। हज़ारों सालों की तयशुदा परिभाषाओं में से बहुत सी स्त्री के संदर्भ में ग़लत साबित पड़ती जा रही हैं, इसलिए आप तो जल्दी न करें। मेरा निवेदन यह था। शारीरिक ताकत की बात करें तो क्या सारे पुरुष फौज में भर्ती होने के क़ाबिल होते हैं !? वे पुरुष भी जो पुस्तकों के लोकार्पण और वैचारिक अभिव्यक्ति पर लोगों को पीट-पीटकर मार डालते हैं, आतंकवादियों के हमलों के वक्त गायब हो जाते हैं। एक वक्त होता था जब हम साफ-साफ देखा करते थे कि आस्ट्रेलिया जैसे देशों की (महिला) खिलाड़िनें भी हमारे जैसे देशों के (पुरुष) खिलाड़ियों से कद-बुत और दम-खम में बेहतर होतीं थीं। आज हमारे देश की बहुत सी स्त्रियां बहुत से ऐसे काम कर रहीं हैं जो उनके लिए असंभव घोषित कर दिए गए थे। सीधी बात है कि जो महिलाएं ख़ुदको आधी रात को घूमने या फायटर पायलट बनने के अनुकूल पाएंगी वे निभा ले जाएंगी बाकी अपने दूसरे कामों में लगेंगी। नौकरी करने के लिए महिलाएं हों या पुरुष दोनों ही को कुछ न कुछ त्याग तो करने पड़ते ही हैं। आधी रात को घूमने की बात है तो दो ही इलाज हैं कि या तो हम समाज को इतना खुला और कुण्ठामुक्त बनाएं कि रात को उनका घूमना सामान्य बात हो जाए या उन्हें ज़िंदगी भर दबा-छुपाकर रखते रहें। आधी रात को घूमने में कई खतरे आखिर पुरुष को भी रहते हैं। आपको और मुझे भी अपनी बात कहते हुए तरह-तरह के खतरे होते हैं, तो क्या हम अपनी बात कहना छोड़ देते हैं !?
कुछ स्त्री-संगठनों ने आपके प्रसंग में जिस तरह के तर्क दिए मुझे जमे नहीं थे। लेकिन स्त्री-संगठनों की उपयोगिता से मैं इन्कार नहीं कर सकता। हो सकता है कुछ स्त्रियां अतिरेक में जाकर तो कुछ आर्थिक कारणों से कई बार ग़लत बातें कर देती हों मगर हमारे समाज में अभी तक वह माहौल नहीं बन पाया कि जहां स्त्री-संगठनों की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाए। मैं तो आरक्षण के भी खिलाफ हूं पर मेरे नज़दीक यह बिलकुल साफ है कि बिना आरक्षण के इस समाज में दलितों-वंचितों की स्थिति कतई बदलने वाली नहीं थी। ओशो भी संगठन या संस्थाबाज़ी के खि़लाफ थे पर अंततः उन्हें भी एक कामचलाऊ जमावड़ा बनाना पड़ा।
35 और 24 में भारतेंदु और भगतसिंह काफी कुछ कह गये लेकिन सब कुछ नहीं कह गए। बहुत कुछ अभी कहने को भी बाकी है और दोहराए जाने को भी।
-संजय ग्रोवर
(तकनीकी कारणों से यह मटुकजूली ब्लाग पर पोस्ट नहीं हो पा रही है। अपने और दूसरे ब्लाग पर डाल रहा हूं।)
प्रिय मटुकजूली जी,
कृपया इस ’प्रिय’ शब्द के कोई विशेष अर्थ न निकालें, यह कामचलाऊ भाषागत शिष्टाचार है, जिसका मैं खामख्वाह विरोध नहीं करना चाहता। चूंकि आपने ‘अपनत्व के छिलके’ शब्दों का प्रयोग किया इसलिए यह सावधानी बरतनी पड़ रही है। मैंने किसी विशेष अर्थ में आपके साथ ‘अपनत्व’ का कोई दावा किया हो, मुझे तो याद नहीं। हां, इस भीड़वादी समाज में दो लोग और निकलकर आए जिनके पास अपने कुछ विचार हैं और उन्हें सलीके से कहने का हौसला भी वे रखते हैं, इस नाते अपने से मिलते-जुलते स्वभाव और विचारों के लोगों को प्रोत्साहित करने की जो भावना मन में उठती है, वह ज़रुर कारण बनी। अब आप इसका अर्थ यह भी मत लगा लीजिए कि किसी का या मेरा प्रोत्साहन नहीं होगा तो आप कुछ कर नहीं पाएंगे। बिलकुल करेंगे। ऐसे प्रोत्साहन का एक कारण प्रोत्साहन देने वाले का अपना अकेलापन भी होता है जिसके चलते ही वह इस ज़रुरत को समझ पाता है कि उसके जैसे लोगों को प्रेरणा, प्रोत्साहन और नैतिक समर्थन की कितनी ज़रुरत होती है। इसका अर्थ कोई यह भी न लगा ले कि मैं हर उस आदमी का समर्थक हूं जो भीड़ से अलग या भीड़ के खिलाफ़ कुछ भी कर रहा है। देखना होता है कि उसके ऐसा करने की वजह क्या है, उससे समाज में किस तरह का बदलाव आने की संभावना है।
आपका धन्यवाद कि आपने इतने धैर्य और सदाशयता के साथ मेरी टिप्पणी पर अपने विचार रखे। कलको गीताश्री भी मेरी उस सहमति पर आपत्ति उठा सकतीं हैं जो मैंने आपके कुछ विचारों पर व्यक्त की है। मैं उनका भी स्वागत करुंगा। आखिर यही तो वैचारिक और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसके लिए मैं, आप, गीताश्री और हमारे जैसे लोग एक जगह बनाना चाहते हैं। पर कभी-कभी आप अतिरेक में चले जाते हैं (हो सकता है मैं भी जाता होऊं और जब ऐसा हो तो आप मुझे भी टोकिएगा) और बातों को अपने अर्थ दे देते हैं। आप मुझे मेरी अगली-पिछली टिप्पणियों में से एक वाक्य निकाल कर दिखाईए जिससे यह पता चलता हो कि मैं आपको तुलसीदास से वंचित रखना चाहता हूं ! हां, किसी कवि, लेखक, चिंतक या दार्शनिक को पसंद करने के सबके अपने-अपने कारण होते हैं। आपके भी हैं, मेरे भी हैं। मुझे वे लोग अच्छे लगते हैं जो आम आदमी को समझ में आने वाली भाषा में बदलाव की बात करते हैं, रुढ़ियों और कुप्रथाओं के खिलाफ लिखते हैं। मुझे सौंदर्य इसी में नज़र आता है। चरित्र-चित्रण की बात है तो क्या आप यह मानते हैं कि ऐसा करते हुए लेखक के अपने पूर्वाग्रह आड़े नहीं आते होगे ! अगर मुझे घुट्टी में ही औरत से, कमज़ोर और वंचित से (सर्वावाइल आफ द फिटेस्ट !) नफ़रत सिखाई गयी है तो मैं उक्त सबका चरित्र-चित्रण बिना पूर्वाग्रहों के कैसे कर पाऊंगा !? और माफ़ कीजिए, मैं इस आधार पर किसीके बारे में अपनी राय नहीं बना सकता कि उसे रवींद्रनाथ टैगोर या बर्नार्ड शा पसंद करते थे कि नहीं करते थे। मैं किसी को पढ़ता हूं तो सीधे-सीधे पढ़ता हूं। मुझे एक लेखक की कोई बात जम रही है मगर चूंकि जयशंकर प्रसाद या अरुंधति राय को नहीं जमी इसलिए मैं भी विरोध करुं, मेरी समझ से कतई बाहर है। मुझे तो अत्यंत हैरानी है कि ऐसी बातें आप कह रहे हैं ! अभी कल ही कहीं पढ़ रहा था कि मिर्ज़ा ग़ालिब मीर के बड़े प्रशंसक थे। अब मैं इसका क्या करुं कि ग़ालिब मुझे अत्यंत प्रिय हैं, मीर समझ में नहीं आते। हांलांकि मीर मेरी इस कसौटी पर खरे हैं कि उनकी भाषा ग़ालिब की तुलना में आसान है। मगर इधर ग़ालिब ने व्यक्ति और समाज के मनोविज्ञान को जिस तरह समझा है, उधर दिखाई नहीं पड़ता। मेरी समझ में आज भी हमारे समाज को आसान भाषा में खरी-खरी कहने वाले लेखकों-चिंतकों की ज़रुरत है क्यों कि कबीरदास के ‘माला फेरत जुग भया‘ और ‘ता चढ़ मुल्ला बांग दे’ के बावज़ूद हमारा समाज वहीं का वहीं पड़ा है। कबीरदास के ऐसे दो-चार दोहे ज़रुर हमारे कोर्स की क़िताबों में हैं मगर कबीर, बुद्ध या चार्वाक के वास्तविक विचारों से हमारा आम आदमी ठीक से परिचित नहीं है या उसे होने नहीं दिया गया। ओशो का भी मैं प्रेमी हूं और मनसा आनंद जी के ब्लाग पर आजकल उनका ‘‘स्वर्णिम बचपन’’ पढ़ रहा हूं। लेकिन जैसे ही पूर्व-जन्म, अध्यात्म, आत्मा, ईश्वर, गुरु में अंधी श्रद्धा जैसे प्रसंग आते हैं, बात मेरी समझ से बाहर चली जाती है। किसी भी लेखक या चिंतक का लिखा-कहा सब कुछ कैसे सही हो सकता है !? मेरे दिमाग में तो यह बात कभी अट नहीं पायी। आपको मेरी या मुझे आपकी भी सारी बातें कहां जम रही हैं। तय परिभाषाओं के हिसाब से आप और मैं बड़े लेखक हों न हों, दोनों एक-दूसरे को तो कुछ-ना-कुछ समझ ही रहे थे।
औरतों-मर्दों के प्राकृतिक गुणों पर आते हैं। आपने बताया कि आपने परिवार में हमेशा औरतों को मिल-बांट कर खाते देखा। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है। होनी भी क्यों चाहिए !? यहां एक मुसीबत यह भी तो है कि जो मिल-बांटकर नहीं खाएगी, आप तय कर देंगे कि यह तो औरत ही नहीं है। मुझे कुछ उदाहरण याद आते हैं। जब पिता किसी व्यवसायिक कार्य से रातों को बाहर जाया करते तो मां रात को घर में सोने के लिए किसी पुरुष रिश्तेदार को बुला लिया करतीं थीं। हांलांकि घर में हम छः छः बच्चे भी होते थे और थोड़े साहसी और व्यवहारिक हों तो एक-दो चोरों से निपटने के लिए कम नहीं होते। मगर उस मानसिक-सांस्कारिक कमज़ोरी का आप क्या करेगे जो स्त्रियों और कुछ बच्चों को परिवेश से मिली होती है। अब जिस पुरुष रिश्तेदार को बुलाया जाता था ज़ाहिर है कि उसकी अच्छी आवभगत भी होती थी। अब मैं और आप कैसे तय करेंगे कि यह मिल-बांट कर खाना था या कुछ और था !? जब मैं स्त्रियों और उनकी समस्याओं के प्रति न के बराबर संवेदनशील था तब भी नोट करता था कि मां हमेशा बासी चीज़ें खातीं थीं। घर की आर्थिक स्थिति कुछ खराब भी नहीं थीं। पिता ने भी कभी मां से ऐसी कोई टोका-टाकी नहीं की थी कभी। मगर मां जब भी अच्छा या महंगा कुछ खातीं तो तब जब घर में कोई सामने न हो या रसोई के एक कोने में छुपकर खातीं थीं। कोई चाहे तो इसे त्याग कह सकता है मगर मेरी समझ में सामाजिक-पारिवारिक-सांस्कारिक परिवेश से मिले अपराध-बोध और हीन-भावनाएं सीधे-सीधे इसके पीछे थीं। कमाल की बात कि मुझे भी एक रिश्तेदार महिला ने एक-दो बार रात सोने के लिए बुलाया जब उनके पतिदेव बाहर गएं। भाभी और उनकी बिटिया ठीक-ठाक ताकतवर थीं। जहां तक शारीरिक ताकत की बात है तो वे महिला अगर मुझे एक धक्का मारतीं तो मैं दो-चार कदम दूर जाकर ही गिरता। मगर संस्कारों की घुट्टी में मिली मानसिक कमज़ोरी का क्या करें !
और स्त्रियां तो बांटकर खातीं हैं मगर हमारे दलित-हरिजन-वंचित-पिछड़े ! वे तो गालियों और लात-घूंसों के साथ जूठन खाते आएं हैं। इसे भी उनका प्राकृतिक स्वभाव कहेंगे आप !? उनकी बुद्धि भी ‘भटक’ गयी है जो वे अपने हक मांग रहे हैं। मेरा कहना आपसे यही था कि हम पहले ठीक से तय तो कर लें कि क्या प्राकृतिक है और क्या समाज-व्यवस्था द्वारा लादा गया है। इसमें मेरी या आपकी उम्र से कोई लेना-देना नहीं था। हज़ारों सालों की तयशुदा परिभाषाओं में से बहुत सी स्त्री के संदर्भ में ग़लत साबित पड़ती जा रही हैं, इसलिए आप तो जल्दी न करें। मेरा निवेदन यह था। शारीरिक ताकत की बात करें तो क्या सारे पुरुष फौज में भर्ती होने के क़ाबिल होते हैं !? वे पुरुष भी जो पुस्तकों के लोकार्पण और वैचारिक अभिव्यक्ति पर लोगों को पीट-पीटकर मार डालते हैं, आतंकवादियों के हमलों के वक्त गायब हो जाते हैं। एक वक्त होता था जब हम साफ-साफ देखा करते थे कि आस्ट्रेलिया जैसे देशों की (महिला) खिलाड़िनें भी हमारे जैसे देशों के (पुरुष) खिलाड़ियों से कद-बुत और दम-खम में बेहतर होतीं थीं। आज हमारे देश की बहुत सी स्त्रियां बहुत से ऐसे काम कर रहीं हैं जो उनके लिए असंभव घोषित कर दिए गए थे। सीधी बात है कि जो महिलाएं ख़ुदको आधी रात को घूमने या फायटर पायलट बनने के अनुकूल पाएंगी वे निभा ले जाएंगी बाकी अपने दूसरे कामों में लगेंगी। नौकरी करने के लिए महिलाएं हों या पुरुष दोनों ही को कुछ न कुछ त्याग तो करने पड़ते ही हैं। आधी रात को घूमने की बात है तो दो ही इलाज हैं कि या तो हम समाज को इतना खुला और कुण्ठामुक्त बनाएं कि रात को उनका घूमना सामान्य बात हो जाए या उन्हें ज़िंदगी भर दबा-छुपाकर रखते रहें। आधी रात को घूमने में कई खतरे आखिर पुरुष को भी रहते हैं। आपको और मुझे भी अपनी बात कहते हुए तरह-तरह के खतरे होते हैं, तो क्या हम अपनी बात कहना छोड़ देते हैं !?
कुछ स्त्री-संगठनों ने आपके प्रसंग में जिस तरह के तर्क दिए मुझे जमे नहीं थे। लेकिन स्त्री-संगठनों की उपयोगिता से मैं इन्कार नहीं कर सकता। हो सकता है कुछ स्त्रियां अतिरेक में जाकर तो कुछ आर्थिक कारणों से कई बार ग़लत बातें कर देती हों मगर हमारे समाज में अभी तक वह माहौल नहीं बन पाया कि जहां स्त्री-संगठनों की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाए। मैं तो आरक्षण के भी खिलाफ हूं पर मेरे नज़दीक यह बिलकुल साफ है कि बिना आरक्षण के इस समाज में दलितों-वंचितों की स्थिति कतई बदलने वाली नहीं थी। ओशो भी संगठन या संस्थाबाज़ी के खि़लाफ थे पर अंततः उन्हें भी एक कामचलाऊ जमावड़ा बनाना पड़ा।
35 और 24 में भारतेंदु और भगतसिंह काफी कुछ कह गये लेकिन सब कुछ नहीं कह गए। बहुत कुछ अभी कहने को भी बाकी है और दोहराए जाने को भी।
-संजय ग्रोवर
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