Wednesday, June 24, 2009

व्यंग्य-कक्ष में ‘आदरणीय जीजाजी’

सभ्य समाज में आदर झटकने के जो कुछेक तरीके मुझे जंचे हैं उनमें से एक है किसी का दामाद हो जाना। जिस घर के आप दामाद हो गए, अगर थोड़ी देर के लिए उस घर को हम राष्ट्र मान लें तो समझिए कि उस घर में आपकी हैसियत राष्ट्रपति जितनी हो जाती है। भारत के राष्ट्रपति जैसी नहीं कि जिसके पास ताम-झाम तो होता है पर काम-धाम नहीं होता। आप तो कम से कम अगला दामाद आ जाने तक, अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह होते हैं जिसे कि भरे-पूरे अधिकार भी प्राप्त होते हैं।
आप सिर्फ दामाद ही नहीं होते, आप जीजाजी भी होते हैं। भारत में जीजाजी होना यानि कि हवा के घोड़े पर सवारी गांठना। यानि कि जलवों के हलवों पर जीभ लपोरते रहना। यानि कि भले ही पूरी दुनिया में आपको कोई न पूछे मगर एक घर सदा ऐसा होता है जो लाल कालीन बिछाए आपके स्वागत को सूखता रहता है। वहां घुसते ही आप महान हो जाते हैं। क्रिकेट की भाषा में कहें तो पिद्दी से पिद्दी बल्लेबाज के लिए भी दुनिया में कम से कम एक पिच तो ऐसी होती है जहां खेलना शुरू करते ही उसके जीवन की पारी जम जाती है।
जीजाजी होने की सुविधापूर्ण स्थिति को तो बड़े-बड़े कवियों ने भी कल्पनाओं तक के कद्दू-कस में कस कर खूब लच्छे बनाए भी हैं और बेचे भी हैं। भारतीय सभ्यता संस्कृति के अनुसार नारी की मर्यादा की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन कुर्बान कर देने वाले कई बुजुर्ग कवियों ने सालियों की सुंदरता, उनके स्वभावों की चपलता, उनके साथ अपने सभी प्रकार के सम्बन्धों की स्वायत्तता, स्वतंत्रता, उनकी विभिन्न प्रकार के क्रियाकलापों में कर्मठता, अपने जीजाओं के प्रति उनकी कत्र्तव्यनिष्ठा आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए अत्यन्त सुन्दर व सार्थक साहित्य का सृजन किया है।
यानि कि साली न हुई आपकी गली के पिछवाड़े की दीवार हो गई। जिस पर बड़े-बड़े शब्दों में आपने ही लोगों के सामने लिखा है ‘यहां पोस्टर लगाना मना है‘। फिर अकेले में आप ही हैं कि लगाए जा रहे हैं। तिस पर साहित्य में सार्वजनिक रूप से अपने दुष्ट-कर्म का महिमा-मण्डन भी कर रहे हैं। इधर लोग भी आपके लिखने और आपके लगाने पर समान भाव से तालियां बजा रहे हैं।
लगता है कि आपके भीतर के लिखने वाले को भी पता है कि कितना भी लिख लो मगर लगाने वाला लगाने से बाज नहीं आएगा। और अपने व्यवहार के इश्तहार से इस लिखे को मेट कर ही दम लेगा। और इधर लगाने वाला भी जानता है कि यह लिखने वाला फिर-फिर लिखता रहेगा और मैं बार-बार लगाता रहूंगा। यही इस दीवार की नियति है।
वहां पर चार दीवारें एक खास स्थिति में इकट्ठी खड़ी होने के कारण एक घर जैसा बन गया है जहां कि मैं रहता हूं। एक दिन, जब सोचने को और कुछ न बचा तो मैंने सोचा कि एक महिला कर्मचारी रख लूं जो खाना बना दे, कपड़े धोए, बर्तन मांजे व अन्य छोटे-मोटे काम कर दे। पर जब मित्रमल से बात हुई तो कहने लगे कि क्यों दो-चार सौ रूपये महीने खर्चते हो। इससे तो अच्छा है शादी कर लो। पत्नी के पद पर नियुक्त महिला मुत में सारा काम तो करेगी ही साथ में दहेज लाएगी सो अलग। ऊपर से ससुरालियों से रोज़ाना मिलने वाली भेंटे, नकदी, आदर, सम्मान, जलपान वगैरह ... .... ...।
बात मेरी समझ में आई और मैं तैयार हुआ। पत्नी पद की उम्मीदवार से बातचीत चली तो मैंने बताया कि कैसे मित्रमल के सुझाव पर मैं इस नेक ख्याल पर अमल के लिए तैयार हुआ। इतना सुनना था कि वे हत्थे से उखड़ र्गइं। कहने लगी कि आप पत्नी और नौकरानी में कोई फर्क नहीं मानते। मेरे भी पसीने छूटने लगे। कि तभी मेरे दिमाग में एक पुराने विचार का नवीनीकरण हुआ और स्थिति संभल गई। मैंने उन्हे समझाया कि मशहूर अंगे्रज विद्वान जॅर्ज बर्नाड शा के विचार भी पत्नियों के बारे में ऐसे ही थे। इतना सुनना था कि उनका हृदय परिवर्तन हो गया और वे बड़े आदर भाव से मुझे निहारने लगीं।
यही वह पल था जब मेरे दिल में यह ख्याल आया कि आदर हथियाने का यह उपाय भी कोई बुरा नहीं कि अपने लूले-लंगड़े विचारों को भी महापुरूषों के उद्धरणों की बैसाखियों के सहारे पार करा दिया जाए।
वैसे इन दोनों के अलावा भी अन्य कई तरकीबों से मैंने आदर बटोरा है। अगर साथ ले जा सका तो इसे साथ ले जाऊंगा नहीं तो वसीयत में अपने आदरणीय संबंधियों, मित्रों को बराबर-बराबर बांट जाऊंगा।
आपको इस लेख में कोई बात अटपटी या आपत्तिजनक न लगे इसके लिए बता दूं कि यह लेख कई बड़े लेखकों के साहित्य और महापुरूषों की जीवनियों में से कांट-छांट कर बड़ी मेहनत व लगन से लिखा है।
क्या अब भी आप इस लेख को व मुझे आदर नहीं देंगे?

-संजय ग्रोवर

(१८-०३-1994 को पंजाब केसरी में प्रकाशित)


Tuesday, June 16, 2009

क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?

सरल मेरा दोस्त है। अपनी सरलता की ही वजह से मेरा दुश्मन भी है। मौलिक है, नास्तिक है, विद्रोही है। जाहिर है ऐसे आदमी के रिश्ते सहज ही किसी से नहीं बनते। बनते हैं तो तकरार, वाद-विवाद, तूतू मैंमैं भी लगातार बीच में बने रहते हैं। यानि कि रिश्ता टूटने का डर लगातार सिर पर लटकता रहता है।

अभी हाल ही में सरल के दो बहनोईयों का निधन 6-8 महीनों के अंतराल में हो गया। कुछेक मित्रों की प्रतिक्रिया थोड़ी दिल को लगने वाली तो थी पर सरल को वह स्वाभाविक भी लगी। संस्कारित सोच के अपने दायरे होते हैं। मित्रों का इशारा था कि अब भी तुम्हारी समझ में नहीं आया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते, इसलिए यह सब हुआ ?


यह सोच सरल के साथ मुझे भी बहुत अजीब लगी।


पहली अजीब बात तो यह थी कि सरल माने न माने पर उसके दोनों बहनोई ईश्वर में पूरा विश्वास रखते थे। फिर ईश्वर ने सरल के किए का बदला उसके बहनोईयों और बहिन-बच्चों से क्यों लिया ?


दूसरी अजीब बात मुझे यह लगी कि अगर ईश्वर को न मानने से आदमी इस तरह मर जाता है तो फिर ईश्वर को मानने वाले को तो कभी मरना ही नहीं चाहिए ! वैसे अगर सब कुछ ईश्वर के ही हाथ में है तो ईश्वर नास्तिकों को बनाता ही क्यों है !? पहले बनाता है फिर मारता है ! ऐसे ठलुओं-वेल्लों की तरह टाइम-पास जैसी हरकतें कम-अज़-कम ईश्वर जैसे हाई-प्रोफाइल आदमी (मेरा मतलब है ईश्वर) को तो शोभा नहीं देतीं।


इससे भी अजीब बात यह है कि ईश्वर क्या किसी मोहल्ले के दादा की तरह अहंकारी और ठस-बुद्धि है जो कहता है कि सालो अगर मुझे सलाम नहीं बजाओगे तो जीने नहीं दूंगा ! मार ही डालूंगा ! क्या ईश्वर किसी सतही स्टंट फिल्म का माफिया डान है कि तुम्हारे किए का बदला मैं तुम्हारे पूरे खानदान से लूंगा !


क्या ईश्वर को ऐसा होना चाहिए ?


ईश्वर को मानने वालों की सतही सोच ने उसे किस स्तर पर ला खड़ा किया है!


वैसे अगर ईश्वर वाकई है तो क्या उसे यह अच्छा लगता होगा !?

(नयी पोस्ट लगा रहा हूं इसका मतलब यह नहीं कि पिछली पोस्ट पर बहस खत्म हो गयी।)

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