गुरुवार, 7 मार्च 2013

वीपीसिंह, आरक्षण और पॉज़ीटिवता का ह्रास


इधर वीपी सिंह नाम के आदमी ने भारत को तबाह करके रख दिया। सब कुछ अच्छा-अच्छा पॉज़ीटिव चल रहा था कि टांग मार दी। परसांईं जी ‘हनुमान चालीसा’ लिख रहे थे, श्रीलाल शुक्ल ‘अहा! ग्राम्य-जीवन कित्ता पवित्र है’ लिख रहे थे, मनु महाराज ‘स्त्रियों और शूद्रों को प्रगतिशील बनाने के 501 उपाय’ बता रहे थे, उदयप्रकाश ‘ढीली कुर्त्ती वाली लड़की’ लिख रहे थे, राजेंद्र यादव पूरी रचनात्मकता के साथ, सकारात्मक ढंग से कलात्मक लोगों के बखिए उधेड़ रहे थे कि अचानक वीपी सिंह नाम का एक आदमी प्रकट हुआ और उसने सब तहस-नहस कर दिया। एकाएक सारे भारत की बुद्धि फिर गयी। फुलबगिया फ़ुल उजड़ गयी। लोग एकाएक भ्रष्टाचार, बलात्कार, अत्याचार वगैरह करने लगे। वरना इससे पहले भारत में किसीने इन चीज़ों का नाम तक नहीं सुना था। एकाएक सतीप्रथा शुरु हो गयी, लोग दहेज लेने लग पड़े, किसीके मरने तक में पूरी-कचौड़ी-लड्डू मांगने लगे। रातोंरात भारत बरबाद हो गया। बहुत सारे लोगों की थिंकिंग एकाएक निगेटिव हो गयी। जो लोग ज़्यादा सकारात्मक सोच के थे वे आत्महत्या और आत्मदहन वगैरह ट्राई कर-करके देखने लगे।
ख़ानदानी सोच के अनुसार इसके पीछे वीपी सिंह के छोड़े आरक्षण नाम के भूत का हाथ था।

असली पहेली यह है कि जब सब कुछ शुभ-शुभ, पवित्र-पवित्र चल रहा था तो इस आदमी को आरक्षण लगाने की सूझी ही क्यों? आरक्षण नाम का शब्द उस आदमी के ज़हन में आया ही कैसे? कहीं उस आदमी ने एक जाति के दूसरी जाति पर अत्याचार की कहानियां ख़ुदबख़ुद तो नहीं गढ़ लीं थीं!? भारत में जैसे लोगों को विद्वान कहा जाता है वैसे में से कई लोग अगर यह कहें कि ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दलित, ओ बी सी, आदिवासी आदि भी वी पी सिंह ने बनाए थे तो बच्चों को कोई हैरानी नहीं होगी।

बच्चे भी अब समझने लगे हैं कि ऐसे पॉज़ीटिव विद्वान दरअसल कैसे होते हैं!

-संजय ग्रोवर

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