Tuesday, March 22, 2011

फिर उसी कमरे में हूँ, मैं क्या करुं ?

ग़ज़ल

अब तलक सदमे में हूँ मैं क्या करुं ?
मैं बहुत ग़ुस्से में हूँ, मैं क्या करुं ?

जो मुझे सोने नहीं देता कभी
मैं उसी सपने में हूँ, मैं क्या करुं ?

तुमसा होके तुमसे मिल सकता नहीं
राज़ इक गहरे में हूँ, मैं क्या करुं ?

जो कभी भी लौटकर आता नहीं
मैं उसी वक्फ़े में हूँ, मैं क्या करुं ?

जो कबूतर-मार, शाखे-अम्न पे जलवानुमां
उसके मैं पहरे में हूँ, मैं क्या करुं ?

साल चौदह, बाल ख़ुशबू, बाग़े-जिस्म
फिर उसी कमरे में हूँ, मैं क्या करुं ?

यूं तो पूरा घर है मेरे बाप का
मैं भी इक कोने में हूँ, मैं क्या करुं ?

जो किसी विरसे का हिस्सा ही नहीं
मैं उसी विरसे में हूँ, मैं क्या करुं ?

दूसरों की बात कर सकता नहीं
आज फिर अपने में हूँ, मैं क्या करुं ?

-संजय ग्रोवर

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