ग़ज़ल
अब तलक सदमे में हूँ मैं क्या करुं ?
मैं बहुत ग़ुस्से में हूँ, मैं क्या करुं ?
जो मुझे सोने नहीं देता कभी
मैं उसी सपने में हूँ, मैं क्या करुं ?
तुमसा होके तुमसे मिल सकता नहीं
राज़ इक गहरे में हूँ, मैं क्या करुं ?
जो कभी भी लौटकर आता नहीं
मैं उसी वक्फ़े में हूँ, मैं क्या करुं ?
जो कबूतर-मार, शाखे-अम्न पे जलवानुमां
उसके मैं पहरे में हूँ, मैं क्या करुं ?
साल चौदह, बाल ख़ुशबू, बाग़े-जिस्म
फिर उसी कमरे में हूँ, मैं क्या करुं ?
यूं तो पूरा घर है मेरे बाप का
मैं भी इक कोने में हूँ, मैं क्या करुं ?
जो किसी विरसे का हिस्सा ही नहीं
मैं उसी विरसे में हूँ, मैं क्या करुं ?
दूसरों की बात कर सकता नहीं
आज फिर अपने में हूँ, मैं क्या करुं ?
-संजय ग्रोवर
अब तलक सदमे में हूँ मैं क्या करुं ?
मैं बहुत ग़ुस्से में हूँ, मैं क्या करुं ?
जो मुझे सोने नहीं देता कभी
मैं उसी सपने में हूँ, मैं क्या करुं ?
तुमसा होके तुमसे मिल सकता नहीं
राज़ इक गहरे में हूँ, मैं क्या करुं ?
जो कभी भी लौटकर आता नहीं
मैं उसी वक्फ़े में हूँ, मैं क्या करुं ?
जो कबूतर-मार, शाखे-अम्न पे जलवानुमां
उसके मैं पहरे में हूँ, मैं क्या करुं ?
साल चौदह, बाल ख़ुशबू, बाग़े-जिस्म
फिर उसी कमरे में हूँ, मैं क्या करुं ?
यूं तो पूरा घर है मेरे बाप का
मैं भी इक कोने में हूँ, मैं क्या करुं ?
जो किसी विरसे का हिस्सा ही नहीं
मैं उसी विरसे में हूँ, मैं क्या करुं ?
दूसरों की बात कर सकता नहीं
आज फिर अपने में हूँ, मैं क्या करुं ?
-संजय ग्रोवर
