रविवार, 19 जून 2011

मुश्क़िल

व्यंग्य
वह एक-एकसे पूछ रहा था।
जनता से क्या पूछना था, वह हमेशा से भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ थी।
विपक्षी दल से पूछा,
‘‘मैंने ही तो सबसे पहले यह मुद्दा उठाया था।’’ उनके नेता ने बताया।
उसने शासक दल से भी पूछ लिया,
‘‘हम आज़ादी के बाद से ही इसके खि़लाफ़ कटिबद्ध हैं। जल्द ही हम एक बिल ला रहे हैं।’’
शासक दल विपक्ष से कम उत्साहित नहीं दिख रहा था।
उसने गठबंधित दलों से पूछ मारा,
‘‘भ्रष्टाचार का ख़ात्मा होना ही चाहिए।’’ सबने एक स्वर से कहा।
उसने सेना से पूछा, वह भी खि़लाफ़ थी।
पुलिस से पूछा, वह खि़लाफ़ थी।
उसने चोर से पूछा, वह भी खि़लाफ़ था।
उसने सीमेंट से पूछा, वह खि़लाफ़ था।
उसने बालू से पूछा, वह भी खि़लाफ़ थी।
उसने करेंसी से पूछा, वह खि़लाफ़ थी।
उसने जाली करेंसी से पूछा, वह भी खि़लाफ़ थी।
क्या ठोस, क्सा द्रव्य, क्या गैस.......सारा देश भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ धरने पर था।
‘कमाल का माहौल क्रिएट हुआ है !’ वह बुदबुदाया।

‘आप भी आईए न भाईसाहब, क्या आप भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ नहीं हैं !?’ एक धरनाकारी ने उससे कहा।
’’बिलकुल हूं, मैं क्या देश से अलग हूं, आपसे अलग हूं।’’ उसने पूरी विनम्रता से कहा।
‘‘हां, लगते तो बिलकुल हमारे जैसे हो। आओ बैठो न हमारे साथ।’ लोगों ने मनुहार की।
वह आराम से उनके बीच जा बैठा। बात-चीत होने लगी। उसने कुछ नए स्लोगन भी सुझाए। थोड़ी ही देर में लगने लगा कि वह उनसे अलग कभी था ही नहीं।
‘‘आपका नाम क्या है भाईसाहब ?’’ यूंही किसीने पूछ लिया।
‘‘भ्रष्टाचार’’ उसने निर्विकार भाव से बताया।
पहले तो किसीने ध्यान न दिया।
‘‘क्या’’ एकाएक कोई चौंका।
‘‘यह वक्त इन बातों को सोचने का नहीं कि कौन क्या है, हर किसीका समर्थन क़ीमती है’’ किसीने कहा और बहस शुरु हो गई।
‘‘नहीं, नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है !? निकालो साले को यहां से’’, रोष से जिसने यह कहा था वही हैरानी से बोला, ‘‘अरे! पर वह गया कहां ?’’
‘‘अभी तो यहीं था!’’
‘‘मैंने अभी उसे विपक्षी दल के पास बैठे देखा था।’’
‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ! बिलकुल अभी मैंने उसे मंच पर देखा।’’
‘‘पागल हुआ है क्या ? वह सत्ताधारियों के बीच है, जाकर पकड़ उसे!’’
‘‘नहीं है वहां, वे कह रहे हैं कि वह ठेकेदारों के बीच जाकर बैठ गया है।’’
‘‘हट! अभी तो मैंने उसे मीडिया में देखा।’’
‘‘ओफ्फ़ो, साला कहां छुप गया जाकर !?’’
‘‘ढूंढो, किसी तरह ढूंढो उसे।’’
‘‘कैसे ढूंढूं ? उस कोने में जाता हूं तो वहां से वह इसी कोने में दिखाई देता है। यहां आता हूं तो आप कहते हैं वहां चला गया !’’
‘‘पर इतना तो पक्का है कि वह है हमारे ही बीच। सामने तो कहीं दिख नहीं रहा।’’

अब मुश्क़िल यह हो गयी थी कि सारा देश जिसके खि़लाफ़ धरने पर बैठा था वह सामने कहीं दिख नहीं रहा था और अपने बीच उसे ढूंढ पाने में लोग सक्षम नहीं थे।

-संजय ग्रोवर

37 टिप्‍पणियां:

  1. मिल जाता ''भ्रस्ताचार'' गर लोग अपने गिरेबान में देखते....
    दिक्कत वहीँ है..हम चाहते तो हैं भ्रस्ताचार ख़त्म हो.
    लेकिन हमारे घर से नहीं किसी और के घर से ख़त्म हो फिर देखेंगे उसके फायदे नुकसान फिर सोचेंगे.....
    हम इसे ख़त्म करें या नहीं....
    संवादघर में बहुत दिनों बाद झकझोरने वाली पोस्ट .....

    उत्तर देंहटाएं
  2. गज़ब---गज़ब!! बहुत तीखा और सन्नाट व्यंग्य!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. ज़बरदस्त!
    ---------------------------
    कल 20/06/2011को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की गयी है-
    आपके विचारों का स्वागत है .
    धन्यवाद
    नयी-पुरानी हलचल

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत करारा व्यंग्य। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपने तो भ्रष्टाचार का सजीव चित्रण प्रस्तुत कर दिया है. बहुत धारदार व्यंग.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत तीखा और सन्नाट व्यंग्य| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  7. बड़ा चुटीला व्‍यंग्‍य किया है आपने भ्रष्‍टाचार पर।

    उत्तर देंहटाएं
  8. मैं ढूँढता हूँ जिनको रातों के ख्यालों में
    जो मुझको मिल सके न सुबह के उजाले में .......
    कुछ ऐसा ही है , अगर ईश्वर होता है तो लोग कहते हैं वह अपने भीतर होता है यही भ्रष्टाचार के लिए भी कहा जा सकता है भ्रष्ट + आचरण , अपना आचरण सुधारने की जरुरत है कोई कनपटी पे बन्दूक रखके रिश्वत नहीं मांगता पतली गली से हम ही निकलना चाहते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत बढ़िया व्यंग है संजय जी ! आजकल भ्रष्टाचार भी ईश्वर की तरह सर्वव्यापी हो गया है ! यत्र तत्र सर्वत्र हर जगह उसकी उपस्थिति का आभास भी होता है और उसके अस्तित्व के प्रमाण भी मिल जाते हैं लेकिन दिखाई कहीं नहीं देता कि उसे पकड़ा जा सके ! बहुत ही शानदार प्रस्तुति ! बधाई स्वीकार करें !

    उत्तर देंहटाएं
  10. अब तक की पढ़ी तमाम लघु-कथाओं पर 'मुश्किल' लघु-कथा ने जो दहला मारा है उसका जवाब नहीं है....

    --Usha Raje SAXENA

    (VIA EMAIL)

    Monday, 20 June, 2011 1:26 AM

    उत्तर देंहटाएं
  11. भ्रष्टाचार के ऊपर एक सार्थक व्यंग्यात्मक प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें

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  12. बहुत बहुत बहुत ही सही कहा...

    एकदम सटीक...

    उत्तर देंहटाएं
  13. 'मुश्किल' यही है कि हम अपने अन्दर और आसपास ही नहीं देख पाते...जिस दिन अपने आप के विरोध में धरना देकर उसे सुधार लेंगे तो फिर
    लक्ष्य तक पहुँचने में कोई 'मुश्किल' न होगी....
    शायद कभी पहले संवादघर आना हुआ हो... याद नहीं... लेकिन आपका परिचय अपना सा लगा........
    "कुछ भी न कर पाने के अहसास से ग्रस्त और त्रस्त और सब कुछ कर लेने की जल्दबाज़ी में ध्वस्त।
    कभी सुबह हौसले पस्त तो कभी शाम को मनवा मस्त। ज़िन्दगी अस्त-व्यस्त।"

    ( व्यस्त हूँ नहीं तो खुद ही पोस्ट कर देती...)


    --meenakshi dhanwantri

    (VIA EMAIL)

    Monday, 20 June, 2011 5:41 PM

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  14. देश की आज कल जो हालत है उसकी नब्ज़ एक दम ठीक पकड़ ली है इस पोस्ट है.... वाकई एक अच्छी पोस्ट...

    सादर

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  15. आजकल व्यंग्य के नाम पर जाने क्या-क्या छप रहा है। कुछ लोग उपहास को व्यंग्य कह कर परोस देते हैं। आपके व्यंग्य से दिमाग में करेंट दौड़ता है। पाठक चिंतन के लिए विवश होता है। स्तरीय व्यंग्य के लिए साधुवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  16. गज़ब---गज़ब!! बहुत तीखा और सन्नाट व्यंग्य!!ज़बरदस्त!......

    उत्तर देंहटाएं
  17. bahut khoob, sateek vyang.


    --SUNIL BAWEJA

    (VIA EMAIL)


    Tuesday, 21 June, 2011 12:35 PM

    उत्तर देंहटाएं
  18. Mr. sunjay grover
    aapki shatitya rachne mujhe aachi legi hai.
    aapke vicharro me sachi aur stick likhe gai hai.


    --manmohan vyas

    (VIA EMAIL)

    Tuesday, 21 June, 2011 11:33 AM

    उत्तर देंहटाएं
  19. thx for sharing this b'full blog wd me.....

    regards
    Preetii

    (VIA EMAIL)

    Tuesday, 21 June, 2011 2:09 PM

    उत्तर देंहटाएं
  20. संजय जी , बहुत ही सशक्त व्यंग्य है सामायिक विसंगतियों पर मुझे नहीं लगता की इधर इस विषय पर कोई इतना बढ़िया व्यंग्य लिखा गया है , बहुत रचनात्मक है

    उत्तर देंहटाएं
  21. संजय जी , बहुत ही सशक्त व्यंग्य है सामायिक विसंगतियों पर मुझे नहीं लगता की इधर इस विषय पर कोई इतना बढ़िया व्यंग्य लिखा गया है , बहुत रचनात्मक है

    उत्तर देंहटाएं
  22. Sanjay ji, bahut maarak vyangya hai. Paina. Dhardar.Aankhe khol dene waalaa.Vidrooptaaon aur visangatiyon ko benakaab karne waalaa. Ek behad sashakt rachnaa ke liye badhaai.''Dekhan mein chote laage, ghav karein gambhir''.

    उत्तर देंहटाएं
  23. jo ghar dkha aapna mujhse bura na......sahi kaha ....sanjayji....bhrashtachar bada makkar hai....suksham hai....ya kahen ki bramh ki tarah sarvvyapi ho gaya hai....badsi hi satik tippani hai aapki....

    उत्तर देंहटाएं
  24. संजय जी,

    मजा आ गया पढ़कर लेकिन इसे भी सब ईश्वर बना देंगे कि है हर जगह दिखता कहीं नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  25. बहुत खूब संजय जी. लेकिन इस श्रद्धामय जनता का क्या करेंगे जो इस मुहीम के छद्म को समझने में लाचार है.

    उत्तर देंहटाएं
  26. अनपढ़, ग़रीब ग्रामीण जनता को भूल भी जाएं, पढ़े-लिखे और साहित्यिक भी ऐसे आदमी से प्रभावित हैं जो विदेश से काला धन आने पर लोगों को एक-एक लाख बांटने का लालच दे रहा है। यही वक्त है जब लुटे-पिटे वामपंथ को वापिस आना चाहिए। सीधे-सीधे कहना चाहिए कि हां हम नास्तिक हैं और नास्तिक होने के लिए बहुत साहस, तर्क, ईमानदारी और हिम्मत चाहिए। वामपंथ को हिंसा की बात छोड़कर ईमानदार और मानवता प्रेमी नास्तिक की पहचान क़ायम करनी चाहिए। प. बंगाल में उसने इस दिशा में क्या किया ? वामपंथ को हिम्मत और मेहनत दिखानी होगी वरना यह देश वापस रुढ़िवादियों के हाथों में जाने को तैयार बैठा है।

    उत्तर देंहटाएं
  27. आप का बलाँग मूझे पढ कर आच्चछा लगा , मैं बी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    मै नइ हु आप सब का सपोट chheya
    joint my follower

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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