गुरुवार, 19 मई 2011

जिन्हें नाज़ है...

नज़्म

जिन्हें नाज़ है उनके क्या राज़ खोलूं  
जो तोल के बोलूं तो कुछ भी न बोलूं

ये तहज़ीब की बन ज़ुंबां बोलते हैं
ये बनके तेरे मेहरबां बोलते हैं
ये ईमान पर, बेईमां बोलते हैं

जिन्हें नाज़ है उनके ......

ये चाहें तो तुझको तुझीसे लड़ा दें
तेरे घर में घुसकर ये बेघर बना दें
ये साज़िश करें और मुकद्दर बता दें

जिन्हें नाज़ है उनके ......

ये बढ़ते हुए माफ़िया ज़िंदगी के
ये रटते हुए, काफ़िया ज़िंदगी के
ये बन जाते हैं रहनुमां ज़िंदगी के

जिन्हें नाज़ है उनके ......

कोई टोपियों से कबूतर निकाले
क़िताबों से कोई है अक्षर निकाले
कोई जादूगर कफ्न से सर निकाले

जिन्हें नाज़ है उनके ......

अदू औरतों के, चले दोस्त बनकर
निशाना ये उनपर लगाएंगे छुपकर
उन्हीं के इक हमदर्द कंधे पे रखकर

जिन्हें नाज़ है उनके ......

ये मां बहन बेटी की माला जपे हैं
दिखे है जो औरत, ये सर नोंच ले हैं
ये उसपर हंसे हैं कि ख़ुदपर हंसे हैं

जिन्हें नाज़ है उनके.....

वो औरत भी ख़ुदको अजब ढूंढती है
वो मज़हब ही में अपना सब ढूंढती है
वो तब ढूंढती थी न अब ढूंढती है

जिन्हें नाज़ है उनके.....

इसे जिस धरम ने कहीं का न छोड़ा
उसे इसने अपना सबब मान छोड़ा
इस औरत ने ख़ुद अपना पीछा न छोड़ा

जिन्हें नाज़ है उनके क्या राज़ खोलूं  
जो तोल के बोलूं तो कुछ भी न बोलूं

-संजय ग्रोवर

अदू=दुश्मन

28 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! बहुत सुंदर।
    रोचक प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  3. हमेशा की तरह सटीक और मौलिक

    उत्तर देंहटाएं
  4. सामयिक अभिव्यक्ति, बहुत सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं
  5. मैं दो दिन से गुनगुना रहा था 'जिन्‍हें नाज़ था हिन्‍द पर वो कहॉं हैं' विचित्र संयोग रही यह पोस्‍ट है।
    नज्‍़म दिलकश है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह वाह वाह
    जबर्दस्त प्रस्तुति
    आप ने जीवन के कई पहलुओं पर अपनी कलम चलाई है
    बधाई बन्धुवर

    उत्तर देंहटाएं
  7. achchha vyangya hai !


    --Rekha Maitra

    Sunday, 22 May, 2011 3:36 AM

    (VIA EMAIL)

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  8. यही नज़्म अगर किसी कम्युनिस्ट ने लिखी होती तो अब तक महान और ऐतिहासिक की कैटेगरी में दर्ज़ हो गयी होती।

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  9. wakai me sanjaybhai aapka hai andaz nirala aur isi ke liye hai hum aapke kayal.aur mai likhu to kya likhu.

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ख़ूबसूरत और शानदार रचना ! उम्दा प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  11. वो औरत भी ख़ुदको अजब ढूंढती है
    वो मज़हब ही में अपना सब ढूंढती है
    वो तब ढूंढती थी न अब ढूंढती है
    ... behtareen abhivyakti

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह....बहुत ही सुन्दर नज्म...
    बहुत बहुत सुन्दर....

    उत्तर देंहटाएं
  13. रजनीश जी के ब्लाग पर आपके ब्लाग वाबत जानकारी हुई। बिल्कुल यहीं हो रहा है बेईमान ईमानदारी पर भाषण दे रहे है । कितनी क्षमता है कि कोई तो दूसरों से लडवाता है मगर ये तो खुद को खुद ही से लडवाने में माहिर । हमदर्द भी बनेगे दोस्त भी बनेगे और छुप कर तीर भी चलायेंगे। यदि तीर दुश्मन के चलाये होगे तो भी निशाने इन्ही के बताये हुये होंगे। जिस धरम ने कहीं का न छोडा । 'साथ साथ चलते हैं पर मिल नहीं सकते मजहब ने हमें रेल की पटरी बना दिया '।

    उत्तर देंहटाएं
  14. वो औरत भी ख़ुदको अजब ढूंढती है
    वो मज़हब ही में अपना सब ढूंढती है
    वो तब ढूंढती थी न अब ढूंढती है

    झन्नाटेदार

    उत्तर देंहटाएं

कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते....

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