मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार: व्यवहार और इतिहास

‘‘चल ना यार ! मैं तो जा रहा हूं।’’ 

‘‘हां तू जा। मेरे पास इतना वक्त नहीं है।’’

‘‘तू मूर्ख है क्या ? यही तो वक्त है। तू नहीं गया तो माना जाएगा तू नपुंसक है, भ्रष्टाचार का समर्थक है।’’
‘‘अच्छा ! तू दो घण्टे वहां बैठ जाएगा तो तू भ्रष्टाचार का विरोधी हो जाएगा ? मैं क्या जानता नहीं तुझे ? अच्छा ये बता जितने लोग जुट रहे हैं उतने वाकई भ्रष्टाचार के विरोधी होते तो क्या किसी आंदोलन की ज़रुरत भी पड़ती ? ’’
‘‘तू यार फ़ालतू के तर्क करता है, करता-धरता कुछ है नहीं। समझ ले कनाट प्लेस जा रहा है घूमने। दो-तीन घण्टे नहीं निकाल सकता ? बड़े-बड़े नेता-अभिनेता आ रहे हैं, कोई बात तो होगी !’’
‘‘बात जितनी है उतनी मुझे पता है। तेरी तरह नहीं हूं। आने वालों को बख़ूबी पता है कि जंतर-मंतर कोई जलियांवाला बाग़ नहीं है और इस वक्त वहां होने में शायद कोई फ़ायदा हो तो हो रिस्क तो बिलकुल भी नहीं है। वहां जाने के नाम पर ख़ुदको शहीद मत समझ।’’
‘‘साले, हर दल के नेता, हर तरह के व्यापारी समर्थन कर रहे हैं।’’
‘‘क्या नयी बात है ? स्वाभाविक है। तू तो हर शादी में फोटो खिंचाने को आगे-आगे भागता है। बेटा, भ्रष्टाचार के विरोध में अगर सारे भ्रष्टाचारी फ़टाफ़ट जाकर तख़्त पर आगे-आगे बैठ जाते हैं तो यह भी उनके भ्रष्टाचार का ही विस्तार है। ’’
‘‘ऐसी-तैसी करा। वैसे करना क्या है आज तुझे ?’’
‘‘बैंक की पेटी में चैक डाला था, खो गया। उसका पता करना है। एक उद्योगपति जिसे भरत-रत्न मिलने की पूरी उम्मीद है, की कंपनी ने मेरी सिक्योरिटी मार ली है। उसपर केस डाला है, वहां जाना है। एक कोरियर वाले ने पैसे ज़्यादा लेकर भी कोरियर नहीं पहुंचाया, वहां जाना है। एक पड़ोसी जो शायद तुझे वहीं बैठा मिलेगा, मेरे कोर्टयार्ड के बराबर में नाजायज़ कमरा बना रहा है, उस सिलसिले में वकील के पास जाना है, एक संपादक ने स्वीकृत रचना तीन साल बाद लौटा दी, उससे बात करनी है, एक बिना मीटर के पड़ोसी ने तार हमारे कनेक्शन में डाल दिया था, उसके पैसे हमारे बिल में लगकर आ गए, उसका निपटारा कराना है, जल विभाग ने बिल में हज़ार रुपए ज़्यादा लगाके भेज दिए हैं वहां जाना है, प्रोपर्टी टैक्स का झूठा नोटिस आया हुआ है वहां जाना है........’’
‘‘हो सकता है ये सब तुझे वहीं बैठे मिल जाएं!’’
‘‘वहां नहीं तो और कहां मिलेंगे !’’
‘‘ओ बस कर यार ! यही करता रहता है कि कुछ काम भी करता है ?
‘‘यही करता हूं। काम तू कर ना। जाके दर्ज़ हो इतिहास में, तुझे क्या रोक रहा हूं ? ’’
‘‘तू भी यही करता रह। पर एक बात बता दूं, इतिहास में कभी दर्ज़ नहीं हो पाएगा।’’
‘‘अरे, मेरे पास टाइम नहीं दर्ज होने का। तू जा ना। एक बात बता, कोई सारी ज़िंदगी भ्रष्टाचार से लड़ता रहा हो पर वो इस आंदोलन में न जा पाए, तो क्या उसका सारा किया-धरा, अनकिया हो जाएगा !?’’
‘‘फिर वही बेवकूफ़ी की बातें!’’
‘‘मैं तो ऐसी ही बातें करता हूं, तू निकलता क्यों नहीं !?’’
‘‘हां, ठीक है, जाता हूं।’’
‘‘ठीक है!’’
‘‘ठीक है तो ठीक है।’’

-संजय ग्रोवर

अंत में एक प्रश्न और: एक अखबार वाले मित्र ने सामयिक व्यंग्य मांगे थे। शनिवार को उन्हें यह भेजा तो उन्होंने बताया कि सोम या मंगल को छप जाएगा। आज दोपहर को मेल करके पूछा क्या हुआ तो अभी तक जवाब नहीं आया। हो सकता है कि वे मित्र किसी परेशानी में हों या मुझमें धैर्य की कमी हो।
उनके पास मेरा फ़ोन नंबर है, मेरे पास उनका नहीं है।
फिर भी आपको क्या लगता है, वे मित्र भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थक होंगे या विरोधी !?

25 टिप्‍पणियां:

  1. आपका लिखा बहुत सटीक बैठता है , ऐसा हम देखते हैं कि अगर आप भीड़ का हिस्सा नहीं तो और अगर आप अपना पक्ष रखने की कोशिश करें तो आपको विरोधी समझा जाता है ,कोई लेखक कहते हैं मेरे नेता चोर है , सवाल यह उठता है क्या वो नेता ज़मीन से उगा या आसमान स...े गिरा उसे चुना तो मैने और आपने , फिर हम उसे चोर कहकर अपनी सारी ज़िमदारी से मुक्त कैसे हो गये ? नारों की नही कार्यों की ज़रूरत है इस राष्ट्र को ....cynicism and criticism are not same we need to understand that , the biggest faculty of human existence is human mind ...let us use that

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  2. truly contemporary. Acerbic but quite close to reality. carry on

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  3. अरे सर अभी वे इस मुद्दे पर होने वाली उठा पाठक में व्यस्त होंगे....
    वैसे अब आगे लोग पूछेंगे आप अन्ना के साथ बैठे थे या नहीं ..जाहिर है जवाब होगा - नहीं....
    तो लोग कहेंगे - ये देखो ये लोग बस घर पर हाथ पर हाथ बैठे रहे वर्ना तो...भ्रस्ताचार को अन्ना ने उखड फेका था....अफ़सोस इनकी वजह से भ्रस्ताचार जाते जाते रह गया.
    हो सकता अन्ना के भीड़ मं शामिल लोगों को आगे स्वतंत्रता सेनानियों की तरह कुछ छुटें और सम्मान भी मिलें...... और ये लोग गर्दन अकड़ा के चलने की इनको वजह एक मिल जाएगी....
    आखिर स्वतंत्रता सेनानी धीरे - धीरे अब विलुप्त हो रहे हैं उनकी जगह लेने वाले भी तो कुछ लोग होने चाहिए न..ये लोग उस कम भी आजायेंगे.....15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडे फहराने का कम भी इनसे लिया जा सकता है...

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  4. अच्छा लिखा है. बधाई
    मेरे ब्लॉग पर आयें, स्वागत है
    दुनाली

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  5. संजय जी आपने लघुकथा नहीं बल्कि गहरा सत्य उद्घाटित किया है. अन्ना हजारे को भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो समर्थन मिला है अगर उतने लोग अपना भ्रष्ट आचरण त्याग दें तो सच में किसी आन्दोलन या लोकपाल की नियुक्ति की जरुरत ही न रहे. लोगों द्वारा अन्ना को समर्थन एक तरह से अंगुली कटा कर शहीदों में शामिल होने की कोशिश ही नज़र आती है.

    जो लोग अन्ना को समर्थन दे रहे हैं वो क्यों न समर्थन के साथ साथ ये संकल्प भी लें की वो खुद कभी भ्रष्ट आचरण नहीं करेंगे और न ही किसी को करने देंगे.

    खैर जब सिर्फ कटाई छटाई से ही काम चल रहा हो तो भ्रष्टाचार के पौधें को जड़ से कटाने का क्या फायदा. क्या पता कल ये हमें फल ही देने लगे.

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  6. सचाई को इतने तीखे तरीके से रखना आप के बस का ही है।

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  7. sau fisadi satya..
    problem ki yahi jadd hai ki adhhiktar samay aisa dekha gaya hai ki bhrastachar ke virudhh jhanda uthane wale kuchh waise hi hote hain...!!

    kash anna desh ko bhrastachar mukt kar saken..

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  8. बहुत सटीक व्‍यंग्‍य। अब भाई आप तो इंतज़ार ही करते रहें। अखबार इसे क्‍यूँ छापेगा। अखबार खबरें छापने के लिये होते हैं, ऐसी खबरें जिन्‍हें लोग पढ़ें और जिनमें मिर्च-मसाला लगाने की संभावना हो। अब आप तो सारा मिर्च-मसाला खुद ही डाले बैठे हैं।

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  9. pretty good.....said truth in simple words....
    wishes to you and all readers for raising the issue...

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  10. क्या बात बनायी है शिरिमानजी ने

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  11. ोकपाल में ऐसों के लिए भी कुछ प्रावधान है क्या ?

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  12. भाई संजय, साधुवाद.
    आज औसत भारतीय भ्रष्ट है.हर कोई अपने तय हिस्से से ज्यादा पाने को लालायित है, समय से पहले पाना चाहता है, एक कदम भी चले बिना ही मंजिल तक पहुँचना चाहता है. मैं दावा करता हूँ कि कमोबेश सभी भ्रष्ट हैं, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. पुनः यथार्थचित्रण के लिए बधाई.

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  13. — शायद मांगे हुए सामयिक व्यग्यों की सामयिकता दो दिन बाद ही गुजर गयी हो.
    — शायद माँगकर रखना ही उनका शौक हो, छापना नहीं.
    — शायद उन अखबारिया महाशय जी किसी कार्य में उलझे हों.
    कभी-कभी स्वयं की अधीरता भी गलत अनुमान लगा बैठती है. फिर भी आश्वासन और डींगे मारने वाले आजकल काफी मात्रा में मिला करते हैं.
    इसलिए अपेक्षाओं का त्याग ही सुखी रहने का उपाय है.

    आप भी छोटी-छोटी बातों से बड़ी-बड़ी बातों का, व्यक्तिगत चरित्र का, विचारधारा का अनुमान लगा लेना चाहते हैं.
    तो एक अनुमान और लगायें : शायद उनका ई-मेल एड्रेस हेक हो गया हो. उन महाशय को अपना पासवर्ड ही विस्मृत हो गया हो.
    होने को ....... कुछ भी हो सकता है..

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  14. प्रतुल जी, संभावनाएं तो इस दिशा में भी कई हो सकतीं हैं और इसकी विपरीत दिशा में भी बहुत-सी हो सकती हैं। उन्होंने शनिवार को व्यंग्य पढ़कर कहा था कि मंगल तक आएगा तो प्रासंगिकता की तो बात ही ख़त्म हो जाती है। वैसे भी व्यंग्य आपके सामने है और...। वे मुझे दूसरे ईमेल से बता सकते थे। वे फ़ेसबुक पर मेरे मित्र हैं वहां बता सकते थे। वे साफ़ कह सकते थे कि प्रासंगिक नहीं है। अपेक्षा रखने की बात है तो उन्होंने स्वयं मांगा था। ऐसे में तक़लीफ़ तो होती ही है। वरना तो मैं भी ‘छपने की प्रक्रिया’ को और ‘छापने की मानसिकता और प्राथमिकता’ को बहुत बेहतर तरीके से जान चुका हूं। मुझे यह कहने में रत्ती-भर संकोच नहीं कि अगर दुष्यंत कमलेश्रवर के दोस्त न होते, परसाईं जी और जोशी जी कुछ वादों और गुटों से जुड़े न होते तो उनकी भी हालत भुवनेश्वर और शैलेश मटियानी जैसी हो सकती थी। ध्यान रखें कि उनके वक्त में इंटरनेट नहीं था।

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  15. संजय जी,
    आपके उत्तर को विलम्ब से अभी पढ़ा...... आप सही कह रहे हैं.

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  16. बधाई

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