Saturday, March 28, 2009

अगूंठा कटवा दिया, चश्मों ने फतवा दिया

ग़ज़ल



राहगीरों को तुम्हारे रास्तों ने क्या दिया/
मंज़िलों को और गहरी गर्त में पहुंचा दिया//
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जिन मचानों पर सुरक्षित था अंधेरों का वजूद/
उन मचानों को ही तुमने मंज़िलें ठहरा दिया//
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एक झूठे सच की खातिर कितने सच झुठला दिए/
आपकी दानाईयों ने मेरा दिल दहला दिया//
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नन्हीं आशाओं के अंकुर धूप में कुम्हला गए/
रोशनी ने सूरजों को जाने क्या समझा दिया//
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डर है वो उठने से पहले उंगली भी ना मांग ले/
दक्षिणा में जिसने अगूंठा मेरा कटवा दिया//
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जब किसी ने ज़िन्दगी को देखा नंगी आंख से/
बस तभी चश्मों ने उसको कुछ न कुछ फतवा दिया//
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-संजय ग्रोवर




(18 दिसंबर, 1994 को दैनिक जागरण में प्रकाशित)

Thursday, March 19, 2009

व्यंग्य-कक्ष में *****एक संपूर्ण पुरूष*****

वह एक संपूर्ण पुरूष था।

‘अ कंपलीट मैन‘। मर्दों में मर्द। पतियों में पति। दोस्तों में दोस्त। रिश्तेदारों में रिश्तेदार। स्वस्थों में स्वस्थ। बीमारों में बीमार। लेखकों में लेखक। कलाकारों में कलाकार। प्रगतिशीलों में प्रगतिशील। रूढ़िवादियों में रूढ़िवादी। आधुनिक। परंपरावादी। देशप्रेमी। सहिष्णु। तेजतर्रार। विनम्र। आक्रामक। नाराज़। संतुष्ट। सभी कुछ। एक संपूर्ण पुरूष। ‘अ कंपलीट मैन‘ं।


पत्नी उससे खुश थी। चूंकि वह पत्नी को खुश रखता था, इसलिए पत्नी को खुश रहना पड़ता था। पत्नी के अलावा भी वह कई पत्नियों और दूसरी स्त्रियों को खुश रखता था। इस संबंध में उसके अपने तर्क भी थे। जब वह दूसरी स्त्रियों के बीच होता तो कहता कि मैं मर्द हूं। स्मार्ट हूं। लड़कियां मुझ पर मरती हैं। मैं कितना प्रगतिशील हूं। जब दूसरे मर्द दूसरी स्त्रियों या उसके घर की स्त्रियों के साथ होते तो वह परंपरावादी हो जाता। कहता कि वे जनानियां हैं। औरतों में घुसे रहते हैं। दूसरी स्त्रियों से अपनी घनिष्ठता के बीच आने वाले उनके पतियों, भाइयों और दूसरे लोगों को वो किसी-न-किसी तरह पटाए-फुसलाए-बहलाए रखता। जबकि अपनी स्त्रियों से घनिष्ठता बनाने वाले हर पुरूष को कोई-न-कोई चाल चलकर संबंध तोड़ने पर मजबूर कर देता।


वह एक संपूर्ण पुरूष था। ‘अ कंपलीट मैन‘।


समाज में उसकी इज़्ज़त थी, प्रतिष्ठा थी, सम्मान था। किसी के घर बच्चा पैदा होता तो वह किलकारियां मारता सबसे पहले बधाई देने पहुंच जाता। बच्चे के मां-बाप को भेंट देता, शाबासी देता, हर तरह से प्रोत्साहित करता। बाहर निकलकर दूसरे लोगों से कहता कि साले, मूर्ख और गंवार कहीं के, बच्चे पैदा किए चले जा रहे हैं। न देश का खयाल है, न समाज का, न बच्चों के भविष्य का। लोग सुनकर खुश होते कि देखो अगले को सभी की कितनी चिंता है। कोई मरता तो सबसे पहले लटकने वाला चेहरा उसी का होता। अर्थी को दिए जाने वाले चार कंधों में एक उसका होना लगभग निश्चित था। जैसे वह रोज इंतजार ही कर रहा होता कि कोई मरे और वह दुःख बांटने जाए। आदमी से प्रेम करने की बजाय समाज को खुश रखना उसका दर्शन था।


वह एक संपूर्ण पुरूष था। अ कंपलीट मैन।


लोगों से बाते करते हुए उसकी ‘स्मार्टनेस‘ देखते ही बनती थी। वह जानता था कि ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान‘। अर्थात् ‘प्रैक्टिस मेक्स अ मैन परफैक्ट‘। सो दिन-रात अभ्यास करके उसने कमीनेपन, दोमुंहेपन, पाखंड, नीचता, लंपटता, लुच्चई जैसे अत्यावश्यक चारित्रिक गुणों का विकास अपने अंदर कर लिया था। अपनी वाक्पटुता को वह तर्क कहकर खुश रहता, तो दूसरों के तर्कों को वाग्जाल कहकर भी वह ही खुश रहता। ‘फूट डालो और राज करो‘ इस स्वर्णिम सूक्ति ने उसे दोस्तों, रिश्तेदारों व सहकर्मियों के बीच पाॅपुलर व अमर बना दिया था। उसके संबंध मूलतः दो तरह के लोगों से थे। एक तो वे जिनकी चमचागिरी वह कर सके। दूसरे वे जो उसकी चमचागिरी कर सकें। दूसरों के बिना वह इसलिए नहीं रह पाता था कि बिना उन्हें छोटा किए खुद को बड़ा नहीं मान पाता था। यूं वह महान था कि अपने महान होने के लिए उसने दूसरों को इतना महत्व दे दिया था।


वह एक संपूर्ण पुरूष था। ‘अ कंपलीट मैन‘।


जब वह लिखने पर उतारू हो जाता तो एक-से-एक चीज लिख मारता। ऐसे-ऐसे लेख जो दूसरे लिखें तो किसी अखबार में संपादक के नाम पत्र में भी न छपें। मगर उसके व्यावहारिक स्वभाव व सामाजिक संबंधों के चलते संपादकीय पृष्ठ पर बतौेर मुख्य लेख छप जाते।


आदमी को सामाजिक जानवर बनाने वाली सभी किताबें उसने घोंट रखी थीं। सो जानता था कि ‘आॅफेंस इज़ द बेस्ट डिफेंस‘ यानी ‘आक्रमण में ही सुरक्षा है‘। अतः किसी की रचना चुराता तो साथ ही उस पर चोरी का आरोप भी लगा देता। ऐसा जो कुछ भी करता सब दूसरों पर थोप देता। कवि सम्मेलनों के अलावा भी कवि सम्मेलन कर लेता।


जन्मोत्सवों में बधाई गायन और विवाहों में सेहरा गायन आदि के साथ-साथ मुर्दनी के माहौल को कवि मेले में बदल देने का हुनर भी उसमें था। अतः मुर्दों समेत सभी उससे खुश थे। यही उसकी कलाकारी थी कि वह कलाकार न होते हुए भी कलाकार था।


एक संपूर्ण पुरूष। अ कंपलीट मैन। जो कि वह था।


मगर जो शेर उसकी संपूर्णता में बाधक था, अभी भी हैः-


ये चलती-फिरती सूरतें जो देखते हैं आप,/

कितने हैं इनमें वाकई इंसा न पूछिए।


-संजय ग्रोवर



(25 अप्रैल, 1997 में को अमर उजाला में प्रकाशित)

Sunday, March 15, 2009

‘ एक दिल बच्चों के जैसा है तुम्हारी खोज में ’

ग़ज़ल

कितनी उम्मीदें लगाकर आगईं फिर तितलियां

काग़ज़ी फूलों से धोखा खा गईं फिर तितलियां


मैंने सोचा फूल बन महकूँ जो उनकी राह में

खुशबू बन ख्वाबों में मेरे छा गईं फिर तितलियां


‘ एक दिल बच्चों के जैसा है तुम्हारी खोज में ’

इतना सुनना था कि बस शरमा गईं फिर तितलियां


कुदरती तानों की रौ में मैं जो इक दिन बह चला

मेरे सुर में सुर मिला कर गा गईं फिर तितलियां


इस चमन से उस चमन इस फूल से उस फूल तक

ज़िन्दगी के बीज कुछ बिखरा गईं फिर तितलियां

-संजय ग्रोवर

Monday, March 9, 2009

‘‘होली विशेषांक’’

दोस्तो, होली-विशेषांक के लिए काफी तैयारी करनी पड़ी। दिल में धुकुर-धुकुर मची थी कि सही वक्त पर निकाल पाएंगे या नहीं ! पर अंतत: हम इसमें कामयाब हुए। लीजिए, अब यह आपके हाथों में है। पढ़िए, मज़ा लीजिए और टीपें छोड़िए कि कैसा लगा -
















अनावश्यक निर्देश:-
अगर फांट की दिक्कत हो रही हो तो कीबोर्ड उठाकर सिर में मारिए।


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अनावश्यक निर्देश:-
अगर अभी भी पढ़ने को कुछ मिला हो तो सी।पी.यू. खोलकर उसमें घुस जाईए।


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अंतिम निर्देश:-अगर अभी भी कुछ नहीं मिलता तो समझ लीजिए आपको बु/फु/कुद्धू (तरंग में सही शब्द भूल गया हूं) बनाया गया है।


BURA NA MAANO HOLI HAI!

एक मूर्खतापूर्ण लेख


कई बार लगता है कि मैं मूर्ख हूं। फिर लगता है कि मैं कैसे मूर्ख हो सकता हूूं। क्या मैं इतना मूर्ख हूं कि यह भी न समझ सकूं कि मैं मूर्ख हूं या नहीं? अगर मैं मूर्ख हूं तो दूसरे मुझे विद्वान क्यों समझते हैं? क्या दूसरे मूर्ख हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि वे मुझे मूर्ख समझ कर ही विद्वान कहते हांे। क्या वे सभी विद्वानों को मूर्ख समझते है? क्या सभी विद्वान मूर्ख होते हैं? क्या मूर्ख लोग ही आगे चल कर विद्वान बन जाते हैं? मैं कितना मूर्ख हूं कि खुद को विद्वान कह रहा हूूं।

अगर मैं मूर्ख न होता तो क्या होता? क्या तब भी मैं लेखक होता? क्या सिर्फ लेखक होना ही मूर्ख होने के लिए काफी है? या फिर इसके लिए स्वतंत्र लेखक होना भी जरूरी है।

एक मित्र अर्से बाद मिले। पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो आजकल? ‘‘मैंने कहा, ‘‘लिखता हूं।‘‘ वे तड़ से भांप गए। बोले, ‘‘लिखते तो हो, पर कर क्या रहे हो?‘‘ मैं भी समझ गया कि वे क्या समझ रहे हैं।
‘‘कहीं-कहीं से पैसे भी आते हैं।‘‘ मैंने बताया। ‘‘चलो ठीक है’’, उन्होंने ढांढस बंधाया। फिर बोले, ‘‘कोई काम भी करो साथ में। लिखना-शिखना ठीक है शौक-मौज के लिए पर एक उम्र तक ही अच्छा लगता है। अब तुम छोटे थोड़े ही हो। समझ रहे हो न।‘‘

‘‘समझ रहा हूं। ‘‘मैंने मूर्खतापूर्ण ढंग से सिर हिलाया। तब कहीं जाकर उनकी संतुष्टि हुई। मगर बात फिर भी वहीं की वहीं रही। वे मुझे मूर्ख सिद्ध करके चले गए। और उनके जाने के बाद मेरे दिल में यह ख्याल और पक्का हो गया कि, ‘‘ये लोग साहित्य-वाहित्य क्या जानें, मूर्ख कहीं के।‘‘

मूर्ख की अक्लमंदी देखिए कि अक्लमंद की हंसी उड़ाने में पल-भर नहीं लगाता। जबकि अक्लमंद इतना मूर्ख होता है कि मूर्ख की हंसी उड़ाने से पहले भी सौ बार सोचता है।

आइए, अब जरा टोन बदलें।

मूर्खता सर्वोपरि है। सर्वत्र विद्यमान है। कहा भी गया है (नहीं कहा गया तो अब कहा जाएगा) कि ‘जहां न पहुंचे सूरज, वहां पहुंच जाए मूरख।‘ कहते हैं कि अधिकांश कुंवारी लड़कियां एक धनवान मगर मूर्ख पति की कामना करती है। सभी लड़के (या पुरूष) पहले से ही माने होते हैं कि स्त्रियां तो होती ही मूर्ख हैं। राजनीतिज्ञ इस विचार के साथ पले-बढ़े होते है कि अधिकांश जनता मूर्ख है। जो इसे और ज्यादा मूर्ख बना सकता है वही सफल हो सकता है। मगर जनता इतनी भी मूर्ख नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि शरीफ और बुद्धिमान लोग कभी भी राजनीति में आने जैसी मूर्खतापूर्ण हरकत नहीं करते।

रचना लौट आने पर लेखक समझता है कि सम्पादक मूर्ख है जो इस कालजयी रचना का महत्व नहीं समझ पाया। उधर सम्पादक सोचता है कि ये लेखक इतने मूर्ख क्यों होते हैं कि अपनी हर मूर्खता को अखबार में छपने भेज देते हैं। मगर इसके बावजूद भी लेख तो छपते ही हैं। बड़े लेखक भी पैदा होते ही हैं। क्या पता कल को किसी सम्पादक और मेरी मूर्खताएं मिल कर कोई ऐसा मूर्खतापूर्ण चमत्कार कर दें कि मैं बड़ा लेखक बन जाऊं।

चलिए, उसी टोन में लौटें।

क्या लिखना एक मूर्खतापूर्ण हरकत है? क्या लिखने से कुछ होता है? हो सकेगा? समाज, व्यवस्था वगैरह सुधरेंगे? कभी सुधरे हैं? क्या पाठक मूर्ख हैं जो लेखक की बातों में आ जाएंगे! पाठक से मेरा मतलब है आप यानी जो इस लेख को पढ़ रहे हैं। क्या आपको मेरी बात बुरी लगी। यदि हां तो कृपया मुझे मूर्ख समझ कर माफ कर दें। मैंने तो आपको पहले ही माफ कर दिया है। हिसाब बराबर।

और अंत में एक प्रार्थना जो इसी विशेष अवसर के लिए खुद चचा ग़ालिब मुझे लिखकर दे गए थे:-
बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ,कुछ न समझे खुदा करें कोई।

-संजय ग्रोवर

(‘पंजाब केसरी’ में प्रकाशित)

और अब इंतज़ार करें ’संवादघर’ के धमाकेदार ‘‘होली विशेषांक’’ का

Wednesday, March 4, 2009

ग़ज़ल है हटके, कह बेखटके

ग़ज़ल-1

वो गरचे बोलता बिलकुल नहीं था
मगर खामोश भी लगता नहीं था


वही तो बोलता रहता था हरदम
कि जिसपर बोलने को कुछ नहीं था


जो टहनी पत्तियों से भर गई थी
उसी का पेड़ थर-थर काँपता था


नज़र उतनी ही ज़्यादा बेहया थी
बदन को जितना ज़्यादा ढाँपता था


बगल की जिस गली से रास्ता था
पड़ोसी की बगल में इक छुरा था


वो जब लाशें गिरा कर हंस रहे थे
खुदा कोने में बैठा रो रहा था


कहीं गाएं बचाईं जा रहीं थीं
कहीं इंसान ज़िन्दा जल रहा था


वो जब लोगों से मिल कर लौटता था
उसे अपना पता मिलता नहीं था


मेरे दुश्मन से उसकी दोस्ती थी
यकीनन उसका सरमाया यही था


ग़ज़ल-2


ताज़ा कौन क़िताबें निकलीं
उतरी हुई ज़ुराबें निकलीं


शोहरत के संदूक में अकसर
चोरी की पोशाकें निकलीं


संबंधों का कलफ लगा कर
सीना तान उम्मीदें निकलीं


मैले जिस्म घरों के अंदर
बाहर धुली कमीज़ें निकलीं


दुनिया को सच्चाई बताने
चेहरे ओढ़, नक़ाबें निकलीं


चेहरे कितने चमकदार थे
कितनी घटिया बातें निकलीं


पानी का भी जी भर आया
यूँ बेजान शराबें निकलीं


-संजय ग्रोवर

Sunday, March 1, 2009

व्यंग्य-कक्ष में*****ऐतिहासिक भावनाएं*****

पिछले कुछ महीनों से इतिहास ने मेरे दैनिक जीवन में खलबली मचा दी है। मन का चैन और आँखों की नींद उड़ गयी है। जब भी कुछ खाता हूँ, पीता हूँ या करता हूँ तो मन में आशंकाएं घिरने लगती हैं कि हज़ार साल बाद या पाँच सौ साल बाद या पचास साल बाद इसे लेकर क्या सोचा जाएगा ? क्या इससे लोगों की भावनाएं तो नहीं आहत हो जाएंगी ? क्या इससे कोई अपने आपको उपेक्षित, अपमानित, उपहासित, हास्यास्पद हुआ तो नहीं महसूस करेगा ? लगने लगा है कि अब सब कुछ इसे लेकर तय करना पड़ेगा कि पचास/पाँच सौ/पाँच हज़ार सालों बाद उसके कैसे और कितने अर्थ व निष्कर्ष निकाले जाएंगे!

मान लीजिए सौ साल बाद आदमी कम्प्यूटर की फ्लौपियां, सीडियां आदि खाना शुरु कर दे तो उस फ्लौपी-खाऊ समुदाय की भावनाएं इस तथ्य को जानकर कितनी आहत होंगीं कि सौ साल पहले हमारे लोग रोटी जैसी कोई पिलपिली, खुरदुरी और नरम चीज़ खाकर गुज़ारा करते थे। उनमें से कई लोगों को यह भी लगेगा कि यह एक ऐतिहासिक झूठ है। ऐसा सम्भव ही नहीं कि सीडी-खाऊ और सेलफोन-पीऊ हमारी महान जाति ने कभी रोटी-सब्ज़ी-दाल जैसी निकृष्ट व अर्द्धविकसित डिशें खाईं होें। इसलिए इन दुष्ट तथ्यों को इतिहास से निकाला जाए और हमारी नरमो-नाजु़क भावनाओं को आहत होने से बचाया जाए।

सौ/पचास/पाँच सौ साल बाद जब आदमी आदमी को खाने लगेगा (हो सकता है मैं ग़लत होऊँ और दस साल बाद ही ऐसा हो जाए। हो सकता है आज भी ऐसा हो रहा हो। ) तो यह जान कर उसके जज़्बात को कितनी ठेस पहुँचेगी कि कुछ साल पहले हमारे पुरखे पशुओं के माँस जैसी गलीज़ चीजें़ खाया करते थे। एकाध अपवाद ने कभी-कभार एकाध औरत को तंदूर में भूना ज़रुर पर खाने का पराक्रम नहीं दिखा पाया। अन्यथा मानव-भक्षण से ज़्यादा ‘ग्रेसफुल’ कार्य और क्या हो सकता था। अगर पशु को खाने से इंसान पशुवत हो जाता था तो मानव को खाने से ज़्यादा मानवीय क्यों नहीं हो जाएगा भला!

कई बार अपने देसी पाखाने में उंकडँ़ू बैठा मैं यह सोच-सोच कर काँप उठता हूँ कि जब सुलभ शौचालयों समेत हमारे सारे पाखाने विदेशी ढंग की सीटों से सुसज्जित हो उठेंगे तो मेरी भावी पीढ़ियों को यह जान कर कितना दुख होगा कि उनके पितर पाखाने में भद्दे स्टाइल में बैठ कर शौच-क्रिया का संचालन किया करते थे। पाठकगण, आप बात को हल्के ढंग से न लें। बहरहाल, मैं तो समझ गया हँू कि आज की हल्की-सी भी हरकत का सरोकार कल की भारी-भरकम भावुकताओं से है। आज कुछ भी करने से पहले यह नहीं देखना होगा कि आज स्थितियां क्या हैं, ज़रुरतें क्या हैं, उपलब्धताएं क्या हैं। बल्कि यह देखना होगा कि कल इसके क्या ऐतिहासिक अर्थ निकाले जाएंगे! सदियों बाद लोगों की भावनाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा!

आगे की तो मैं पहले भी सोचता था पर अब कुछ ज़्यादा ही सोचने लगा हँू। मसलन जब गाता हँू तो दस साल आगे की सोचता हँू। जब जागता हँू तो पचास साल आगे की सोचता हँू। जब सोता हँू तो हज़ार साल आगे की सोचता हूँ।

जब बेईमानी करता हूँ तो कुछ नहीं सोचता!

पर सोचता हूँ कि कभी इन बातों पर भी हमारी आने वाली पीढ़ियों की भावनाएं आहत हुआ करेंगी जब उन्हें पता लगेगा कि हम बात-बात में झूठ बोलते थे, तिकड़म भिड़ाते थे, भ्रष्टाचार में सिर से पाँव तक लिप्त थे, चारा और ताबूत तक में कमीशन खा जाते थे, औरतों को नंगा घुमाते थे, आदमी तक से पशुवत् व्यवहार करते थे, किडनियां निकाल कर बेच देते थे, एक-दूसरे का खून पीने पर उतारु रहते थे!?
फिलहाल भावनाओं की वो किस्म ज़्यादा प्रचलन में है जो बात-बात पर आहत हो जाती है। भावनाओं पर इतना और ऐसा ही ज़ोर रहा तो डर है कि जल्दी ही भावनाएं भी ऐतिहासिक न हो जाएं!

-संजय ग्रोवर


(‘समयांतर’ में प्रकाशित)

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